स्कन्ध 10 || अध्याय 23 || *यज्ञपत्त्निंयोपर कृपा*

*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
       "श्रीमद्भागवतमहापुराण" 

स्कन्ध 10 || अध्याय 23 || 
*यज्ञपत्त्निंयोपर कृपा*
ग्वालबालों ने कहा - नयनाभिराम बलराम! तुम बड़े पराक्रमी हो। हमारे चितचोर श्यामसुन्दर! तुमने बड़े-बड़े दुष्टों का संहार किया है। उन्हीं दुष्टों के समान यह भूख भी हमें सता रही है। अतः तुम दोनों इसे भी बुझाने का कोई उपाय करो।

श्री शुकदेव जी ने कहा - परीक्षित! जब ग्वालबालों ने देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण से इस प्रकार प्रार्थना की तब उन्होंने मथुरा की अपनी भक्त ब्राह्मण पत्नियों पर अनुग्रह करने के लिये यह बात कही -

‘मेरे प्यारे मित्रों! यहाँ से थोड़ी ही दूर पर वेदवादी ब्राह्मण स्वर्ग की कामना से आंगिरस नाम का यज्ञ कर रहे हैं। तुम उनकी यज्ञशाला में जाओ ग्वालबालों मेरे भेजने से वहाँ जाकर तुम लोग मेरे बड़े भाई भगवान श्रीकृष्ण बलराम जी का और मेरा नाम लेकर कुछ थोडा-सा भात-भोजन की सामग्री माँग लाओ’ जब भगवान ने ऐसी आज्ञा दी, तब ग्वालबाल उन ब्राह्मणों की यज्ञशाला में गये और उनसे भगवान की आज्ञा के अनुसार ही अन्न माँगा।

पहले उन्होंने पृथ्वी पर गिरकर दण्डवत प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर कहा - ‘पृथ्वी के मूर्तिमान देवता ब्राह्मणों! आपका कल्याण हो! आपसे निवेदन है कि हम व्रज के ग्वाले हैं। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की आज्ञा से हम आपके पास आये हैं। आप हमारी बात सुनें। भगवान बलराम और श्रीकृष्ण गौएँ चराते हुए यहाँ से थोड़े ही दूर पर आये हुए हैं। उन्हें इस समय भूख लगी है और वे चाहते हैं कि आप लोग उन्हें थोडा-सा भात दे दें।

ब्राह्मणों! आप धर्म का मर्म जानते हैं। यदि आपकी श्रद्धा हो, तो उन भोजनार्थियों के लिये कुछ भात दे दीजिये। सज्जनों! जिस यज्ञदीक्षा में पशुबलि होती है, उसमें और सौत्रामणी यज्ञ में दीक्षित पुरुष का अन्न नहीं खाना चाहिये। इनके अतिरिक्त और किसी भी समय किसी भी यज्ञ में दीक्षित पुरुष का भी अन्न खाने में में कोई दोष नहीं है।

परीक्षित! इस प्रकार भगवान के अन्न माँगने की बात सुनकर भी उन ब्राह्मणों ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। वे चाहते थे स्वर्गादि तुच्छ फल और उनके लिये बड़े-बड़े कर्मों में उलझे हुए थे। सच पूछो तो वे ब्राह्मण ज्ञान की दृष्टि से थे बालक की, परन्तु अपने को बड़ा ज्ञानवृद्ध मानते थे।

परीक्षित! देश, काल अनेक प्रकार की सामग्रियाँ, भिन्न-भिन्न कर्मों में विनियुक्त मन्त्र, अनुष्ठान की पद्धति, ऋत्विज-ब्रह्मा आदि यज्ञ कराने वाले, अग्नि, देवता, यजमान, यज्ञ, और धर्म - इन सब रूपों में एकमात्र भगवान ही प्रकट हो रहे हैं। वे ही इन्द्रियातीत परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ग्वालबालों के द्वारा भात माँग रहे हैं। परन्तु इन मूर्खों ने, जो अपने को शरीर ही माने बैठे हैं, भगवान को भी एक साधारण मनुष्य ही माना और उनका सम्मान नहीं किया।

परीक्षित! जब उन ब्राह्मणों ने ‘हाँ’ या ‘ना’ - कुछ नहीं कहा, तब ग्वालबालों की आशा टूट गयी; वे लौट आये और वहाँ की सब बात उन्होंने श्रीकृष्ण तथा बलराम से कह दी। उनकी बात सुनकर सारे जगत के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण  हँसने लगे। उन्होंने ग्वालबालों को समझाया कि संसार में असफलता तो बार-बार होती ही है, उससे निराश नहीं होना चाहिये; बार-बार प्रयत्न करते रहने से सफलता मिल ही जाती है।’

फिर उनसे कहा - ‘मेरे प्यारे ग्वालबालों! इस बार तुम लोग उनकी पत्नियों के पास जाओ और उनसे कहो कि राम और श्याम यहाँ आये हैं। तुम जितना चाहोगे उतना भोजन वे तुम्हें देंगी। वे मुझसे बड़ा प्रेम करती हैं। उनका मन सदा-सर्वदा मुझमें लगा रहता है।'

अबकी बार ग्वालबाल पत्नीशाला में गये। वहाँ जाकर देखा तो ब्राह्मणों की पत्नियाँ सुन्दर-सुन्दर वस्त्र और गहनों से सज-धजकर बैठी हैं। उन्होंने द्विजपत्नियों को प्रणाम करके बड़ी नम्रता से यह बात कही - ‘आप विप्रपत्नियों को हम नमस्कार करते हैं। आप कृपा करके हमारी बात सुनें। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ से थोड़ी ही दूर पर आये हुए हैं और उन्होंने ही हमें आपके पास भेजा है। वे ग्वालबाल और बलराम जी के साथ गौएँ चराते हुए इधर बहुत दूर आ गये हैं। इस समय उन्हें और उनके साथियों को भूख लगी है। आप उनके लिये कुछ भोजन दे दें।'

परीक्षित! वे ब्राह्मणियाँ बहुत दिनों से भगवान की मनोहर लीलाएँ सुनती थीं। उनका मन उनमें लग चुका था। वे सदा-सर्वदा इस बात के लिये उत्सुक रहतीं कि किसी प्रकार श्रीकृष्ण के दर्शन हो जायँ। श्रीकृष्ण के आने की बात सुनते ही वे उतावली हो गयीं। उन्होंने बर्तनों में अत्यन्त स्वादिष्ट और हितकर भक्ष्य, भोज्य, लह्य और चोष्य - चारों प्रकार की भोजन-सामग्री ले ली तथा भाई-बन्धु, पति-पुत्रों के रोकते रहने पर भी अपने प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण के पास जाने के लिये घर से निकल पड़ी - ठीक वैसे ही, जैसे नदियाँ समुद्र के लिये। क्यों न हो; न जाने कितने दिनों से पवित्रकीर्ति भगवान श्रीकृष्ण के गुण, लीला, सौन्दर्य और माधुर्य आदि का वर्णन सुन-सुनकर उन्होंने उनके चरणों पर अपना हृदय निछावर कर दिया था।

ब्राह्मण पत्नियों ने जाकर देखा कि यमुना के तटपर नये-नये कोंपलों से शोभायमान अशोक-वन में ग्वालबालों से घिरे हुए बलरामजी के साथ श्रीकृष्ण इधर-उधर घूम रहे हैं।

उनके साँवले शरीर पर सुनहला पीताम्बर झिलमिला रहा है। गले में वनमाला लटक रही है। मस्तक पर मोरपंख का मुकुट है। अंग-अंग में रंगीन धातुओं से चित्रकारी कर रखी है। नये-नये कोंपलों के गुच्छे शरीर में लगाकर नट का-सा वेष बना रखा है। एक हाथ अपने सखा ग्वालबाल के कंधे पर रखे हुए हैं और दूसरे हाथ से कमल का फूल नचा रहे हैं। कानों में कमल कुण्डल हैं, कपोलों पर घुँघराली अलकें लटक रही हैं और मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कान की रेखा से प्रफुल्लित हो रहा है।

परीक्षित! अब तक अपने प्रियतम श्यामसुन्दर के गुण और लीलाएँ अपने कानों से सुन-सुनकर उन्होंने अपने मन को उन्हीं के प्रेम में रँग में डाला था, उसी में सराबोर कर दिया था। अब नेत्रों के मार्ग से उन्हें भीतर ले जाकर बहुत देर तक वे मन-ही-मन उनका आलिंगन करती रहीं और इस प्रकार उन्होंने अपने हृदय की जलन शान्त की - ठीक वैसे ही, जैसे जाग्रत और स्वप्न-अवस्थाओं की वृत्तियाँ ‘यह मैं, यह मेरा’ इस भाव से जलती रहती हैं, परन्तु सुषुप्ति-अवस्था में उसके अभिमानी प्राज्ञ को पाकर उसी में लीन हो जाती हैं और उनकी सारी जलन मिट जाती है। (01-23)

प्रिय परीक्षित! भगवान सबके हृदय की बात जानते हैं, सबकी बुद्धियों के साक्षी है। उन्होंने जब देखा कि ये ब्राह्मण पत्नियाँ अपने भाई-बन्धु और पति-पुत्रों के रोकने पर भी सब सगे-सम्बन्धियों और विषयों की आशा छोड़कर केवल मेरे दर्शन की लालसा से ही मेरे पास आयी हैं, तब उन्होंने उनसे कहा। उस समय उनके मुखारविन्द पर हास्य की तरंगें अठखेलियाँ कर रही थीं।

भगवान ने कहा - ‘महाभाग्यवती देवियों! तुम्हारा स्वागत है। आओ, बैठो, कहो, हम तुम्हारा क्या स्वागत करें? तुम लोग हमारे दर्शन की इच्छा से यहाँ आयी हो, यह तुम्हारे-जैसे प्रेमपूर्ण हृदयवालों के योग्य ही है। इसमें सन्देह नहीं कि संसार में अपनी सच्ची भलाई को समझने वाले जितने भी बुद्धिमान पुरुष हैं, वे अपने प्रियतम के समान ही मुझसे प्रेम करते हैं और ऐसा प्रेम करते हैं जिसमें किसी प्रकार की कामना नहीं रहती, जिसमें किसी प्रकार का व्यवधान, संकोच, छिपावा, दुविधा या द्वैत नहीं होता। प्राण, बुद्धि, मन, शरीर, स्वजन, स्त्री, पुत्र और धन आदि संसार की सभी वस्तुएँ जिसके लिये और जिसकी सन्निधि से प्रिय लगती हैं, उस आत्मा से, परमात्मा से, मुझ श्रीकृष्ण से बढ़कर और कौन प्यारा हो सकता है। इसलिये तुम्हारा आना उचित ही है। मैं तुम्हारे प्रेम का अभिनन्दन करता हूँ। परन्तु अब तुम लोग मेरा दर्शन कर चुकीं। अब अपने यज्ञशाला में लौट जाओ। तुम्हारे पति ब्राह्मण गृहस्थ हैं। वे तुम्हारे साथ मिलकर ही अपना यज्ञ पूर्ण कर सकेंगे।'

ब्राह्मण पत्नियों ने कहा - अन्तर्यामी श्यामसुन्दर! आपकी यह बात निष्ठुरता से पूर्ण है। आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। श्रुतियाँ कहती हैं कि जो एक बार भगवान को प्राप्त हो जाता है, उसे फिर संसार में नहीं लौटना पड़ता। आप अपनी यह वेदवाणी सत्य कीजिये। हम अपने समस्त सगे-सम्बन्धियों की आज्ञा का उल्लंघन करके आपके चरणों में इसलिये आयी हैं कि आपके चरणों से गिरी हुई तुलसी की माला अपने केशों में धारण करें। स्वामी! अब हमारे पति-पुत्र, माता-पिता, भाई-बन्धु और स्वजन-सम्बन्धी हमें स्वीकार नहीं करेंगे; फिर दूसरों की तो बात ही क्या है। वीरशिरोमणे! अब हम आपके चरणों में आ पड़ी हैं। हमें और किसी का सहारा नहीं है। इसलिये अब हमें दूसरों की शरण में न जाना पड़े, ऐसी व्यवस्था कीजिये।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - देवियों! तुम्हारे पति-पुत्र, माता-पिता, भाई-बन्धु - कोई भी तुम्हारा तिरस्कार नहीं करेंगे। उनकी तो बात ही क्या, सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा। इसका कारण है, अब तुम मेरी हो गयी हो, मुझसे युक्त हो गयी हो। देखो न, ये देवता मेरी बात का अनुमोदन कर रहे हैं। देवियों! इस संसार में मेरा अंग-संग ही मनुष्यों में मेरी प्रीति या अनुराग का कारण नहीं है। इसलिये तुम जाओ, अपना मन मुझमें लगा दो। तुम्हें बहुत शीघ्र मेरी प्राप्ति हो जायगी।

श्री शुकदेव जी कहते हैं - परीक्षित! जब भगवान ने इस प्रकार कहा, तब वे ब्राह्मण पत्नियाँ यज्ञशाला में लौट गयीं। उन ब्राह्मणों ने अपनी स्त्रियों में तनिक भी दोषदृष्टि नहीं की। उनके साथ मिलकर अपना यज्ञ पूरा किया।

उन स्त्रियों में से एक को आने के समय ही उसके पति ने बलपूर्वक रोक लिया था। इस पर उस ब्राह्मण पत्नी ने भगवान के वैसे ही स्वरूप का ध्यान किया, जैसा कि बहुत दिनों से सुन रखा था। जब उसका ध्यान जम गया, तब मन-ही-मन भगवान का आलिंगन करके उसके कर्म के द्वारा बने हुए अपने शरीर को छोड़ दिया। इधर भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणियों के लाये हुए उस चार प्रकार के अन्न से पहले ग्वालबालों को भोजन कराया और फिर उन्होंने स्वयं भी भोजन किया।

परीक्षित! इस प्रकार लीलामनुष्य भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य की-सी लीला की और अपने सौन्दर्य, माधुर्य, वाणी तथा कर्मों से गौएँ, ग्वालबालों और गोपियों को आनन्दित किया और स्वयं भी उनके अलौकिक प्रेमरस का आस्वादन करके आनन्दित हुए।

परीक्षित! इधर जब ब्राह्मणों को यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान हैं, तब उन्हें बड़ा पछतावा हुआ। वे सोचने लगे कि जगदीश्वर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की आज्ञा का उल्लंघन करके हमने बड़ा भारी अपराध किया है। वे तो मनुष्य की-सी लीला करते हुए भी परमेश्वर ही हैं।

जब उन्होंने देखा कि हमारी पत्नियों के हृदय तो भगवान के लिए अलौकिक प्रेम है और हम लोग उससे बिलकुल रीते हैं, तब वे पछता-पछताकर अपनी निन्दा करने लगे। वे कहते लगे - हाय! हम भगवान श्रीकृष्ण से विमुख हैं। बड़े ऊँचे कुल में हमारा जन्म हुआ, गायत्री ग्रहण करके हम द्विजाति हुए, वेदाध्ययन करके हमने बड़े-बड़े यज्ञ किये; परन्तु वह सब किस काम का? धिक्कार है! धिक्कार है! हमारी विद्या व्यर्थ गयी, हमारे व्रत बुरे सिद्ध हुए। हमारी इस बहुज्ञता को धिक्कार है!

ऊँचे वंश में जन्म लेना, कर्मकाण्ड में निपुण होना किसी काम न आया। इन्हें बार-बार धिक्कार है। निश्चय ही, भगवान की माया बड़े-बड़े योगियों को भी मोहित कर लेती है। तभी तो हम कहलाते हैं मनुष्यों के गुरु और ब्राह्मण, परन्तु अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थ के विषय में बिलकुल भूले हुए हैं। कितने आश्चर्य की बात है! देखो तो सही - यद्यपि ये स्त्रियाँ हैं, तथापि जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण में इनका कितना अगाध प्रेम है, अखण्ड अनुराग है! उसी से इन्होंने गृहस्थी की वह बहुत बड़ी फाँसी भी काट डाली, जो मृत्यु के साथ भी नहीं कटती।

इनके न तो द्विजाति के योग्य यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं और न तो इन्होंने गुरुकुल में ही निवास किया है। न इन्होंने तपस्या की है और न तो आत्मा के सम्बन्ध में ही कुछ विवेक-विचार किया है। उनकी बात तो दूर रही, इनमें न तो पूरी पवित्रता है और न तो शुभकर्म ही। फिर भी समस्त योगेश्वरों के ईश्वर पुण्यकीर्ति भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में इनका दृढ़ प्रेम है। और हमने अपने संस्कार किये हैं, गुरुकुल में निवास किया है, तपस्या की है, आत्मानुसंधान किया है, पवित्रता का निर्वाह किया है तथा अच्छे-अच्छे कर्म किये हैं; फिर भी भगवान के चरणों में हमारा प्रेम नहीं है।

सच्ची बात यह है कि हम लोग गृहस्थी के काम-धंधों में मतवाले हो गये थे, अपनी भलाई और बुराई को बिलकुल भूल गये थे। अहो, भगवान की कितनी कृपा है! भक्तवत्सल प्रभु ने ग्वालबालों को भेजकर उनके वचनों से हमें चेतावनी दी, अपनी याद दिलायी। भगवान स्वयं पूर्ण काम हैं और कैवल्यमोक्ष पर्यन्त जितनी भी कामनाएँ होती हैं, उनको पूर्ण करने वाले हैं। यदि हमें सचेत नहीं करना होता तो उनका हम-सरीखे क्षुद्र जीवों से प्रयोजन ही क्या हो सकता था?

अवश्य ही उन्होंने इसी उद्देश्य से माँगने का बहाना बनाया। अन्यथा उन्हें माँगने की भला क्या आवश्यकता थी? स्वयं लक्ष्मी अन्य सब देवताओं को छोड़कर और अपनी चंचलता, गर्व आदि दोषों का परित्याग कर केवल एक बार उनके चरणकमलों का स्पर्श पाने के लिये सेवा करती रहती हैं। वे ही प्रभु किसी से भोजन की याचना करें, यह लोगों को मोहित करने के लिये नहीं तो और क्या है?

देश, काल, पृथक-पृथक सामग्रियाँ, उन-उन कर्मों में विनियुक्त मन्त्र, अनुष्ठान की पद्धति, ऋत्विज, अग्नि, देवता, यज्ञमान, यज्ञ और धर्म - सब भगवान के ही स्वरूप हैं। वे ही योगेश्वरों के भी ईश्वर भगवान विष्णु स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में यदुवंशियों में अवतीर्ण हुए हैं, यह बात हमने सुन रखी थी; परन्तु हम इतने मूढ़ हैं कि उन्हें पहचान न सके। यह सब होने पर भी हम धन्याति धन्य हैं, हमारे अहोभाग्य हैं। तभी तो हमें वैसी पत्नियाँ प्राप्त हुई हैं। उनकी भक्ति से हमारी बुद्धि भी भगवान श्रीकृष्ण के अविचल प्रेम से युक्त हो गयी है।

प्रभो! आप अचिन्त्य और अनन्त ऐश्वर्यों के स्वामी हैं! श्रीकृष्ण! आपका ज्ञान अबाध है। आपकी ही माया से हमारी बुद्धि मोहित हो रही है और हम कर्मों के पचड़े में भटक रहे हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं। वे आदि पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण हमारे इस अपराध को क्षमा करें। क्योंकि हमारी बुद्धि उनकी माया से मोहित हो रही है और हम उनके प्रभाव को न जानने वाले अज्ञानी हैं।

परीक्षित! उन ब्राह्मणों ने श्रीकृष्ण  का तिरस्कार किया था। अतः उन्हें अपने अपराध की स्मृति से बड़ा पश्चाताप हुआ और उनके हृदय में श्रीकृष्ण-बलराम के दर्शन की बड़ी इच्छा भी हुई; परन्तु कंस  के डर के मारे वे उनका दर्शन करने न जा सके। (24-52)

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