स्कन्ध 03 || अध्याय 14 || *दिति का गर्भधारण*

*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
       "श्रीमद्भागवतमहापुराण" 

स्कन्ध 03 || अध्याय 14 || 
*दिति का गर्भधारण*
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! प्रयोजनवश सूकर बने श्रीहरि की कथा को मैत्रेयजी के मुखसे सुनकर भी भक्तिव्रतधारी विदुरजी को पूर्ण तृप्ति न हुई; अत: उन्होंने हाथ जोडक़र फिर पूछा। विदुरजी ने कहा—मुनिवर ! हमने यह बात आप के मुखसे अभी सुनी है कि आदिदैत्य हिरण्याक्षको भगवान्‌ यज्ञमूर्तिने ही मारा था। ब्रह्मन् ! जिस समय भगवान्‌ लीलासे ही अपनी दाढ़ों पर रखकर पृथ्वी को जलमें से निकाल रहे थे, उस समय उनसे दैत्यराज हिरण्याक्ष की मुठभेड़ किस कारण हुई ? 

श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी ! तुम्हारा प्रश्र बड़ा ही सुन्दर है; क्योंकि तुम श्रीहरि की अवतारकथा के विषय में ही पूछ रहे हो, जो मनुष्योंके मृत्युपाश का छेदन करनेवाली है । देखो, उत्तानपाद का पुत्र ध्रुव बालकपन में श्रीनारदजी की सुनायी हुई हरिकथा के प्रभाव से ही मृत्यु के सिरपर पैर रखकर भगवान्‌ के परमपदपर आरूढ़ हो गया था । पूर्वकाल में एक बार इसी वराह- भगवान्‌ और हिरण्याक्ष के युद्ध के विषय में देवताओं के प्रश्न करनेपर देवदेव श्रीब्रह्माजी ने उन्हें यह इतिहास सुनाया था और उसीके परम्परासे मैंने सुना है। 

विदुरजी ! एक बार दक्षकी पुत्री दिति ने पुत्रप्राप्ति की इच्छासे कामातुर होकर सायंकाल के समय ही अपने पति मरीचिनन्दन कश्यपजीसे प्रार्थना की । उस समय कश्यपजी खीर की आहुतियों द्वारा अग्निजिह्व भगवान्‌ यज्ञपति की आराधना कर सूर्यास्त का समय जान अग्निशाला में ध्यानस्थ होकर बैठे थे। 

दितिने कहा—विद्वन् ! मतवाला हाथी जैसे केलेके वृक्षको मसल डालता है, उसी प्रकार यह प्रसिद्ध धनुर्धर कामदेव मुझ अबला पर जोर जताकर आप के लिये मुझे बेचैन कर रहा है ।अपनी पुत्रवती सौतोंकी सुख-समृद्धि को देखकर मैं ईर्ष्या की आगसे जली जाती हूँ। अत: आप मुझपर कृपा कीजिये, आपका कल्याण हो । जिनके गर्भसे आप-जैसा पति पुत्ररूप से उत्पन्न होता है, वे ही स्त्रियाँ अपने पतियों से सम्मानिता समझी जाती हैं। उनका सुयश संसारमें सर्वत्र फैल जाता है। 

हमारे पिता प्रजापति दक्षका अपनी पुत्रियोंपर बड़ा स्नेह था। एक बार उन्होंने हम सबको अलग-अलग बुलाकर पूछा कि ‘तुम किसे अपना पति बनाना चाहती हो ?’ वे अपनी सन्तानकी सब प्रकारकी चिन्ता रखते थे। अत: हमारा भाव जानकर उन्होंने उनमेंसे हम तेरह पुत्रियोंको, जो आपके गुण-स्वभावके अनुरूप थीं, आपके साथ ब्याह दिया । अत: मङ्गलमूर्ते ! कमलनयन ! आप मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये; क्योंकि हे महत्तम ! आप-जैसे महापुरुषोंके पास दीनजनोंका आना निष्फल नहीं होता। 

विदुरजी ! दिति कामदेवके वेगसे अत्यन्त बेचैन और बेबस हो रही थी। उसने इसी प्रकार बहुत-सी बातें बनाते हुए दीन होकर कश्यप जी से प्रार्थना की, तब उन्होंने उसे सुमधुर वाणी से समझाते हुए कहा । ‘भीरु ! तुम्हारी इच्छाके अनुसार मैं अभी-अभी तुम्हारा प्रिय अवश्य करूँगा। भला, जिसके द्वारा अर्थ, धर्म और काम—तीनोंकी सिद्धि होती है, अपनी ऐसी पत्नीकी कामना कौन पूर्ण नहीं करेगा ? जिस प्रकार जहाजपर चढक़र मनुष्य महासागर को पार कर लेता है, उसी प्रकार गृहस्थाश्रमी दूसरे आश्रमों को आश्रय देता हुआ अपने आश्रमद्वारा स्वयं भी दु:खसमुद्र के पार हो जाता है। 

मानिनि ! स्त्री को तो त्रिविध पुरुषार्थकी कामनावाले पुरुषका आधा अङ्ग कहा गया है। उसपर अपनी गृहस्थीका भार डालकर पुरुष निश्चिन्त होकर विचरता है । इन्द्रियरूप शत्रु अन्य आश्रमवालोंके लिये अत्यन्त दुर्जय हैं; किन्तु जिस प्रकार किले का स्वामी सुगमता से ही लूटनेवाले शत्रुओं को अपने अधीन कर लेता है, उसी प्रकार हम अपनी विवाहिता पत्नी का आश्रय लेकर इन इन्द्रियरूप शत्रुओं को सहजमें ही जीत लेते हैं। (01-19)

कश्यपजी दिति से कहरहे हैं—गृहेश्वरि ! तुम-जैसी भार्याके उपकारों का बदला तो हम अथवा और कोई भी गुणग्राही पुरुष अपनी सारी उम्र में अथवा जन्मान्तरमें भी पूर्णरूप से नहीं चुका सकते। तो भी तुम्हारी इस सन्तान-प्राप्ति की इच्छा को मैं यथाशक्ति अवश्य पूर्ण करूँगा। परन्तु अभी तुम एक मुहूर्त ठहरो, जिससे लोग मेरी निन्दा न करें । यह अत्यन्त घोर समय राक्षसादि घोर जीवों का है और देखने में भी बड़ा भयानक है। इसमें भगवान्‌ भूतनाथ के गण भूत-प्रेतादि घूमा करते हैं। साध्वि ! इस सन्ध्याकाल में भूतभावन भूतपति भगवान्‌ शङ्कर अपने गण भूत- प्रेतादि को साथ लिये बैलपर चढक़र विचरा करते हैं। 

जिनका जटाजूट श्मशानभूमि से उठे हुए बवंडरकी धूलिसे धूसरित होकर देदीप्यमान हो रहा है तथा जिनके सुवर्ण-कान्तिमय गौर शरीरमें भस्म लगी हुई है, वे तुम्हारे देवर (श्वशुर) महादेवजी अपने सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप तीन नेत्रोंसे सभीको देखते रहते हैं। संसारमें उनका कोई अपना या पराया नहीं है। न कोई अधिक आदरणीय और न निन्दनीय ही है। हमलोग तो अनेक प्रकारके व्रतोंका पालन करके उनकी मायाको ही ग्रहण करना चाहते हैं, जिसे उन्होंने भोगकर लात मार दी है ।विवेकी पुरुष अविद्याके आवरणको हटाने की इच्छा से भगवान् शंकर के निर्मल चरित्र का गान किया करते हैं; उनसे बढक़र तो क्या, उनके समान भी कोई नहीं है और उनतक केवल सत्पुरुषों की ही पहुँच है। यह सब होने पर भी वे स्वयं पिशाचोंका-सा आचरण करते हैं ।

यह नरशरीर कुत्तोंका भोजन है; जो अविवेकी पुरुष आत्मा मानकर वस्त्र, आभूषण, माला और चन्दनादि से इसीको सजाते-सँवारते रहते हैं—वे अभागे ही आत्माराम भगवान्‌ शङ्कर के आचरणपर हँसते हैं। हमलोग तो क्या, ब्रह्मादि लोकपाल भी उन्हीं की बाँधी हुई धर्म-मर्यादा का पालन करते हैं; वे ही इस विश्व के अधिष्ठान हैं तथा यह माया भी उन्हीं की आज्ञा का अनुसरण करने वाली है। ऐसे होकर भी वे प्रेतों का-सा आचरण करते हैं। अहो ! उन जगद्व्यापक प्रभु की यह अद्भुत लीला कुछ समझ में नहीं आती’। मैत्रेयजी कहते हैं—पतिके इस प्रकार समझानेपर भी कामातुरा दिति ने वेश्याके समान निर्लज्ज होकर ब्रहमर्षि कश्यपजी का वस्त्र पकड़ लिया। तब कश्यपजी ने उस निन्दित कर्म में अपनी भार्या का बहुत आग्रह देख दैव को नमस्कार किया और एकान्त में उसके साथ समागम किया। फिर जल में स्नानकर प्राण और वाणी का संयम करके विशुद्ध ज्योतिर्मय सनातन ब्रह्म का ध्यान करते हुए उसी का जप करने लगे। 

विदुरजी ! दिति को भी उस निन्दित कर्मके कारण बड़ी लज्जा आयी और वह ब्रह्मर्षि के पास जा, सिर नीचा करके इस प्रकार कहने लगी । दिति बोलीं—ब्रह्मन् ! भगवान्‌ रुद्र भूतोंके स्वामी हैं, मैंने उनका अपराध किया है; किन्तु वे भूतश्रेष्ठ मेरे इस गर्भ को नष्ट न करें। मैं भक्तवाञ्छाकल्पतरु, उग्र एवं रुद्ररूप महादेव को नमस्कार करती हूँ। वे सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी एवं दण्ड देनेके भावसे रहित हैं, किन्तु दुष्टोंके लिये क्रोधमूर्ति दण्डपाणि हैं। हम स्त्रियोंपर तो व्याध भी दया करते हैं, फिर वे सतीपति तो मेरे बहनोई और परम कृपालु हैं; अत: वे मुझपर प्रसन्न हों। 

श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी ! प्रजापति कश्यपने सायंकालीन सन्ध्या-वन्दनादि कर्मसे निवृत्त होनेपर देखा कि दिति थर-थर काँपती हुई अपनी सन्तानकी लौकिक और पारलौकिक उन्नतिके लिये प्रार्थना कर रही है। तब उन्होंने उससे कहा । कश्यपजीने कहा—तुम्हारा चित्त कामवासनासे मलिन था, वह समय भी ठीक नहीं था और तुमने मेरी बात भी नहीं मानी तथा देवताओं की भी अवहेलना की। अमङ्गलमयी चण्डी ! तुम्हारी कोखसे दो बड़े ही अमङ्गलमय और अधम पुत्र उत्पन्न होंगे। वे बार-बार सम्पूर्ण लोक और लोकपालों को अपने अत्याचारोंसे रुलायेंगे। जब उनके हाथ से बहुत-से निरपराध और दीन प्राणी मारे जाने लगेंगे, स्त्रियों पर अत्याचार होने लगेंगे और महात्माओं को क्षुब्ध किया जाने लगेगा, उस समय सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करनेवाले श्रीजगदीश्वर कुपित होकर अवतार लेंगे और इन्द्र जैसे पर्वतोंका दमन करता है, उसी प्रकार उनका वध करेंगे। 

दितिने कहा—प्रभो ! यही मैं भी चाहती हूँ कि यदि मेरे पुत्रोंका वध हो तो वह साक्षात् भगवान्‌ चक्रपाणिके हाथसे ही हो, कुपित ब्राह्मणोंके शापादिसे न हो। जो जीव ब्राह्मणोंके शापसे दग्ध अथवा प्राणियोंको भय देनेवाला होता है, वह किसी भी योनिमें जाय—उसपर नारकी जीव भी दया नहीं करते । कश्यपजीने कहा—देवि ! तुमने अपने किये पर शोक और पश्चात्ताप प्रकट किया है, तुम्हें शीघ्र ही उचित-अनुचितका विचार भी हो गया तथा भगवान्‌ विष्णु, शिव और मेरे प्रति भी तुम्हारा बहुत आदर जान पड़ता है; इसलिये तुम्हारे एक पुत्रके चार पुत्रोंमेंसे एक ऐसा होगा, जिसका सत्पुरुष भी मान करेंगे और जिसके पवित्र यशको भक्तजन भगवान्‌के गुणोंके साथ गायेंगे। 

जिस प्रकार खोटे सोनेको बार-बार तपाकर शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार साधुजन उसके स्वभावका अनुकरण करनेके लिये निर्वैरता आदि उपायोंसे अपने अन्त:करणको शुद्ध करेंगे। जिनकी कृपासे उन्हींका स्वरूपभूत यह जगत् आनन्दित होता है, वे स्वयंप्रकाश भगवान्‌ भी उसकी अनन्य भक्तिसे सन्तुष्ट हो जायँगे ।कश्यपजी कहते हैं—दिति ! वह बालक बड़ा ही भगवद्भक्त, उदारहृदय, प्रभावशाली और महान् पुरुषोंका भी पूज्य होगा। तथा प्रौढ़ भक्तिभावसे विशुद्ध और भावान्वित हुए अन्त:करणमें श्रीभगवान्‌को स्थापित करके देहाभिमानको त्याग देगा। वह विषयोंमें अनासक्त, शीलवान्, गुणोंका भंडार तथा दूसरोंकी समृद्धिमें सुख और दु:खमें दु:ख माननेवाला होगा। उसका कोई शत्रु न होगा, तथा चन्द्रमा जैसे ग्रीष्म ऋतुके तापको हर लेता है, वैसे ही वह संसारके शोकको शान्त करनेवाला होगा ।

जो इस संसारके बाहर-भीतर सब ओर विराजमान हैं, अपने भक्तोंके इच्छानुसार समय-समयपर मङ्गलविग्रह प्रकट करते हैं और लक्ष्मीरूप लावण्यमूर्ति ललनाकी भी शोभा बढ़ानेवाले हैं, तथा जिनका मुखमण्डल झिलमिलाते हुए कुण्डलों से सुशोभित है—उन परम पवित्र कमलनयन श्रीहरि का तुम्हारे पौत्र को प्रत्यक्ष दर्शन होगा। श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी ! दिति ने जब सुना कि मेरा पौत्र भगवान्‌ का भक्त होगा, तब उसे बड़ा आनन्द हुआ तथा यह जानकर कि मेरे पुत्र साक्षात् श्रीहरि के हाथसे मारे जायँगे, उसे और भी अधिक उत्साह हुआ। (20-50)


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