*॥ श्री हरि: शरणम् ॥*
महाप्रस्थानिक पर्व || अध्याय 03 ||
*युधिष्ठिर का इन्द्र और धर्म आदि के साथ वार्तालाप, युधिष्ठिर का अपने धर्म में दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्ग में जाना*
वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! तदनन्तर आकाश और पृथ्वी को सब ओर से प्रतिध्वनित करते हुए देवराज इन्द्र रथ के साथ युधिष्ठिर के पास आ पहुँचे और उनसे बोले- "कुन्तीनन्दन! तुम इस रथ पर सवार हो जाओ।"
अपने भाइयों को धराशायी हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर शोक से संतप्त हो इन्द्र से इस प्रकार बोले- "देवेश्वर! मेरे भाई मार्ग में गिरे पड़े हैं। वे भी मेरे साथ चलें, इसकी व्यवस्था कीजिये; क्योंकि मैं भाइयों के बिना स्वर्ग में जाना नहीं चाहता। पुरन्दर! राजकुमारी द्रौपदी सुकुमारी है। वह सुख पाने के योग्य है। वह भी हम लोगों के साथ चले, इसकी अनुमति दीजिये।"
इन्द्र ने कहा- "भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे सभी भाई तुमसे पहले ही स्वर्ग में पहुँच गये हैं। उनके साथ द्रौपदी भी है। वहाँ चलने पर वे सब तुम्हें मिलेंगे। भरतभूषण! वे मानव शरीर का परित्याग करके स्वर्ग में गये हैं; किंतु तुम इसी शरीर से वहाँ चलोगे, इसमें संशय नहीं है।"
युधिष्ठिर बोले- "भूत और वर्तमान के स्वामी देवराज! यह कुत्ता मेरा बड़ा भक्त है। इसने सदा ही मेरा साथ दिया है; अत: यह भी मेरे साथ चले, ऐसी आज्ञा दीजिये; क्योंकि मेरी बुद्धि में निष्ठुरता का अभाव है।" इन्द्र ने कहा- "राजन! तुम्हें अमरता, मेरी समानता, पूर्ण लक्ष्मी और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई है; अत: इस कुत्ते को छोड़ो और मेरे साथ चलो। इसमें कोई कठोरता नहीं है।"
युधिष्ठिर बोले- "सहस्रनेत्रधारी देवराज! किसी आर्य पुरुष के द्वारा निम्न श्रेणी का काम होना अत्यन्त कठिन है। मुझे ऐसी लक्ष्मी की प्राप्ति कभी न हो, जिसके लिये भक्तजन का त्याग करना पड़े।"
इन्द्र ने कहा- "धर्मराज! कुत्ता रखने वालों के लिये स्वर्गलोक में स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवाने का जो पुण्य होता है, उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं; इसलिये सोच-विचार कर काम करो। छोड़ दो इस कुत्ते को। ऐसा करने में कोई निर्दयता नहीं है।"
युधिष्ठिर बोले- "महेन्द्र! भक्त का त्याग करने से जो पाप होता है, उसका अन्त कभी नहीं होता। ऐसा महात्मा पुरुष कहते हैं। संसार में भक्त का त्याग ब्रह्महत्या के समान माना गया है; अत: मैं अपने सुख के लिये कभी किसी तरह भी आज इस कुत्ते का त्याग नहीं करूँगा। जो डरा हुआ हो, भक्त हो, मेरा दूसरा कोई सहारा नहीं है- ऐसा कहते हुए आर्तभाव से शरण में आया हो, अपनी रक्षा में असमर्थ-दुर्बल हो और अपने प्राण बचाना चाहता हो, ऐसे पुरुष को प्राण जाने पर भी मैं नहीं छोड़ सकता; यह मेरा सदा का व्रत है।"
इन्द्र ने कहा- "वीरवर! मनुष्य जो कुछ दान, यज्ञ, स्वाध्याय और हवन आदि पुण्यकर्म करता है, उस पर यदि कुत्ते की दृष्टि भी पड़ जाये तो उसके फल को क्रोधवश नामक राक्षस हर ले जाते हैं; इसलिये इस कुत्ते का त्याग कर दो। कुत्ते को त्याग देने से ही तुम देवलोक में पहुँच सकोगे। वीर! तुमने अपने भाइयों तथा प्यारी पत्नी द्रौपदी का परित्याग करके अपने किये हुए पुण्यकर्मों के फलस्वरूप देवलोक को प्राप्त किया है। फिर तुम इस कुत्ते को क्यों नहीं त्याग देते? सब कुछ छोड़कर अब कुत्ते के मोह में कैसे पड़ गये?"
युधिष्ठिर ने कहा- "भगवन! संसार में यह निश्चित बात है कि मरे हुए मनुष्यों के साथ न तो किसी का मेल होता है, न विरोध ही। द्रौपदी तथा अपने भाइयों को जीवित करना मेरे वश की बात नहीं है; अत: मर जाने पर मैंने उनका त्याग किया है, जीवितावस्था में नहीं। शरण में आये हुए को भय देना, स्त्री का वध करना, ब्राह्मण का धन लूटना और मित्रों के साथ द्रोह करना- ये चार अधर्म एक और भक्त का त्याग दूसरी ओर हो तो मेरी समझ में यह अकेला ही उन चारों के बराबर है।"
वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर का यह कथन सुनकर कुत्ते का रूप धारण करके आये हुए धर्मस्वरूपी भगवान बड़े प्रसन्न हुए और राजा युधिष्ठिर की प्रशंसा करते हुए मधुर वचनों द्वारा उनसे इस प्रकार बोले। साक्षात धर्मराज ने कहा- "राजेन्द्र! भरतनन्दन तुम अपने सदाचार, बुद्धि तथा सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति होने वाली इस दया के कारण वास्तव में सुयोग्य पिता के उत्तम कुल में उत्पन्न सिद्ध हो रहे हो। बेटा! पूर्वकाल में द्वैतवन के भीतर रहते समय भी एक बार मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी; जबकि तुम्हारे सभी भाई पानी लाने के लिये उद्योग करते हुए मारे गये थे। उस समय तुमने कुन्ती और माद्री दोनों माताओं में समानता की इच्छा रखकर अपने सगे भाई भीम और अर्जुन को छोड़ केवल नकुल को जीवित करना चाहा था। इस समय भी 'यह कुत्ता मेरा भक्त है' ऐसा सोचकर तुमने देवराज इन्द्र के भी रथ का परित्याग कर दिया है; अत: स्वर्गलोक में तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा नहीं है। भारत! भरतश्रेष्ठ! यही कारण है कि तुम्हें अपने इसी शरीर से अक्षय लोकों की प्राप्ति हुई है। तुम परम उत्तम दिव्यगति को पा गये हो।"
वैशम्पायन जी कहते हैं- यों कहकर धर्म, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, देवता तथा देवर्षियों ने पांडुपुत्र युधिष्ठिर को रथ पर बिठाकर अपने-अपने विमानों द्वारा स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। वे सब-के-सब इच्छानुसार विचरने वाले, रजोगुणशून्य पुण्यात्मा, पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्म वाले तथा सिद्ध थे। कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर उस रथ में बैठकर अपने तेज से पृथ्वी और आकाश को व्याप्त करते हुए तीव्र गति से ऊपर की ओर जाने लगे। उस समय सम्पूर्ण लोकों का वृत्तान्त जानने वाले, बोलने में कुशल तथा महान तपस्वी देवर्षि नारद जी ने देवमण्डल में स्थित हो उच्च स्वर से कहा- "कितने राजर्षि स्वर्ग में आये हैं, वे सभी यहाँ उपस्थित हैं, किंतु महाराज युधिष्ठिर अपने सुयश से उन सब की कीर्ति को आच्छादित करके विराजमान हो रहे हैं। अपने यश, तेज और सदाचार रूप सम्पत्ति से तीनों लोकों को आवृत करके अपने भौतिक शरीर से स्वर्गलोक में आने का सौभाग्य पांडुनन्दन युधिष्ठिर के सिवा और किसी राजा को प्राप्त हुआ हो, ऐसा हमने कभी नहीं सुना है। प्रभो! युधिष्ठिर! पृथ्वी पर रहते हुए अपने आकाश में नक्षत्र और ताराओं के रूप में जितने तेज देखे हैं, वे इन देवताओं के सहस्रों लोक हैं; इनकी ओर देखो।"
नारद जी की बात सुनकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ने देवताओं तथा अपने पक्ष के राजाओं की अनुमति लेकर कहा- "देवेश्वर! मेरे भाइयों को शुभ या अशुभ जो भी स्थान प्राप्त हुआ हो, उसी को मैं भी पाना चाहता हूँ। उसके सिवा दूसरे लोकों में जाने की मेरी इच्छा नहीं है।" राजा की बात सुनकर देवराज इन्द्र ने युधिष्ठिर से कोमल वाणी में कहा- "महाराज! तुम अपने शुभ कर्मों द्वारा प्राप्त हुए इस स्वर्गलोक में निवास करो। मनुष्य लोक के स्नेहपाश को क्यों अभी तक खींचे ला रहे हो? कुरुनन्दन! तुम्हें वह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है, जिसे दूसरा मनुष्य कभी और कहीं नहीं पा सका। तुम्हारे भाई ऐसा स्थान नहीं पा सके हैं। नरेश्वर! क्या अब भी मानवभाव तुम्हारा स्पर्श कर रहा है? राजन! यह स्वर्गलोक है। इन स्वर्गवासी देवर्षियों तथा सिद्धों का दर्शन करो।"
ऐसी बात कहते हुए एश्वर्यशाली देवराज से बुद्धिमान युधिष्ठिर ने पुन: यह अर्थयुक्त वचन कहा- "दैत्यसूदन! अपने भाइयों के बिना मुझे यहाँ रहने का उत्साह नहीं होता; अत: मैं वहीं जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे भाई गये हैं तथा जहाँ ऊँचे कद वाली, श्यामवर्णा, बुद्धिमती सत्त्वगुणसम्पन्ना एवं युवतियों में श्रेष्ठ द्रौपदी गयी है।" (01-38)
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