माहात्म्य || अध्याय 03 || *भक्ति के कष्ट की निवृत्ति*

*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
       "श्रीमद्भागवतमहापुराण" 

माहात्म्य || अध्याय 03 || 
*भक्ति के कष्ट की निवृत्ति*
नारदजी कहते हैं—अब मैं भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को स्थापित करने के लिये प्रयत्नपूर्वक श्रीशुकदेवजी के कहे हुए भागवतशास्त्र की कथा द्वारा उज्ज्वल ज्ञानयज्ञ करूँगा। यह यज्ञ मुझे कहाँ करना चाहिये, आप इसके लिये कोई स्थान बता दीजिये। आप लोग वेद के पारगामी हैं, इसलिये मुझे इस शुकशास्त्र की महिमा सुनाइये। यह भी बताइये कि श्रीमद्भागवत की कथा कितने दिनों में सुनानी चाहिये और उसके सुनने की विधि क्या है।

सनकादि बोले—आप बड़े विनीत और विवेकी हैं। सुनिये, हम आपको ये सब बातें बताते हैं। हरिद्वार के पास आनन्द नाम का एक घाट है। वहाँ अनेकों ऋषि रहते हैं तथा देवता और सिद्ध लोग भी उसका सेवन करते रहते हैं। भाँति-भाँति के वृक्ष और लताओं के कारण वह बड़ा सघन है और वहाँ बड़ी कोमल नवीन बालू बिछी हुई है। वह घाट बड़ा ही सुरम्य और एकान्त प्रदेश में है, वहाँ हर समय सुनहले कमलों की सुगन्ध आया करती है। उसके आस-पास रहने वाले सिंह, हाथी आदि परस्पर-विरोधी जीवों के चित्त में भी वैर भाव नहीं है। वहाँ आप बिना किसी विशेष प्रयत्न के ही ज्ञानयज्ञ आरम्भ कर दीजिये, उस स्थान पर कथा में अपूर्व रस का उदय होगा। भक्ति भी अपनी आँखों के ही सामने निर्बल और जराजीर्ण अवस्था में पड़े हुए ज्ञान और वैराग्य को साथ लेकर वहाँ आ जायगी। क्योंकि जहाँ भी श्रीमद्भागवत की कथा होती है वहाँ ये भक्ति आदि अपने-आप पहुँच जाते हैं। वहाँ कानों में कथा के शब्द पड़ने से ये तीनों तरुण हो जायँगे।

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार कहकर नारदजी के साथ सनकादि भी श्रीमद्भागवत कथामृत का पान करने के लिये वहाँ से तुरंत गंगातट चले आये। जिस समय वे तट पर पहुँचे, भूलोक, देवलोक और ब्रह्म्लोक—सभी जगह इस कथा का हल्ला हो गया। जो-जो भगवत्कथा के रसिक विष्णु भक्त थे, वे सभी श्रीमद्भागवतामृत का पान करने के लिये सबसे आगे दौड़-दौड़कर आने लगे। भृगु, वसिष्ठ, च्यवन, गौतम, मेधातिथि, देवल, देवरात, परशुराम, विश्वामित्र, शाकल, मार्कण्डेय, दत्तात्रेय, पिप्पलाद, योगेश्वर व्यास और पराशर, छायाशुक, जाजलि और जह्नु आदि सभी प्रधान-प्रधान मुनिगण अपने-अपने पुत्र, शिष्य और स्त्रियों समेत बड़े प्रेम से वहाँ आये। इनके सिवा वेद, वेदान्त (उपनिषद्), मन्त्र, तन्त्र, सत्रह पुराण और छहों शास्त्र भी मूर्तिमान होकर वहाँ उपस्थित हुए। गंगा आदि नदियाँ, पुष्कर आदि सरोवर, कुरुक्षेत्र आदि समस्त क्षेत्र, सारी दिशाएँ, दण्डक आदि वन, हिमालय आदि पर्वत तथा देव, गन्धर्व और दानव आदि सभी कथा सुनने चले आये। जो लोग अपने गौरव के कारण नहीं आये, महर्षि भृगु उन्हें समझा-बुझाकर ले आये। तब कथा सुनाने के लिये दीक्षित होकर श्रीकृष्णपरायण सनकादि नारदजी के दिये हुए श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हुए। उस समय सभी श्रोताओं ने उनकी वन्दना की। श्रोताओं में वैष्णव, विरक्त, संन्यासी और ब्रह्मचारी लोग आगे बैठे और उन सबके आगे नारदजी विराजमान हुए। एक ओर ऋषिगण, एक ओर देवता, एक ओर वेद और उपनिषदादि तथा एक ओर तीर्थ बैठे, और दूसरी ओर स्त्रियाँ बैठीं। उस समय सब ओर जय-जयकार, नमस्कार और शंखों का शब्द होने लगा और अबीर-गुलाल, खील एवं फूलों की खूब वर्षा होने लगी। कोई-कोई देवश्रेष्ठ तो विमानों पर चढ़कर वहाँ बैठे हुए सब लोगों पर कल्पवृक्ष के पुष्पों की वर्षा करने लगे।

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार पूजा समाप्त होने पर जब सब लोग एकाग्रचित्त हो गये, तब सनकादि ऋषि महात्मा नारद को श्रीमद्भागवत का माहात्म्य स्पष्ट करके सुनाने लगे। सनकादि ने कहा—अब हम आपको इस भागवत शास्त्र की महिमा सुनाते हैं। इसके श्रवण मात्र से मुक्ति हाथ लग जाती है। श्रीमद्भागवत की कथा का सदा-सर्वदा सेवन, आस्वादन करना चाहिये। इसके श्रवण मात्र से श्रीहरि हृदय में आ विराजते हैं। इस ग्रन्थ में अठारह हजार श्लोक और बारह स्कन्ध हैं तथा श्रीशुकदेव और राजा परीक्षित् का संवाद है। आप यह भागवत शास्त्र ध्यान देकर सुनिये। यह जीव तभी तक अज्ञानवश इस संसार चक्र में भटकता है, जब तक क्षण भर के लिये भी कानों में इस शुकशास्त्र की कथा नहीं पड़ती। बहुत-से शास्त्र और पुराण सुनने से क्या लाभ है, इससे तो व्यर्थ का भ्रम बढ़ता है। मुक्ति देने के लिये तो एकमात्र भागवत शास्त्र ही गरज रहा है। जिस घर में नित्यप्रति श्रीमद्भागवत की कथा होती है, वह तीर्थरूप हो जाता है और जो लोग उसमें रहते हैं, उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ इस शुकशास्त्र की कथा का सोलहवाँ अंश भी नहीं हो सकते। तपोधनो! जब तक लोग अच्छी तरह श्रीमद्भागवत का श्रवण नहीं करते, तभी तक उनके शरीर में पाप निवास करते हैं। फल की दृष्टि से इस शुकशास्त्र कथा की समता गंगा, गया, काशी, पुष्कर या प्रयाग—कोई तीर्थ भी नहीं कर सकता। (01-32)

यदि आपको परम गति की इच्छा है तो अपने मुख से ही श्रीमद्भागवत के आधे अथवा चौथाई श्लोक का भी नित्य नियमपूर्वक पाठ कीजिये। ॐकार, गायत्री, पुरुषसूक्त, तीनों वेद, श्रीमद्भागवत ‘ॐ नमो भगवते वासुदेव’—यह द्वादशाक्षर मन्त्र, बारह मूर्तियों वाले सूर्य भगवान्, प्रयाग, संवत्सररूप काल, ब्राह्मण, अग्निहोत्र, गौ, द्वादशी, तिथि, तुलसी, वसन्त ऋतु और भगवान् पुरुषोत्तम—इन सबमें बुद्धिमान् लोग वस्तुतः कोई अन्तर नहीं मानते। जो पुरुष अहर्निश अर्थ सहित श्रीमद्भागवत शास्त्र का पाठ करता है, उसके करोंड़ो जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो पुरुष नित्यप्रति भागवत का आधा या चौथाई श्लोक भी पढता है, उसे राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है। नित्य भागवत का पाठ करना, भगवान् का चिन्तन करना, तुलसी को सींचना और गौ की सेवा करना—ये चारों समान हैं। जो पुरुष अन्त समय में श्रीमद्भागवत का वाक्य सुन लेता है, उन पर प्रसन्न होकर भगवान् उसे वैकुण्ठधाम देते हैं। जो पुरुष इसे सोने के सिंहासन पर रखकर विष्णु भक्त को दान करता है, वह अवश्य ही भगवान् का सायुज्य प्राप्त करता है।

जिस दुष्ट ने अपनी सारी आयु में चित्त को एकाग्र करके श्रीमद्भागवतामृत का थोडा-सा भी रसास्वादन नहीं किया, उसने तो अपना सारा जन्म चाण्डाल और गधे के समान व्यर्थ ही गवाँ दिया; वह तो अपनी माता को प्रसव-पीड़ा पहुँचाने के लिये ही उत्पन्न हुआ। जिसने इस शुकशास्त्र के थोड़े-से भी वचन नहीं सुने, वह पापात्मा तो जीता हुआ ही मुर्दे के समान है। ‘पृथ्वी के भार स्वरूप उस पशु तुल्य मनुष्य को धिक्कार है’—यों स्वर्ग लोक में देवताओं में प्रधान इन्द्रादि कहा करते हैं। संसार में श्रीमद्भागवत की कथा का मिलना अवश्य ही कठिन है; जब करोंड़ो जन्मों का पुण्य होता है, तभी इसकी प्राप्ति होती है। नारदजी! आप बड़े ही बुद्धिमान् और योगनिधि हैं। आप प्रयत्नपूर्वक कथा का श्रवण कीजिये। इसे सुनने के लिये दिनों का कोई नियम नहीं है, इसे तो सर्वदा ही सुनना अच्छा है। इसे सत्यभाषण और ब्रह्मचर्य पालन पूर्वक सर्वदा ही सुनना ही श्रेष्ठ माना गया है। किन्तु कलियुग में ऐसा होना कठिन है; इसलिये इसकी शुकदेवजी ने जो विशेष विधि बतायी है, वह जान लेनी चाहिये। कलियुग में बहुत दिनों तक चित्त की वृत्तियों को वश में रखना, नियमों में बँधे रहना और किसी पुण्य कार्य के लिये दीक्षित रहना कठिन है; इसलिये सप्ताह श्रवण की विधि है। श्रद्धापूर्वक कभी भी श्रवण करने से अथवा माघ मास में श्रवण करने से जो फल होता है, वही फल श्रीशुकदेवजी ने सप्ताह श्रवण में निर्धारित किया है। मन के असंयम, रोगों की बहुलता और आयु की अल्पता के कारण तथा कलियुग में अनेकों दोषों की सम्भावना से ही सप्ताह श्रवण का विधान किया गया है। जो फल तप, योग और समाधि से भी प्राप्त नहीं हो सकता, वह सर्वांग रूप में सप्ताह श्रवण से सहज में ही मिल जाता है। सप्ताह श्रवण यज्ञ से बढ़कर है, व्रत से बढ़कर है, तप से कहीं बढ़कर है। तीर्थ सेवन से तो सदा ही बड़ा है, योग से बढ़कर है—यहाँ तक कि ध्यान और ज्ञान से भी बढ़कर है, अजी! इसकी विशेषता का कहाँ तक वर्णन करें, यह तो सभी से बढ़-चढ़कर है।

शौनकजी ने पूछा—सूतजी! यह तो आपने बड़े आश्चर्य की बात कही। अवश्य ही यह भागवत पुराण योगवेत्ता ब्रह्माजी के भी आदिकारण श्रीनारायण का निरूपण करता है; परन्तु यह मोक्ष की प्राप्ति में ज्ञानादि सभी साधनों का तिरस्कार करके इस युग में उनसे भी कैसे बढ़ गया? सूतजी ने कहा—शौनकजी! जब भगवान् श्रीकृष्ण इस धराधाम को छोड़कर अपने नित्यधाम को जाने लगे, तब उनके मुखारविन्द से एकादश स्कन्ध का ज्ञानोपदेश सुनकर भी उद्धवजी ने पूछा।

उद्धवजी बोले—गोविन्द! अब आप तो अपने भक्तों का कार्य करके परमधाम को पधारना चाहते हैं; किन्तु मेरे मन में एक बड़ी चिन्ता है। उसे सुनकर आप मुझे शान्त कीजिये। अब घोर कलिकाल आया ही समझिये, इसलिये संसार में फिर अनेकों दुष्ट प्रकट हो जायँगे; उनके संसर्ग से जब अनेकों सत्पुरुष भी उग्र प्रकृति के हो जायँगे, तब उनके भार से दबकर यह गोरूपिणी पृथ्वी किसकी शरण में जायगी ? कमलनयन! मुझे तो आपको छोड़कर इसकी रक्षा करने वाला कोई दूसरा दिखायी नहीं देता। इसलिये भक्तवत्सल! आप साधुओं पर कृपा करके यहाँ से मत जाइये। भगवन्! आपने निराकार और चिन्मात्र होकर भी भक्तों के लिये ही तो यह सगुण रूप धारण किया है। फिर भला, आपका वियोग होने पर वे भक्तजन पृथ्वी पर कैसे रह सकेंगे ? निर्गुणोपासना में तो बड़ा कष्ट है। इसलिये कुछ और विचार कीजिये। प्रभासक्षेत्र में उद्धवजी के ये वचन सुनकर भगवान् सोचने लगे कि भक्तों के अवलम्बन के लिये क्या व्यवस्था करनी चाहिये।

शौनक जी! तब भगवान् ने अपनी सारी शक्ति भागवत में रख दी; वे अन्तर्धान होकर इस भागवत समुद्र में प्रवेश कर गये। इसलिये यह भगवान् की साक्षात् शब्दमयी मूर्ति है। इसके सेवन, श्रवण, पाठ अथवा दर्शन से ही मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी से इसका सप्ताह श्रवण सबसे बढ़कर माना गया है और कलियुग में तो अन्य सब साधनों को छोड़कर यही प्रधान कर्म बताया गया है। कलिकाल में यही ऐसा धर्म है, जो दुःख, दरिद्रता, दुर्भाग्य और पापों की सफाई कर देता है तथा काम-क्रोधादि शत्रुओं पर विजय दिलाता है। अन्यथा, भगवान् की इस माया से पीछा छुड़ाना देवताओं के लिये भी कठिन है, मनुष्य तो इसे छोड़ ही कैसे सकते हैं। अतः इससे छूटने के लिये भी सप्ताह श्रवण का विधान किया गया है।

सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जिस समय सनकादि मुनीश्वर इस प्रकार सप्ताह श्रवण की महिमा का बखान कर रहे थे, उस सभा में एक बड़ा आश्चर्य हुआ; उसे मैं तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो। वहाँ तरुणावस्था को प्राप्त हुए अपने दोनों पुत्रों को साथ लिये विशुद्ध प्रेमरूपा भक्ति बार-बार ‘श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!’ आदि भगवन्नामों का उच्चारण करती हुई अकस्मात् प्रकट हो गयीं। सभी सदस्यों ने देखा कि परम सुन्दरी भक्तिरानी भागवत के अर्थों का आभूषण पहने वहाँ पधारीं। मुनियों की उस सभा में सभी यह तर्क-वितर्क करने लगे कि ये यहाँ कैसे आयीं, कैसे प्रविष्ट हुईं। तब सनकादि ने कहा—‘ये भक्तिदेवी अभी-अभी कथा के अर्थ से निकली हैं।’ उनके ये वचन सुनकर भक्ति ने अपने पुत्रों समेत अत्यन्त विनम्र होकर सनत्कुमारजी से कहा।

भक्ति बोलीं—मैं कलियुग में नष्टप्राय हो गयी थी, आपने कथामृत से सींचकर मुझे फिर पुष्ट कर दिया। अब आप यह बताइये कि मैं कहाँ रहूँ ? यह सुनकर सनकादि ने उससे कहा— ‘तुम भक्तों को भगवान् का स्वरूप प्रदान करने वाली, अनन्य प्रेम का सम्पादन करने वाली और संसार रोग को निर्मूल करने वाली हो; अतः तुम धैर्य धारण करके नित्य-निरन्तर विष्णु भक्तों के हृदयों में ही निवास करो। ये कलियुग के दोष भले ही सारे संसार पर अपना प्रभाव डालें, किन्तु वहाँ तुम पर इनकी दृष्टि भी नहीं पड़ सकेगी।’ इस प्रकार उनकी आज्ञा पाते ही भक्ति तुरन्त भगवद्भक्तों के हृदयों में जा विराजीं। जिनके हृदय में एकमात्र श्रीहरि की भक्ति निवास करती है; वे त्रिलोकी में अत्यन्त निर्धन होने पर भी परम धन्य हैं; क्योंकि इस भक्ति की डोरी से बँधकर तो साक्षात् भगवान् भी अपना परमधाम छोड़कर उनके हृदय में आकर बस जाते हैं। भूलोक में यह भागवत साक्षात् परब्रह्म का विग्रह है, हम इसकी महिमा कहाँ तक वर्णन करें। इसका आश्रय लेकर इसे सुनाने से तो सुनने और सुनाने वाले दोनों को ही भगवान श्रीकृष्ण की समता प्राप्त हो जाती है। अतः इसे छोड़कर अन्य धर्मों से क्या प्रयोजन है।(33-74)

Post a Comment