*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 10 || अध्याय 05 ||
*गोकुल में भगवान का जन्म महोत्सव*
श्री शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे। पुत्र का जन्म होने पर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्द से भर गया। उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। फिर वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुला कर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्र का जातकर्म-संस्कार करवाया। साथ ही देवता और पितरों की विधिपूर्वक पूजा भी करवायी। उन्होंने ब्राह्मणों को वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित दो लाख गायें दान कीं। रत्नों और सुनहरे वस्त्रों से ढके हुए तिल के सात पहाड़ दान किये। समय से, स्नान से, प्रक्षालन से, संस्कारों से, तपस्या से, यज्ञ से, दान से, और संतोष से द्रव्य शुद्ध होते हैं। परन्तु आत्मा की शुद्धि तो आत्मज्ञान से ही होती है।
उस समय ब्राह्मण, सूत, मागध और वंदीजन मंगलमय आशीर्वाद देने तथा स्तुति करने लगे। गायक गाने लगे। भेरी और दुन्दुभियाँ बार-बार बजने लगीं। ब्रजमण्डल के सभी घरों के द्वार, आँगन और भीतरी भाग झाड़-बुहार दिये गये, उनमें सुगन्धित जल का छिड़काव किया गया; उन्हें चित्र-विचित्र, ध्वजा-पताका, पुष्पों की मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्र और पल्लवों की बन्दनवारों से सजाया गया। गाय, बैल और बछड़ों के अंगों में हल्दी-तेल का लेप कर दिया गया और उन्हें गेरू आदि रंगीन धातुएँ, मोरपंख, फूलों के हार, तरह-तरह के सुन्दर वस्त्र और सोने की जंजीरों से सजा दिया गया। परीक्षित! सभी ग्वाल बहुमूल्य वस्त्र, गहने, अँगरखे और पगड़ियों से सुसज्जित होकर और अपने हाथों में भेंट की बहुत-सी सामग्रियाँ ले-लेकर नन्दबाबा के घर आये।
यशोदा जी के पुत्र हुआ है, यह सुनकर गोपियों को भी बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने सुन्दर-सुन्दर वस्त्र, आभूषण और अंजन आदि से अपना श्रृंगार किया। गोपियों के मुखकमल बड़े ही सुन्दर जान पड़ते थे। उन पर लगी हुई कुमकुम ऐसी लगती मानो कमल की केसर हो। उनके नितम्ब बड़े-बड़े थे। वे भेंट की सामग्री ले-लेकर जल्दी-जल्दी यशोदा जी के पास चलीं। उस समय उनके पयोधर हिल रहे थे।
गोपियों के कानों में चमकती हुई मणियों के कुण्डल झिलमिला रहे थे। गले में सोने के हार जगमगा रहे थे। वे बड़े सुन्दर-सुन्दर रंग-बिरंगे वस्त्र पहने हुए थीं। मार्ग में उनकी चोटियों में गुँथे हुए फूल बरसते जा रहे थे। हाथों में जड़ाऊ कंगन अलग ही चमक रहे थे। उनके कानों के कुण्डल, पयोधर और हार हिलते जाते थे। इस प्रकार नन्दबाबा के घर जाते समय उनकी शोभा बड़ी अनूठी जान पड़ती थी। नन्दबाबा के घर जाकर वे नवजात शिशु को आशीर्वाद देतीं ‘यह चिरजीवी हो, भगवन! इसकी रक्षा करो।’ और लोगों पर हल्दी-तेल से मिला हुआ पानी छिड़क देतीं तथा ऊँचे स्वर से मंगलगान करतीं थीं।
भगवान श्रीकृष्ण समस्त जगत के एकमात्र स्वामी हैं। उनके ऐश्वर्य, माधुर्य, वात्सल्य - सभी अनन्त हैं। वे जब नन्दबाबा के ब्रज में प्रकट हुए, उस समय उनके जन्म का महान उत्सव मनाया गया। उनमें बड़े-बड़े विचित्र और मंगलमय बाजे बजाये जाने लगे। आनन्द से मतवाले होकर गोपगण एक-दूसरे पर दही, दूध, घी और पानी उड़ेलने लगे। एक-दूसरे के मुँह पर मक्खन मलने लगे और मक्खन फेंक-फेंककर आनन्दोत्सव मनाने लगे।
नन्दबाबा स्वाभाव से ही परम उदार और मनस्वी थे। उन्होंने गोपों को बहुत-से वस्त्र, आभूषण और गायें दीं। सूत-मागध-वंदीजन नृत्य, वाद्य आदि विद्याओं से अपना जीवन-निर्वाह करने वालों तथा दूसरे गुणीजनों को भी नन्दबाबा ने प्रसन्नतापूर्वक उनकी मुँह माँगी वस्तुऐं देकर उनका यथोचित सत्कार किया। यह सब करने में उनका उद्देश्य यही था कि इन कर्मों से भगवान विष्णु प्रसन्न हों और मेरे इस नवजात शिशु का मंगल हो। नन्दबाबा के अभिनन्दन करने पर परम सौभाग्यवती रोहिणी जी दिव्य वस्त्र, माला और गले के भाँति-भाँति के गहनों से सुसज्जित होकर गृहस्वामिनियों की भाँति आने-जाने वाली स्त्रियों का सत्कार करती हुईं विचर रहीं थीं। परीक्षित! उसी दिन से नन्दबाबा के ब्रज में सब प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ अठखेलियाँ करने लगीं और भगवान श्रीकृष्ण के निवास तथा अपने स्वाभाविक गुणों के कारण वह लक्ष्मीजी का क्रीड़ास्थल बन गया ।
परीक्षित! कुछ दिनों के बाद नन्दबाबा ने गोकुल की रक्षा का भार दूसरे गोपों को सौंप दिया और वे स्वयं कंस का वार्षिक कर चुकाने के लिए मथुरा चले गये। जब वसुदेवजी को यह मालूम हुआ कि हमारे भाई नन्दजी मथुरा आये हैं और राजा कंस को उसका कर भी दे चुके हैं, तब वे जहाँ नन्दबाबा ठहरे हुए थे, वहाँ गये। वसुदेवजी को देखते ही नन्द जी सहसा उठकर खड़े हो गए मानों मृतक शरीर में प्राण आ गया हो। उन्होंने बड़े प्रेम से अपने प्रियतम वसुदेवजी को दोनों हाथों से पकड़कर हृदय से लगा लिया। नन्दबाबा उस समय प्रेम से विह्वल हो रहे थे। परीक्षित! नन्दबाबा ने वसुदेवजी का बड़ा स्वागत-सत्कार किया। वे आदरपूर्वक आराम से बैठ गये। उस समय उनका चित्त अपने पुत्र में लग रहा था।
वे नन्दबाबा से कुशलमंगल पूछकर कहने लगे(वसुदेवजी ने कहा)- ‘भाई! तुम्हारी अवस्था ढल चली थी और अब तक तुम्हें कोई संतान नहीं हुई थी। यहाँ तक कि अब तुम्हें सन्तान की कोई आशा भी न थी। यह बड़े सौभाग्य की बात है कि अब तुम्हें सन्तान प्राप्त हो गयी। यह भी बड़े आनन्द का विषय है कि आज हम लोगों का मिलना हो गया। अपने प्रेमियों का मिलना भी बड़ा दुर्लभ है। इस संसार का चक्र ही ऐसा है। इसे तो एक प्रकार का पुनर्जन्म ही समझना चाहिए। जैसे नदी के प्रबल प्रवाह में बहते हुए बेड़े और तिनके सदा एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही सगे-सम्बन्धी और प्रेमियों का भी एक स्थान पर रहना सम्भव नहीं है - यद्यपि वह सबको प्रिय लगता है। क्योंकि सबके प्रारब्ध कर्म अलग-अलग होते हैं। आजकल तुम जिस महावन में अपने भाई-बन्धु और स्वजनों के साथ रहते हो, उसमें जल, घास और लता-पत्रादि तो भरे-पूरे हैं न? वह वन पशुओं के लिए अनुकूल और सब प्रकार के रोगों से बचा है? भाई! मेरा लड़का अपनी माँ (रोहिणी) के साथ तुम्हारे ब्रज में रहता है। उसका लालन-पालन तुम और यशोदा करते हो, इसलिए वह तो तुम्हीं को अपने पिता-माता मानता होगा। वह अच्छी तरह है न?
मनुष्य के लिए वे ही धर्म, अर्थ और काम शास्त्रविहित हैं, जिनसे उसके स्वजनों को सुख मिले। जिनसे केवल अपने को ही सुख मिलता है; किन्तु अपने स्वजनों को दुःख मिलता है, वे धर्म, अर्थ और काम हितकारी नहीं हैं।
नन्दबाबा ने कहा- भाई वसुदेव! कंस ने देवकी के गर्भ से उत्पन्न तुम्हारे कई पुत्र मार डाले। अन्त में एक सबसे छोटी कन्या बच रही थी, वह भी स्वर्ग सिधार गयी। इसमें संदेह नहीं कि प्राणियों का सुख-दुःख भाग्य पर ही अवलम्बित हैं। भाग्य ही प्राणी का एकमात्र आश्रय है। जो जान लेता है कि जीवन के सुख-दुःख का कारण भाग्य ही है, वह उनके प्राप्त होने पर मोहित नहीं होता ।
वसुदेवजी ने कहा- भाई! तुमने राजा कंस को उसका सालाना कर चुका दिया। हम दोनों मिल भी चुके। अब तुम्हें यहाँ अधिक दिन नहीं ठहरना चाहिए, क्योंकि आजकल गोकुल में बड़े-बड़े उत्पात हो रहे हैं।
श्री शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! जब वसुदेव जी ने इस प्रकार कहा, तब नन्द आदि गोपों ने उनसे अनुमति लेकर, बैलों से जुते हुए छकड़ों पर सवार होकर गोकुल की यात्रा की। (01-32)
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