श्री गर्भगीता
अर्जुन उवाच
हे भगवन् ! कृपया बताएं कि जीव जब गर्भ में आता है तो वह किस पूर्व कर्म के कारण आता है। हे मधुसूदन ! प्राणी जन्म के पूर्व गर्भवास का कष्ट भोगता है और जन्म लेते समय भी असह्य कष्ट पाता है। इसके उपरान्त वह संसार में रह कर रोग-पीड़ा भोगता है। उसे बुढ़ापा आता है। प्राणी की मृत्यु भी होती है।
अस्तु, प्रभुजी ! कृपया यह बताएं कि वे कौन से कर्म हैं ? जो प्राणी को जन्म-मरण से रहित बनाते हैं।
श्री भगवानुवाच
हे अर्जुन ! जन्म-मरण का बन्धन उन प्राणियों की नियति है जो संसार में लिप्त रहते हैं। ऐसे प्राणी संसार में अनुरक्त रहते हैं अर्थात् संसार के नश्वर पदार्थों से ही प्रेम करते हैं। वे सांसारिक वस्तुओं की कामना करते हैं। प्राणी संसार की माया पाने की चेष्टा तो करता है परन्तु मेरी भक्ति पर ध्यान नहीं देता। इसके कारण वह बारम्बार और अनेक योनियों में जाकर जरा-मरण का दुःख उठाता है।
अर्जुन उवाच
हे जनार्दन ! सांसारिक माया-मोह से मुक्ति तो बहुत कठिन है। माया चित्त हर लेती है। मन काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी विकार से घिरा मदमस्त हाथी है। तृष्णा रूपी शक्ति इसे प्रेरणा देती है। पंच विकारों में अहंकार प्रबल है जो कि प्राणी को नरक में ले जाता है। हे हृषिकेश ! इस मदमस्त हाथी को कैसे वश में किया जाए? मन को भक्ति में लगाने हेतु क्या उपाय करना उचित है ?
श्रीभगवानुवाच
हे धनंजय ! जैसे मदमस्त हाथी को वश में करने के लिए अंकुश की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मन को वश में करने के लिए अभ्यास द्वारा ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होता है। भक्ति और ज्ञान बराबर अभ्यास करते रहने पर ही प्राप्त होते हैं।
अर्जुन उवाच
हे मधुसूदन ! आपकी भक्ति के लिए कोई वनखण्डों में जा रमते हैं और कोई वैरागी बनकर स्थान-स्थान पर भ्रमण करते रहते हैं। हे प्रभु ! कृपया बताएं कि आपकी भक्ति कैसे मिल सकती है ?
श्रीभगवानुवाच
हे अर्जुन ! मेरी खोज में वन-वन भटकते संन्यासी अथवा स्थान-स्थान पर जानेवाले वैरागी मुझे तब तक प्राप्त नहीं कर पाते, जब तक उनके हृदय में मेरा निवास नहीं होता। तप अथवा वैराग्य का अहं तो मेरी भक्ति पाने में बाधा डालता है। जटा धारण करने अथवा भस्म लगा वैरागी बनने मात्र से जीव मेरी कृपा का पात्र नहीं बन जाता। अहंकारी को तो मेरा दर्शन सुलभ ही नहीं होता। मैं शुद्ध हृदय वाले सतत अभ्यासी ऐसे जीव को मिलता हूँ जो काम, क्रोध, मोह, ममता और अहंकार से परे है।
अर्जुन उवाच
हे माधव! प्राणी पंच विकार जनित प्रवृत्ति के कारण लौकिक जीवन नष्ट कर लेता है। हे मुरारी ! कृपया बताएं कि वह कौन-सा पाप है जिसके कारण किसी व्यक्ति की स्त्री असमय मर जाती है ? किन पापों के फलस्वरूप अल्पायु में पुत्र मर जाता है? कौन से पाप के कारण व्यक्ति वीर्यहीन हो जाता है।
श्रीभगवानुवाच
किसी का लिया हुआ ऋण नहीं चुकाने वाला पति/पत्नी हानि का दुःख उठाता है। उसी प्रकार किसी की धरोहर (अमानत) को न लौटाने वाले का पुत्र अल्प आयु में मर जाता है। किसी को सहयोग, सहायता का आश्वासन देकर भी समय आने पर सहयोग न करने वाला वीर्यहीन होता है। ये सब भयंकर पाप है। जो स्त्री- पुरुष एकाकी होकर भोगते हैं।
अर्जुन उवाच
हे दयानिधे ! किस पाप के फलस्वरूप प्राणी सतत रोगी रहता है और किस कुकर्म के फलस्वरूप बोझा ढोने वाला जघन्य पशु बनता है।
श्रीभगवानुवाच
हे अर्जुन ! कोई सौभाग्य-कांक्षिणी कन्या को बेचने वाला सतत रोगी रहता है। अभक्ष्य भोजन और मादक द्रव्य का सेवन करने वाला अधम योनि में जन्म लेता है। झूठी गवाही देने वाला, भोजन बना कर 'पंच कंवल' कर स्वयं भोजन करने वाला बिल्ली और सूकर की योनि प्राप्त करता है।
अर्जुन उवाच
हे प्रभु ! इस संसार में जिनको आपने धन-धान्य दिया है और उत्तम साधन दिए हैं तो उनका पुण्य क्या था ?
श्रीभगवानुवाच
उत्तम रीति से सुयोग्य पात्र को स्वर्णादि दान करने वाला धन-धान्य और वाहन आदि पाता है। सत्य सनातन वैदिक रीति से सुयोग्य वर को विधिपूर्वक कन्या दान करने वाला उत्तम मानव योनि का अधिकारी बनाता है।
अर्जुन उवाच
हे प्रभु! संसार में कोई तो सर्वांग सुंदर है और कोई कुरूप है। सो श्रेष्ठ स्वास्थ्य और स्वरूपवान शरीर किन पुण्यों से मिलता है ?
श्रीभगवानुवाच
हे कौन्तेय ! पुरुष का रूप-स्वरूप नहीं गुण महत्त्वपूर्ण है, फिर भी आकर्षक देह संत-विद्वानों की सेवा एवं निरन्तर ज्ञान की आकांक्षा के फलस्वरूप मिलती है।
अर्जुन उवाच
हे दयानिधि ! प्राणी धन और सांसारिक सुखों से मोह क्यों रखता है ?
श्रीभगवानुवाच
हे महाबाहु ! अगर मेरी कृपा से प्राणी वंचित हो जाए तो धन-दौलत और सांसारिक रूप आदि से प्रीति करने लगता है। यह सब नाशवान है। विवेकी साधक को इसे दूर रहना चाहिए। जो व्यक्ति सांसारिक व्यामोह से मुक्त हो काशी, हरिद्वार, अवन्तिका, अयोध्या आदि पवित्र स्थलों के दर्शन और मेरी निष्काम भक्ति करता है, वह राजा जैसी सम्पन्नता और ज्ञान प्राप्त करता है। इसी प्रकार विक्रम भाव से दान (गुप्त) करने वाला, कामना रहित हो कर दूसरों की सेवा करने वाला सदा अपनी आवश्यकतानुसार धन पाता है। उसकी काया निरोगी रहती है।
अर्जुन उवाच
हे प्रभु! प्राणी में रक्त विकार, खण्ड वायु, अंधा अथवा पंगुता का कारण क्या है, बताने की कृपा करें।
श्रीभगवानुवाच
हे धनंजय ! मेरी भक्ति से परे माया लिप्त, नशे-व्यशनों में रत रहने वाला, क्रोधी, रक्त विकारी, आलए में डूबे दरिद्री, शील-संयम रहित खण्ड वायु जैसे रोग से ग्रस्त होते हैं। पतिव्रत धर्म का उल्लंघन करने वाली मो और संयम रहित पति में पंगुता, ज्योतिहीनता आती है।
अर्जुन उवाच
हे जगद्गुरु ! कृपा करके गुरुदीक्षा के विषय में भी कुछ बताएं।
श्रीभगवानुवाच
हे कौन्तेय ! तुम धन्य हो और धन्य है तुम्हारी माता । तुम्हारा यह प्रश्न संसार के लिए कल्याणकारी है।
हे पार्थ ! संयमी और इन्द्रियों को वश में करनेवाला कोई सिद्ध पुरुष, जो ईश भक्ति और परोपकार में लगा हो, गुरु रूप में धारण करें। अपने गुरु के मार्गदर्शन में मेरी आराधना कर व्यक्ति गुरु कृपा से मेरी भक्ति पाता है। ऐसे गुरु से विमुख प्राणी सप्त ग्राम को मारनेका पाप भोगता है। उसका मुख देखना भी पाप हे। जैसे मदिरा- भांड से सटा गंगाजल अशुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार गुरुद्रोही, गृहस्थ साधक की साधना निष्फल रहती है। ऐसा व्यक्ति कूकर, सूकर गर्दभ, काक आदि योनियों को पाता है। वह अजगर के समान आलस्य में डूबा तिरस्कार पाता है। अतः गुरु आज्ञापालक, साधनशील, व्यशन-रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए।
हे धनंजय गुरु दीक्षा बिना साधक का उद्धार नहीं होता है। मेरी भक्ति की इच्छा करनेवाले को गुरु धारण करना उत्तम है। जैसे नदियों में गंगा, व्रतों में एकादशी और जीवों में मनुष्य तन श्रेष्ठ है उसी प्रकार साधक की सिद्धियों में गुरु कृपा श्रेष्ठ है। गुरु सेवा का फल अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फलदायी है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।
।। इति श्री गर्भगीता सम्पूर्णम् ।।
Post a Comment
Post a Comment