*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 03 || अध्याय 10 ||
*दस प्रकार की सृष्टि का वर्णन*
विदुरजी ने कहा—मुनिवर ! भगवान् नारायण के अन्तर्धान हो जानेपर सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने अपने देह और मन से कितने प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की ? भगवन् ! इनके सिवा मैंने आपसे और जो-जो बातें पूछी हैं, उन सबका भी क्रमश: वर्णन कीजिये और मेरे सब संशयों को दूर कीजिये; क्योंकि आप सभी बहुज्ञों में श्रेष्ठ हैं। सूतजी कहते हैं—शौनकजी ! विदुरजी के इस प्रकार पूछनेपर मुनिवर मैत्रेय जी बड़े प्रसन्न हुए और अपने हृदयमें स्थित उन प्रश्नों का इस प्रकार उत्तर देने लगे।
श्रीमैत्रेयजीने कहा—अजन्मा भगवान् श्रीहरि ने जैसा कहा था, ब्रह्माजी ने भी उसी प्रकार चित्त को अपने आत्मा श्रीनारायण में लगाकर सौ दिव्य वर्षोंतक तप किया।ब्रह्माजीने देखा कि प्रलय- कालीन प्रबल वायुके झकोरोंसे, जिससे वे उत्पन्न हुए हैं तथा जिसपर वे बैठे हुए हैं वह कमल तथा जल काँप रहे हैं । प्रबल तपस्या एवं हृदय में स्थित आत्मज्ञान से ब्रह्माजी का विज्ञानबल बढ़ गया। और उन्होंने जलके साथ वायु को पी लिया ।फिर जिसपर स्वयं बैठे हुए थे, उस आकाश- व्यापी कमलको देखकर उन्होंने विचार किया कि ‘पूर्वकल्पमें लीन हुए लोकों को मैं इसी से रचूँगा’।
तब भगवान् के द्वारा सृष्टिकार्य में नियुक्त ब्रह्माजी ने उस कमलकोशमें प्रवेश किया और उस एक के ही भू:, भुव:, स्व:—ये तीन भाग किये, यद्यपि वह कमल इतना बड़ा था कि उसके चौदह भुवन या इससे भी अधिक लोकों के रूप में विभाग किये जा सकते थे। जीवों के भोगस्थान के रूप में इन्हीं तीन लोकों का शास्त्रों में वर्णन हुआ है; जो निष्काम कर्म करनेवाले हैं, उन्हें मह:, तप:, जन: और सत्यलोकरूप ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है । विदुरजीने कहा—ब्रह्मन् ! आपने अद्भुतकर्मा विश्वरूप श्रीहरि की जिस काल नामक शक्ति की बात कही थी, प्रभो ! उसका कृपया विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विषयों का रूपान्तर ही काल का आकार है। स्वयं तो वह निर्विशेष, अनादि और अनन्त है। उसीको निमित्त बनाकर भगवान् खेल-खेल में अपने-आपको ही सृष्टि के रूप में प्रकट कर देते हैं । पहले यह सारा विश्व भगवान् की मायासे लीन होकर ब्रह्मरूप से स्थित था। उसीको अव्यक्तमूर्ति काल के द्वारा भगवान् ने पुन: पृथक् रूप से प्रकट किया है । यह जगत् जैसा अब है वैसा ही पहले था और भविष्य में भी वैसा ही रहेगा। इसकी सृष्टि नौ प्रकारकी होती है तथा प्राकृत-वैकृत भेद से एक दसवीं सृष्टि और भी है। और इसका प्रलय काल, द्रव्य तथा गुणोंके द्वारा तीन प्रकारसे होता है। अब पहले मैं दस प्रकारकी सृष्टिका वर्णन करता हूँ। पहली सृष्टि महत्तत्त्व की है। भगवान् की प्रेरणा से सत्त्वादि गुणोंमें विषमता होना ही इसका स्वरूप है।
दूसरी सृष्टि अहंकार की है, जिससे पृथ्वी आदि पञ्चभूत एवं ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। तीसरी सृष्टि भूतसर्ग है, जिसमें पञ्चमहाभूतों को उत्पन्न करनेवाला तन्मात्रवर्ग रहता है। चौथी सृष्टि इन्द्रियों की है, यह ज्ञान और क्रियाशक्ति से सम्पन्न होती है। पाँचवीं सृष्टि सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न हुए इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओंकी है, मन भी इसी सृष्टिके अन्तर्गत है। छठी सृष्टि अविद्याकी है। इसमें तामिस्र, अन्धतामिस्र, तम, मोह और महामोह—ये पाँच गाँठें हैं। यह जीवोंकी बुद्धिका आवरण और विक्षेप करनेवाली है। ये छ: प्राकृत सृष्टियाँ हैं, अब वैकृत सृष्टियोंका भी विवरण सुनो। (01-17)
जो भगवान् अपना चिन्तन करनेवालों के समस्त दु:खों को हर लेते हैं, यह सारी लीला उन्हीं श्रीहरि की है। वे ही ब्रह्मा के रूप में रजोगुण को स्वीकार करके जगत् की रचना करते हैं। छ: प्रकार की प्राकृत सृष्टियों के बाद सातवीं प्रधान वैकृत सृष्टि इन छ: प्रकार के स्थावर वृक्षों की होती है । वनस्पति, औषधि, लता, त्वक्सार, विरुध् और द्रुम इनका संचार नीचे (जड़) से ऊपरकी और होता है, इनमें प्राय ज्ञानशक्ति प्रकट नहीं रहती, ये भीतर ही भीतर केवल स्पर्शका अनुभव करते हैं तथा इनमें से प्रत्येक में कोई विशेष गुण रहता है।
आठवीं सृष्टि तिर्यग्योनियों (पशु-पक्षियों) की है। वह अट्ठाईस प्रकार की मानी जाती है। इन्हें काल का ज्ञान नहीं होता, तमोगुणी अधिकता के कारण ये केवल खाना-पीना, मैथुन करना, सोना अदि ही जानते हैं, इन्हें सूँघने मात्र से वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है। इनके हृदय मे विचारशक्ति या दूरदर्शिता नहीं होती । साधुश्रेष्ठ! इन तिर्यकों मे गौ, बकरा, भैंसा, कृष्ण-मृग, सूअर, नीलगाय, रुरु नामक मृग, भेड़ और ऊँट – ये द्विशफ (दो सुरोंवाले) पशु कहलाते है।
गधा, घोडा, खच्चर, गौरमृग, शरफ और चमरी- ये एकशफा (एक खुरवाले) है ॥ अब पांच नखवाले पशु पक्षियों के नाम सुनो। कुत्ता, गीदड़, भेडिया, बाघ, बिलाव, खरगोश, साही, सिंह, बन्दर, हाथी, कछुआ,गोह और मगर आदि ( पशु ) हैं। कंक ( बगुला ), गिद्ध, बटेर, बाज, भास, बल्लुक, मोर, हंस, सारस, चकवा, कौवा, और उल्लू आदि उड़ने वाले जीव कहलाते हैं।
विदुरजी ! नवीं सृष्टि मनुष्यों की हैं ॥ इसके आहार का प्रवाह ऊपर (मुंह ) से नीचे कि ओर होता है ॥ मनुष्य रजोगुणप्रधान, कर्मपरायण और दु:खरूप विषयों में ही सुख माननेवाले होते हैं। स्थावर, पशु-पक्षी और मनुष्य—ये तीनों प्रकारकी सृष्टियाँ तथा आगे कहा जानेवाला देवसर्ग वैकृत सृष्टि हैं तथा जो महत्तत्त्वादिरूप वैकारिक देवसर्ग है, उसकी गणना पहले प्राकृत सृष्टि में की जा चुकी है। इनके अतिरिक्त सनत्कुमार आदि ऋषियों का जो कौमारसर्ग है वह प्राकृत-वैकृत दोनों प्रकार का है।
देवता, पितर, असुर, गन्धर्व-अप्सरा, यक्ष-राक्षस, सिद्ध-चारण-विद्याधर, भूत-प्रेत-पिशाच और किन्नर-किम्पुरुष-अश्वमुख आदि भेदसे देवसृष्टि आठ प्रकारकी है। विदुरजी ! इस प्रकार जगत्- कर्ता श्रीब्रह्माजी की रची हुई यह दस प्रकारकी सृष्टि मैंने तुमसे कही । अब आगे मैं वंश और मन्वन्तरादिका वर्णन करूँगा। इस प्रकार सृष्टि करनेवाले सत्यसङ्कल्प भगवान् हरि ही ब्रह्माके रूपसे प्रत्येक कल्पके आदिमें रजोगुणसे व्याप्त होकर स्वयं ही जगत्के रूपमें अपनी ही रचना करते हैं। (18-29)
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