स्कन्ध 10 || अध्याय 07 ||*शकट-भंजन और तृणावर्त-उद्धार*

*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
       "श्रीमद्भागवतमहापुराण" 

स्कन्ध 10 || अध्याय 07 ||
*शकट-भंजन और तृणावर्त-उद्धार*
सकट भंजन ↑↓
***********तृणावर्त-उद्धार ↑↓
राजा परीक्षित ने पूछा- प्रभो! सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि अनेकों अवतार धारण करके बहुत-सी सुन्दर एवं सुनने में मधुर लीलाएँ करते हैं। वे सभी मेरे हृदय को बहुत प्रिय लगती हैं। उनके श्रवण मात्र से भगवत-सम्बन्धी कथा से अरुचि और विविध विषयों की तृष्णा भाग जाती है। मनुष्य का अंतःकरण शीघ्र-से-शीघ्र शुद्ध हो जाता है। भगवान के चरणों में भक्ति और उनके भक्तजनों से प्रेम भी प्राप्त हो जाता है। यदि आप मुझे उनके श्रवण का अधिकारी समझते हों, तो भगवान की उन्हीं मनोहर लीलाओं का वर्णन कीजिये। भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य-लोक में प्रकट होकर मनुष्य-जाति के स्वभाव का अनुसरण करते हुए जो बाल-लीलाएँ की हैं अवश्य ही वे अत्यन्त अद्भुत हैं, इसलिए आप अब उनकी दूसरी बाल-लीलाओं का भी वर्णन कीजिये।

श्री शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! एक बार भगवान श्रीकृष्ण के करवट बदलने का अभिषेक-उत्सव मनाया जा रहा था। उसी दिन उनका जन्म नक्षत्र भी था। घर में बहुत-सी स्त्रियों के बीच में खड़ी हुईं सती-साध्वी यशोदा जी  ने अपने पुत्र का अभिषेक किया। उस समय ब्राह्मण लोग मन्त्र पढ़कर आशीर्वाद दे रहे थे। नन्दरानी यशोदा जी ने ब्राह्मणों का खूब पूजन, सम्मान किया। उन्हें अन्न, वस्त्र, माला, गाय आदि मुँह माँगी वस्तुऐं दीं।

जब यशोदा जी ने उन ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन कराकर स्वयं बालक के नहलाने आदि का कार्य सम्पन्न कर लिया, तब यह देखकर कि मेरे लल्ला के नेत्रों में नींद आ रही है, अपने पुत्र को धीरे से शैय्या पर सुला दिया। थोड़ी देर में श्यामसुन्दर की आँखें खुलीं, तो वे स्तन-पान के लिये रोने लगे। उस समय मनस्विनी यशोदा जी उत्सव में आये हुए ब्रजवासियों के स्वागत-सत्कार में बहुत ही तन्मय हो रही थीं। इसलिए उन्हें श्रीकृष्ण का रोना सुनायी नही पड़ा। तब श्रीकृष्ण रोते-रोते अपने पाँव उछालने लगे। शिशु श्रीकृष्ण एक छकड़े के नीचे सोये हुए थे। उसके पाँव अभी लाल-लाल कोंपलों के समान बड़े ही कोमल और नन्हें-नन्हें थे। परन्तु वह नन्हा-सा पाँव लगते ही विशाल छकड़ा उलट गया । उस छकड़े पर दूध-दही आदि अनेक रसों की भरी हुई मटकियाँ और दूसरे बर्तन रखे हुए थे। वे सब-के-सब फूट-फाट गये, उसका जुआ फट गया। करवट बदलने के उत्सव में जितनी भी स्त्रियाँ आयी हुई थीं, वे सब और यशोदा, रोहिणी, नन्दबाबा और गोपगण इस विचित्र घटना को देखकर व्याकुल हो गये। वे आपस में कहने लगे - ‘अरे, यह क्या हो गया? यह छकड़ा अपने-आप कैसे उलट गया?’ वे इसका कोई कारण निश्चित न करे सके। वहाँ खेलते हुए बालकों ने गोपों और गोपियों से कहा कि ‘इस कृष्ण ने ही तो रोते-रोते अपने पाँव की ठोकर से इसे उलट दिया है, इसमें कोई संदेह नहीं।' परन्तु गोपों ने उसे ‘बालकों की बात’ मानकर उस पर विश्वास नहीं किया। ठीक ही है, वे गोप उस बालक के अनन्त बल को नहीं जानते थे।

यशोदा जी ने समझा यह किसी ग्रह आदि का उत्पात है। उन्होंने अपने रोते हुए लाड़ले लाल को गोद में लेकर ब्राह्मणों से वेद मन्त्रों के द्वारा शान्ति-पाठ कराया और फिर वे उसे स्तन पिलाने लगीं। बलवान गोपों ने छकड़े को फिर से सीधा कर दिया। उस पर पहले की तरह सारी सामग्री रख दी गयी। ब्राह्मणों ने हवन किया और दही, अक्षत, कुश तथा जल के द्वारा भगवान और उस छकड़े की पूजा की। जो किसी के गुणों में दोष नहीं निकालते, झूठ नहीं बोलते, दम्भ, ईर्ष्या और हिंसा नहीं करते तथा अभिमान रहित हैं - उन सत्यशील ब्राह्मणों का आशीर्वाद कभी विफल नहीं होता। यह सोचकर नन्दबाबा ने बालक को गोद में उठा लिया और ब्राह्मणों से साम, ऋक और यजुर्वेद मन्त्रों द्वारा संस्कृत एवं पवित्र औषधियों से युक्त जल से अभिषेक कराया। उन्होंने बड़ी एकाग्रता से स्वस्तययनपाठ और हवन कराकर ब्राह्मणों को अति उत्तम अन्न का भोजन कराया। इसके बाद नन्दबाबा ने अपने पुत्र की उन्नति और अभिवृद्धि की कामना से ब्राह्मणों को सर्वगुण सम्पन्न बहुत-सी गौएँ दीं। वे गौएँ वस्त्र, पुष्पमाला और सोने के हारों से सजी हुई थीं। ब्राह्मणों ने उन्हें आशीर्वाद दिया। यह बात स्पष्ट है कि जो वेदवेत्ता और सदाचारी ब्राह्मण होते हैं, उनका आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं होता।

एक दिन की बात है, सती यशोदा जी अपने प्यारे लल्ला को गोद में लेकर दुलार रहीं थीं। सहसा श्रीकृष्ण चट्टान के समान भारी बन गये। वे उनका भार न सह सकीं। उन्होंने भार से पीड़ित होकर श्रीकृष्ण को पृथ्वी पर बैठा दिया। इसके बाद उन्होंने भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण किया और घर के काम में लग गईं। तृणावर्त  नाम का एक दैत्य था। वह कंस  का निजी सेवक था। कंस की प्रेरणा से ही बवंडर के रूप में वह गोकुल में आया और बैठे हुए बालक श्रीकृष्ण को उड़ाकर आकाश में ले गया। उसने ब्रज-रज से सारे गोकुल को ढक दिया और लोगों की देखने की शक्ति हर ली। उसके अत्यन्त भयंकर शब्द से दसों दिशाऐं काँप उठीं। सारा ब्रज दो घड़ी तक रज और तम से ढका रहा। यशोदा जी ने अपने पुत्र को जहाँ बैठा दिया था, वहाँ जाकर देखा तो, श्रीकृष्ण वहाँ नहीं थे। उस समय तृणावर्त ने बवंडर रूप से इतनी बालू उड़ा रखी थी कि सभी लोग अत्यन्त उद्विग्न और बेसुध हो गये थे। उन्हें अपना-पराया कुछ भी नहीं सूझ रहा था।

उस जोर की आँधी और धूल की वर्षा में अपने पुत्र का पता न पाकर यशोदा जी को बड़ा शोक हुआ। वे अपने पुत्र की याद करके बहुत ही दीन हों गयीं और बछड़े के मर जाने पर गाय की जो दशा हो जाती है, वही दशा उनकी हो गयी। वे पृथ्वी पर गिर पड़ीं। बवंडर के शान्त होने पर जब धूल की वर्षा का वेग कम हो गया, तब यशोदा जी के रोने का शब्द सुनकर दूसरी गोपियाँ वहाँ दौड़ आयीं। नन्दनन्दन श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण को न देखकर उनके हृदय में भी बड़ा सन्ताप हुआ, आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। वे फूट-फूटकर रोने लगीं इधर तृणावर्त बवंडर रूप से जब भगवान श्रीकृष्ण को आकाश में उठा ले गया, तब उनके भारी बोझ को न संभाल सकने के कारण उसका वेग शान्त हो गया। वह अधिक चल न सका।

तृणावर्त अपने से भी भारी होने के कारण श्रीकृष्ण को नीलगिरी की चट्टान समझने लगा। उन्होंने उसका गला ऐसा पकड़ा कि वह उस अद्भुत शिशु को अपने से अलग नहीं कर सका। भगवान ने इतने ज़ोर से उसका गला पकड़ रखा था कि वह असुर निश्चेष्ट हो गया। उसकी आँखें बाहर निकल आयीं, बोलती बंद हो गयी तथा प्राण-पखेरू उड़ गये और बालक श्रीकृष्ण के साथ वह ब्रज में गिर पड़ा। वहाँ जो स्त्रियाँ इकट्ठी होकर रो रही थीं, उन्होंने देखा कि वह विकराल दैत्य आकाश से एक चट्टान पर गिर पड़ा और उसका एक-एक अंग चकनाचूर हो गया - ठीक वैसे ही, जैसे भगवान शंकर के बाणों से आहत हो त्रिपुरासुर गिरकर चूर-चूर हो गया था। भगवान श्रीकृष्ण उसके वक्षःस्थल पर लटक रहे थे। यह देखकर गोपियाँ विस्मित हो गयीं। उन्होंने झटपट वहाँ जाकर श्रीकृष्ण को गोद में ले लिया और लाकर उन्हें माता को दे दिया। बालक मृत्यु के मुख से सकुशल लौट आया। यद्यपि उसे राक्षस आकाश में उठा ले गया था, फिर भी वह बच गया। इस प्रकार बालक श्रीकृष्ण को फिर पाकर यशोदा आदि गोपियों तथा नन्द आदि गोपों को अत्यन्त आनन्द हुआ। वे कहने लगे- ‘अहो! यह तो बड़े आश्चर्य की बात है। देखो तो सही, यह कितनी अद्भुत घटना घट गयी! यह बालक राक्षस के द्वारा मृत्यु के मुख में डाल दिया गया था, परन्तु फिर जीता-जागता आ गया और उस हिंसक दुष्ट को उसके पाप ही खा गये! सच है, साधु पुरुष अपनी समता से ही सम्पूर्ण भयों से बच जाता है। हमने ऐसा कौन-सा, तप, भगवान की पूजा, प्याऊ-पौसला, कुआँ-बावली, बाग-बगीचे आदि पूर्त, यज्ञ, दान अथवा जीवों की भलाई की थी, जिसके फल से हमारा यह बालक मर कर भी अपने स्वजनों को सुखी करने के लिए लौट आया? अवश्य ही यह बड़े सौभाग्य की बात है।'

जब नन्दबाबा ने देखा कि महावन  में बहुत-सी अद्भुत घटनाएँ घटित हो रही हैं, तब आश्चर्यचकित होकर उन्होंने वसुदेव जी की बात का बार-बार समर्थन किया। एक दिन की बात है, यशोदा जी अपने प्यारे शिशु को अपनी गोद में लेकर बड़े प्रेम से स्तन पान करा रहीं थीं। वे वात्सल्य-स्नेह से इस प्रकार सराबोर हो रहीं थीं कि उनके स्तनों से अपने-आप ही दूध झरता जा रहा था। जब वे प्रायः दूध पी चुके और माता यशोदा उनके रुचिर मुस्कान से युक्त मुख को चूम रहीं थीं उसी समय श्रीकृष्ण को जँभाई आ गयी और माता ने उनके मुख में यह देखा कि उसमें आकाश, अन्तरिक्ष, ज्योतिर्मण्डल, दिशाऐं, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, समुद्र, द्वीप, पर्वत, नदियाँ, वन और समस्त चराचर प्राणी स्थित हैं।

परीक्षित! अपने पुत्र के मुँह में इस प्रकार सहसा सारा जगत देखकर मृगशावक-नयनी यशोदा जी का शरीर काँप उठा। उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें बन्द कर लीं। वे अत्यन्त आशचर्य चकित हो गयीं। (01-37) 

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