*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 10 || अध्याय 88 ||
*शिव जी का संकटमोचन*
राजा परीक्षित ने पूछा- भगवन्! भगवान शंकर ने समस्त भोगों का परित्याग कर रखा है; परन्तु देखा यह जाता है कि जो देवता, असुर अथवा मनुष्य उनकी उपासना करते हैं, वे प्रायः धनी और भोग सम्पन्न हो जाते हैं। और भगवान विष्णु लक्ष्मीपति हैं, परन्तु उनकी उपासना करने वाले प्रायः धनी और भोग सम्पन्न नहीं होते। दोनों प्रभु त्याग और भोग की दृष्टि से एक-दूसरे से विरुद्ध स्वभाव वाले हैं, परंतु उनके उपासकों को उनके स्वरूप के विपरीत फल मिलता है। मुझे इस विषय में बड़ा सन्देह है कि त्यागी की उपासना से भोग और लक्ष्मीपति की उपासना से त्याग कैसे मिलता है? मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ।
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! शिव जी सदा अपनी शक्ति से युक्त रहते हैं। वे सत्त्व आदि गुणों से युक्त तथा अहंकार के अधिष्ठाता हैं। अहंकार के तीन भेद हैं- वैकारिक, तैजस और तामस। त्रिविध अहंकार से सोलह विकार हुए- दस इन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और एक मन। अतः इन सबके अधिष्ठातृ-देवताओं में से किसी एक की उपासना करने पर समस्त ऐश्वर्यों की प्राप्ति हो जाती है। परन्तु परीक्षित! भगवान श्रीहरि तो प्रकृति से परे स्वयं पुरुषोत्तम एवं प्राकृत गुणरहित हैं। वे सर्वज्ञ तथा सबके अन्तःकरणों के साक्षी हैं। जो उनका भजन करता है, वह स्वयं ही गुणातीत हो जाता है। परीक्षित! जब तुम्हारे दादा धर्मराज युधिष्ठिर अश्वमेध यज्ञ कर चुके, तब भगवान से विविध प्रकार के धर्मों का वर्णन सुनते समय उन्होंने भी यही प्रश्न किया था। परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं। मनुष्यों के कल्याण के लिये ही उन्होंने यदुवंश में अवतार धारण किया था। राजा युधिष्ठिर का प्रश्न सुनकर और उनकी सुनने की इच्छा देखकर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार उत्तर दिया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- राजन्! जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका सब धन धीरे-धीरे छीन लेता हूँ। जब वह निर्धन हो जाता है, तब उसके सगे-सम्बन्धी उसके दुःखाकुल चित्त की परवा न करके उसे छोड़ देते हैं। फिर वह धन के लिये उद्योग करने लगता है, तब मैं उसका प्रयत्न भी निष्फल कर देता हूँ। इस प्रकार बार-बार असफल होने के कारण जब धन कमाने से उसका मन विरक्त हो जाता है, उसे दुःख समझकर वह उधर से अपना मुँह मोड़ लेता है और मेरे प्रेमी भक्तों का आश्रय लेकर उनसे मेल-जोल करता है, तब मैं उस पर अपनी अहैतुक कृपा की वर्षा करता हूँ। मेरी कृपा से उसे परम सूक्ष्म अनन्त सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार मेरी प्रसन्नता, मेरी आराधना बहुत कठिन है। इसी से साधारण लोग मुझे छोड़कर मेरे ही दूसरे रूप अन्यान्य देवताओं की आराधना करते हैं। दूसरे देवता आशुतोष हैं। वे झटपट पिघल पड़ते हैं और अपने भक्तों को साम्राज्य-लक्ष्मी दे देते हैं। उसे पाकर वे उच्छ्रंखल, प्रमादी और उन्मत्त हो उठाते हैं और अपने वरदाता देवताओं को भी भूल जाते हैं तथा उनका तिरस्कार कर बैठते हैं।
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! ब्रह्मा, विष्णु और महादेव- ये तीनों शाप और वरदान देने में समर्थ हैं; परन्तु इनमें महादेव और ब्रह्मा शीघ्र ही प्रसन्न या रुष्ट होकर वरदान अथवा शाप दे देते हैं। परन्तु विष्णु भगवान वैसे नहीं हैं।
इस विषय में महात्मा लोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। भगवान शंकर एक बार वृकासुर को वर देकर संकट में पड़ गये थे। परीक्षित! वृकासुर शकुनि का पुत्र था। उसकी बुद्धि बहुत बिगड़ी हुई थी। एक दिन कहीं जाते समय उसने देवर्षि नारद को देख लिया और उनसे पूछा कि- ‘तीनों देवताओं में झटपट प्रसन्न होने वाला कौन है?’
परीक्षित! देवर्षि नारद ने कहा- ‘तुम भगवान शंकर की आराधना करो। इससे तुम्हारा मनोरथ बहुत जल्दी पूरा हो जायेगा। वे थोड़े ही गुणों से शीघ्र-से-शीघ्र प्रसन्न और थोड़े ही अपराध से तुरन्त क्रोध कर बैठते हैं। रावण और बाणासुर ने केवल बंदीजनों के समान शंकर जी की कुछ स्तुतियाँ की थीं। इसी से वे उन पर प्रसन्न हो गये और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य दे दिया। बाद में रावण के कैलास उठाने और बाणासुर के नगर की रक्षा का भार लेने से वे उनके लिये संकट में भी पड़ गये थे’।
नारद जी का उपदेश पाकर वृकासुर केदार क्षेत्र में गया और अग्नि को भगवान शंकर का मुख मानकर और शरीर का मांस काट-काटकर उसमें हवन करने लगा। इस प्रकार छः दिन तक उपासना करने पर भी जब उसे भगवान शंकर के दर्शन न हुए, तब उसे बड़ा दुःख हुआ। सातवें दिन केदार तीर्थ में स्नान करके उसने अपने भीगे बाल वाले मस्तक को कुल्हाड़े से काटकर हवन करना चाहा। परीक्षित! जैसे जगत् में कोई दुःखवश आत्महत्या करने जाता है तो हम लोग करुणावश उसे बचा लेते हैं, वैसे ही परम दयालु भगवान शंकर ने वृकासुर के आत्मघात के पहले ही अग्निकुण्ड से अग्निदेव के समान प्रकट होकर अपने दोनों हाथों से उसके दोनों हाथ पकड़ लिये और गला काटने से रोक दिया। उनका स्पर्श होते ही वृकासुर के अंग ज्यों-के-त्यों पूर्ण हो गये। भगवान शंकर ने वृकासुर से कहा- ‘प्यारे वृकासुर! बस करो, बस करो; बहुत हो गया। मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ। तुम मुँह माँगा वर माँग लो। अरे भाई! मैं तो अपने शरणागत भक्तों पर केवल जल चढ़ाने से ही सन्तुष्ट हो जाया करता हूँ। भला, तुम झूठ-मूठ अपने शरीर को क्यों पीड़ा दे रहे हो?’
परीक्षित! अत्यन्त पापी वृकासुर ने समस्त प्राणियों को भयभीत करने वाला यह वर माँगा कि ‘मैं जिसके सिर पर हाथ रख दूँ, वही मर जाये’। परीक्षित! उसकी यह याचना सुनकर भगवान रुद्र पहले तो कुछ अनमने-से हो गये, फिर हँसकर कह दिया- ‘अच्छा, ऐसा ही हो।’ ऐसा वर देकर उन्होंने मानो साँप को अमृत पिला दिया।
भगवान शंकर के इस प्रकार कह देने पर वृकासुर के मन में यह लालसा हो आयी कि ‘मैं पार्वती जी को ही हर लूँ।’ वह असुर शंकर जी के वर की परीक्षा के लिये उन्हीं के सिर पर हाथ रखने का उद्योग करने लगा। अब तो शंकर जी अपने दिये हुए वरदान से ही भयभीत हो गये। वह उनका पीछा करने लगा और वे उससे डरकर काँपते हुए भागने लगे। वे पृथ्वी, स्वर्ग और दिशाओं के अन्त तक दौड़ते गये; परन्तु फिर भी उसे पीछा करते देखकर उत्तर की ओर बढ़े। बड़े-बड़े देवता इस संकट को टालने का कोई उपाय न देखकर चुप रह गये। अन्त में वे प्राकृतिक अंधकार से परे परम प्रकाशमय वैकुण्ठ-लोक में गये।
वैकुण्ठ में स्वयं भगवान नारायण निवास करते हैं। एकमात्र वे ही उन संन्यासियों की परम गति हैं जो सारे जगत् को अभयदान करके शान्तभाव में स्थित हो गये हैं। वैकुण्ठ में जाकर जीव को फिर लौटना नहीं पड़ता।
भक्तभयहारी भगवान ने देखा कि शंकर जी तो बड़े संकट में पड़े हुए हैं। तब वे अपनी योगमाया से ब्रह्मचारी बनकर दूर से ही धीरे-धीरे वृकासुर की ओर आने लगे। भगवान ने मूँज की मेखला, काला मृगचर्म, दण्ड और रुद्राक्ष की माला धारण कर रखी थी। उनके एक-एक अंग से ऐसी ज्योति निकल रही थी, मानो आग धधक रही हो। वे हाथ में कुश लिये हुए थे। वृकासुर को देखकर उन्होंने बड़ी नम्रता से झुककर प्रणाम किया।
ब्रह्मचारी-वेषधारी भगवान ने कहा- शकुनिनन्दन वृकासुर जी! आप स्पष्ट ही बहुत थके-से जान पड़ते हैं। आज आप बहुत दूर से आ रहे हैं क्या? तनिक विश्राम तो कर लीजिये। देखिये, यह शरीर ही सारे सुखों की जड़ है। इसी से सारी कामनाएँ पूरी होती हैं। इसे अधिक कष्ट न देना चाहिये। आप तो सब प्रकार से समर्थ हैं। इस समय आप क्या करना चाहते हैं? यदि मेरे सुनने योग्य कोई बात हो तो बतलाइये। क्योंकि संसार में देखा जाता है कि लोग सहायकों के द्वारा बहुत-से काम बना लिया करते हैं।
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! भगवान के एक-एक शब्द से अमृत बरस रहा था। उनके इस प्रकार पूछने पर पहले तो उसने तनिक ठहरकर अपनी थकावट दूर की; उसके बाद क्रमशः अपनी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा भगवान शंकर के पीछे दौड़ने की बात शुरू से कह सुनायी।
श्रीभगवान ने कहा- ‘अच्छा, ऐसी बात है? तब तो भाई! हम उसकी बात पर विश्वास नहीं करते। आप नहीं जानते हैं क्या? वह तो दक्ष प्रजापति के शाप से पिशाचभाव को प्राप्त हो गया है। आजकल वही प्रेतों और पिशाचों का सम्राट् है। दानवराज! आप इतने बड़े होकर ऐसी छोटी-छोटी बातों पर विश्वास कर लेते हैं? आप यदि अब भी उसे जगद्गुरु मानते हों और उसकी बात पर विश्वास करते हों तो झटपट अपने सिर पर हाथ रखकर परीक्षा कर लीजिये। दानवशिरोमणे! यदि किसी प्रकार शंकर की बात असत्य निकले तो उस असत्यवादी को मार डालिये, जिससे फिर कभी झूठ न बोल सके।
परीक्षित! भगवान ने ऐसी मोहित करने वाली अद्भुत और मीठी बात कही कि उसकी विवेक-बुद्धि जाती रही। उस दुर्बुद्धि ने भूलकर अपने ही सिर पर हाथ रख लिया। बस, उसी क्षण उसका सिर फट गया और वह वहीं धरती पर गिरा पड़ा, मानो उस पर बिजली गिर पड़ी हो। उस समय आकाश में देवता लोग ‘जय-जय, नमो-नमः, साधु-साधु!’ के नारे लगाने लगे। पापी वृकासुर की मृत्यु से देवता, ऋषि, पितर और गन्धर्व अत्यन्त प्रसन्न होकर पुष्पों की वर्षा करने लगे और भगवान शंकर उस विकट संकट से मुक्त हो गये। अब भगवान पुरुषोत्तम ने भयमुक्त शंकर जी से कहा कि ‘देवाधिदेव! बड़े हर्ष की बात है कि इस दुष्ट को इसके पापों ने ही नष्ट कर दिया। परमेश्वर! भला, ऐसा कौन प्राणी है जो महापुरुषों का अपराध करके कुशल से रह सके? फिर स्वयं जगद्गुरु विश्वेश्वर! आपका अपराध करके तो कोई सकुशल रह ही कैसे सकता है?’
भगवान अनन्त शक्तियों के समुद्र हैं। उनकी एक-एक शक्ति मन और वाणी की सीमा के परे है। संकट से छुड़ाने की यह लीला जो कोई कहता या सुनता है, वह संसार के बन्धनों और शत्रुओं के भय से मुक्त हो जाता है। (01-40)
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