*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 10 || अध्याय 69 ||
*देवर्षि नारद जी का भगवान की गृहचर्या देखना*
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! जब देवर्षि नारद ने सुना कि भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर (भौमासुर) को मारकर अकेले ही हजारों राजकुमारियों के साथ विवाह कर लिया है, तब उनके मन में भगवान की रहन-सहन देखने की बड़ी अभिलाषा हुई। वे सोचने लगे- 'अहो, यह कितने आश्चर्य की बात है कि भगवान श्रीकृष्ण ने एक ही शरीर से एक ही समय सोलह हजार महलों में अलग-अलग सोलह हजार राजकुमारियों का पाणिग्रहण किया।'
देवर्षि नारद इस उत्सुकता से प्रेरित होकर भगवान की लीला देखने के लिये द्वारका आ पहुँचे। भवन के उपवन और उद्यान खिले हुए रंग-बिरंगे पुष्पों से लदे वृक्षों से परिपूर्ण थे, उन पर तरह-तरह के पक्षी चहक रहे थे और भौंरे गुंजार कर रहे थे। निर्मल जल से भरे सरोवरों में नीले, लाल और सफ़ेद रंग के भाँति-भाँति के कमल खिले हुए थे। कुमुद (कोईं) और नवजात कमलों की मानो भीड़ ही लगी हुई थी। उसमें हंस और सारस कलरव कर रहे थे। द्वारका पुरी में स्फटिकमणि और चाँदी के नौ लाख महल थे। वे फर्श आदि में जड़ी हुई महामरकतमणि (पन्ने) की प्रभा से जगमगा रहे थे और उनमें सोने तथा हीरों की बहुत-सी सामग्रियाँ शोभायमान थीं। उसके राजपथ (बड़ी-बड़ी सड़कें), गलियाँ, चौराहे और बाजार बहुत ही सुन्दर-सुन्दर थे। घुड़साल आदि पशुओं के रहने के स्थान, सभा-भवन और देव-मन्दिरों के कारण उसका सौन्दर्य और भी चमक उठा था। उसकी सड़कों, चौक, गली और दरवाजों पर छिड़काव किया गया था। छोटी-छोटी झंडियाँ और बड़े-बड़े झंडे जगह-जगह फहरा रहे थे, जिनके कारण रास्तों पर धूप नहीं आ पाती थी।
उसी द्वारकानगरी में भगवान श्रीकृष्ण का बहुत ही सुन्दर अन्तःपुर था। बड़े-बड़े लोकपाल उसकी पूजा-प्रशंसा किया करते थे। उसका निर्माण करने में विश्वकर्मा ने अपना सारा कला-कौशल, सारी कारीगरी लगा दी थी। उस अन्तःपुर (रनिवास) में भगवान की रानियों के सोलह हजार से अधिक महल शोभायमान थे, उनमें से एक बड़े भवन में देवर्षि नारद जी ने प्रवेश किया। उस महल में मूँगों के खम्भे, वैदूर्य के उत्तम-उत्तम छज्जे तथा इन्द्रनीलमणि की दीवारें जगमगा रही थीं और वहाँ की गचें भी ऐसी इन्द्र-नीलमणियों से बनी हुई थीं, जिनकी चमक किसी प्रकार कम नहीं होती। विश्वकर्मा ने बहुत-से ऐसे चंदोवे बना रखे थे, जिसमें मोती की लड़ियों की झालरें लटक रही थीं। हाथी-दाँत के बने हुए आसन और पलँग थे, जिसमें श्रेष्ठ-श्रेष्ठ मणि जड़ी हुई थी। बहुत-सी दासियाँ गले में सोने का हार पहने और बहुत वस्त्रों से सुसज्जित होकर तथा बहुत-से सेवक भी जामा-पगड़ी और सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहने तथा जड़ाऊ कुण्डल धारण किये, अपने-अपने काम में व्यस्त थे और महल की शोभा बढ़ा रहे थे। अनेकों रत्न-प्रदीप अपनी जगमगाहट से उसका अन्धकार दूर कर रहे थे। अगर की धूप देने के कारण झरोखों से धुआँ निकल रहा था। उसे देखकर रंग-बिरंगे मणिमय छज्जों पर बैठे हुए मोर बादलों के भ्रम से कूक-कूककर नाचने लगते।
देवर्षि नारद जी ने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण उस महल की स्वामिनी रुक्मिणी जी के साथ बैठे हुए हैं और वे अपने हाथों भगवान को सोने की डांडी वाले चँवर से हवा कर रही हैं। यद्यपि उस महल में रुक्मिणी जी के समान ही गुण, रूप, अवस्था और वेष-भूषा वाली सहस्रों दासियाँ भी हर समय विद्यमान रहती थीं।
नारद जी को देखते ही समस्त धार्मिकों के मुकुटमणि भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी जी के पलँग से सहसा उठ खड़े हुए। उन्होंने देवर्षि नारद के युगलचरणों में मुकुटयुक्त सिर से प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उन्हें अपने आसन पर बैठाया। परीक्षित! इसमें सन्देह नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण चराचर जगत् के परम गुरु हैं और उनके चरणों का धोवन गंगाजल सारे जगत् को पवित्र करने वाला है। फिर भी वे परमभक्तवत्सल और संतों के परम आदर्श, उनके स्वामी हैं। उनका एक असाधारण नाम ब्रह्मण्यदेव भी है। वे ब्राह्मणों को ही अपना आराध्यदेव मानते हैं। उनका यह नाम उनके गुण के अनुरूप एवं उचित ही है। तभी तो भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं ही नारद जी के पाँव पखारे और उनका चरणामृत अपने सिर पर धारण किया। नरशिरोमणि नर के सखा सर्वदर्शी पुराणपुरुष भगवान नारायण ने शास्त्रोक्त विधि से देवर्षिशिरोमणि भगवान नारद की पूजा की। इसके बाद अमृत से भी मीठे किन्तु थोड़े शब्दों में उनका स्वागत-सत्कार किया और फिर कहा- ‘प्रभो! आप तो स्वयं समग्र, ज्ञान, वैराग्य, धर्म, यश, श्री और ऐश्वर्य से पूर्ण हैं। आपकी हम क्या सेवा करें'?
देवर्षि नारद ने कहा- भगवन! आप समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी हैं। आपके लिये यह कोई नयी बात नहीं है कि आप अपने भक्तजनों से प्रेम करते हैं और दुष्टों को दण्ड देते हैं। परमयशस्वी प्रभो! आपने जगत् की स्थिति और रक्षा के द्वारा समस्त जीवों का कल्याण करने के लिये स्वेच्छा से अवतार ग्रहण किया है। भगवन! यह बात हम भलीभाँति जानते हैं। यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आज मुझे आपके चरणकमलों के दर्शन हुए हैं। आपके चरणकमल सम्पूर्ण जनता को परम साम्य, मोक्ष देने में समर्थ हैं। जिनके ज्ञान की कोई सीमा ही नहीं हैं, वे ब्रह्मा, शंकर आदि सदा-सर्वदा अपने हृदय में उनका चिन्तन करते रहते हैं। वास्तव में वे श्रीचरण ही संसाररूप कुएँ में गिरे हुए लोगों को बाहर निकलने के लिये अवलम्बन हैं। आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपके उन चरणकमलों की स्मृति सर्वदा बनी रहे और मैं चाहे जहाँ भी रहूँ, उसके ध्यान में तन्मय रहूँ'।
परीक्षित! इसके बाद देवर्षि नारद जी योगेश्वरों के भी ईश्वर भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया का रहस्य जानने के लिए उनकी दूसरी पत्नी के महल गये। वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया और उद्धव जी के साथ चौसर खेल रहे हैं। वहाँ भी भगवान ने खड़े होकर उनका स्वागत किया, आसन पर बैठाया और विविध सामग्रियों द्वारा बड़ी भक्ति से उनकी अर्चा-पूजा की। इसके बाद भगवान ने नारद जी से अनजान की तरह पूछा- ‘आप यहाँ कब पधारे! आप तो परिपूर्ण आत्माराम-आप्तकाम हैं और हम लोग हैं अपूर्ण। ऐसी अवस्था में भला हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं।
फिर भी ब्रह्मस्वरूप नारद जी! आप कुछ-न-कुछ आज्ञा अवश्य कीजिये और हमें सेवा का अवसर देकर हमारा जन्म सफल कीजिये।’
नारद जी यह सब देख-सुनकर चकित और विस्मित हो रहे थे। वे वहाँ से उठकर चुपचाप दूसरे महल में चले गये। उस महल में देवर्षि नारद ने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण अपने नन्हे-नन्हे बच्चों को दुलार रहे हैं। वहाँ से फिर दूसरे महल में गये तो क्या देखते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण स्नान की तैयारी कर रहे हैं। (इसी प्रकार देवर्षि नारद ने विभिन्न महलों में भगवान को भिन्न-भिन्न कार्य करते देखा।)
कहीं वे यज्ञ-कुण्डों में हवन कर रहे हैं और कहीं पंचमहायज्ञों से देवता आदि की आराधना कर रहे हैं। कहीं ब्राह्मणों को भोजन करा रहे हैं, तो कहीं यज्ञ का अवशेष स्वयं भोजन कर रहे हैं। कहीं सन्ध्या कर रहे हैं, तो कहीं मौन होकर गायत्री का जप कर रहे हैं। कहीं हाथों में ढाल-तलवार लेकर उनको चलाने के पैतरे बदल रहे हैं। कहीं घोड़े, हाथी अथवा रथ पर सवार होकर श्रीकृष्ण विचरण कर रहे हैं। कहीं पलँग पर सो रहे हैं, तो कहीं वंदीजन उनकी स्तुति कर रहे हैं। किसी महल में उद्धव आदि मन्त्रियों के साथ किसी गम्भीर विषय पर परामर्श कर रहे हैं, तो कहीं उत्तमोत्तम वारांगनाओं से घिरकर जलक्रीड़ा कर रहे हैं।
कहीं श्रेष्ठ ब्राह्मणों को वस्त्राभूषण से सुसज्जित गौओं का दान कर रहे हैं, तो कहीं मंगलमय इतिहास-पुराणों का श्रवण कर रहे हैं। कहीं किसी पत्नी के महल में अपनी प्राणप्रिया के साथ हास्य-विनोद की बातें करके हँस रहे हैं। तो कहीं धर्म का सेवन कर रहे हैं। कहीं अर्थ का सेवन कर रहे हैं-धन-संग्रह और धनवृद्धि के कार्य में लगे हुए हैं, तो कहीं धर्मानुकूल गृहस्थोचित विषयों का उपभोग कर रहे हैं। कहीं एकान्त में बैठकर प्रकृति से अतीत पुराण-पुरुष का ध्यान कर रहे हैं, तो कहीं गुरुजनों को इच्छित भोग-सामग्री समर्पित करके उनकी सेवा-शुश्रूषा कर रहे हैं।
देवर्षि नारद ने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण किसी के साथ युद्ध की बात कर रहे हैं, तो किसी के साथ सन्धि की। कहीं भगवान बलराम जी के साथ बैठकर सत्पुरुषों के कल्याण के बारे में विचार कर रहे हैं। कहीं उचित समय पर पुत्र और कन्याओं का उनके सदृश पत्नी और वरों के साथ बड़ी धूमधाम से विधिवत् विवाह कर रहे हैं। कहीं घर से कन्याओं को विदा कर रहे हैं, तो कहीं बुलाने की तैयारी में लगे हुए हैं। योगेश्वरेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के इन विराट उत्सवों को देखकर सभी लोग विस्मित-चकित हो जाते थे। कहीं बड़े-बड़े यज्ञों के द्वारा समस्त देवताओं का यजन-पूजन और कहीं कुएँ, बगीचे तथा मठ आदि बनवाकर इष्टापूर्त धर्म का आचरण कर रहे हैं। कहीं श्रेष्ठ यादवों से घिरे हुए सिन्धुदेशीय घोड़े पर चढ़कर मृगया कर रह हैं, इस प्रकार यज्ञ के लिये मेध्य पशुओं का संग्रह कर रहे हैं और कहीं प्रजा में तथा अन्तःपुर के महलों में वेष बदलकर छिपे रूप से सबका अभिप्राय जानने के लिये विचरण कर रहे हैं। क्यों न हो, भगवान यागेश्वर जो हैं।
परीक्षित! इस प्रकार मनुष्य की-सी लीला करते हुए हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया का वैभव देखकर देवर्षि नारद जी ने मुसकराते हुए उनसे कहा- ‘योगेश्वर आत्मदेव! आपकी योगमाया ब्रह्मा जी आदि बड़े-बड़े मायावियों के लिये भी अगम्य है। परन्तु हम आपकी योगमाया का रहस्य जानते हैं; क्योंकि आपके चरणकमलों की सेवा करने से वह स्वयं ही हमारे सामने प्रकट हो गयी है। देवताओं के भी आराध्यदेव भगवन! चौदहों भुवन आपके सुयश से परिपूर्ण हो रहे हैं। अब मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपकी त्रिभुवन-पावनी लीला का गान करता हुआ उन लोकों में विचरण करूँ’।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- देवर्षि नारद जी! मैं ही धर्म का उपदेशक, पालन करने वाला और उसका अनुष्ठान करने वालों का अनुमोदनकर्ता भी हूँ। इसलिये संसार को धर्म की शिक्षा देने के उद्देश्य से ही मैं इस प्रकार धर्म आचरण करता हूँ। मेरे प्यारे पुत्र! तुम मेरी यह योगमाया देखकर मोहित मत होना।
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण गृहस्थों को पवित्र करने वाले श्रेष्ठ धर्मों का आचरण कर रहे थे। यद्यपि वे एक ही हैं, फिर भी देवर्षि नारद जी ने उनको उनकी प्रत्येक पत्नी के महल में अलग-अलग देखा। भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति अनन्त है। उनकी योगमाया परम ऐश्वर्य बार-बार देखकर देवर्षि नारद के विस्मय और कौतूहल की सीमा न रही। द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण गृहस्थ की भाँति ऐसा आचरण करते थे, मानो धर्म, अर्थ और कामरूप पुरुषार्थों में उनकी बड़ी श्रद्धा हो। उन्होंने देवर्षि नारद का बहुत सम्मान किया। वे अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान का स्मरण करते हुए वहाँ से चले गये।
राजन! भगवान नारायण सारे जगत् के कल्याण के लिये अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमाया को स्वीकार करते हैं और इस प्रकार मनुष्यों की-सी लीला करते हैं। द्वारकापुरी में सोलह हजार से भी अधिक पत्नियाँ अपनी सलज्ज एवं प्रेमभरी चितवन तथा मन्द-मन्द मुसकान से उनकी सेवा करती थीं और वे उनके साथ विहार करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने जो लीलाएँ की हैं, उन्हें दूसरा कोई नहीं कर सकता। परीक्षित! वे विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के परम कारण हैं। जो उनकी लीलाओं का गान, श्रवण और गान-श्रवण करने वालों का अनुमोदन करता है, उसे मोक्ष के मार्गस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में परमप्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है।
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