*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 11 || अध्याय 03 ||
*माया, माया से पार होने के उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोग का निरूपण*
राजा निमि ने पूछा- भगवन् सर्वशक्तिमान् परम कारण विष्णु भगवान की माया बड़े-बड़े मायावियों को भी मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता; (और आप कहते हैं कि भक्त उसे देखा करता है।) अतः अब मैं उस माया का स्वरूप जानना चाहता हूँ, आप लोग कृपा करके बतलाइये।
योगीश्वरो! मैं एक मृत्यु का शिकार मनुष्य हूँ। संसार के तरह-तरह के तापों ने मुझे बहुत दिनों से तपा रखा है। आप लोग जो भगवत्कथारूप अमृत का पान करा रहे हैं, वह उन तापों को मिटने की एकमात्र ओषधि है; इसलिए मैं आप लोगों की इस वाणी का सेवन करते-करते तृप्त नहीं होता। आप कृपया और कहिये।
अब तीसरे योगीश्वर अन्तरिक्ष जी ने कहा- राजन्! (भगवान की माया स्वरूपतः अनिर्वचीय है, इसलिये उसके कार्यों के द्वारा ही उसका निरूपण होता है।) आदि-पुरुष परमात्मा जिस शक्ति से सम्पूर्ण भूतों के कारण बनते हैं और उनके विषय-भोग तथा मोक्ष की सिद्धि के लिये अथवा अपने उपासकों की उत्कृष्ट सिद्धि के लिये स्वनिर्मित पंचभूतों के द्वारा नाना प्रकार के देव, मनुष्य आदि शरीरों की सृष्टि करते हैं, उसी को माया कहते हैं। इस प्रकार पंचमहाभूतों के द्वारा बने हुए प्राणि-शरीरों में उन्होंने अन्तर्यामी रूप से प्रवेश किया और अपने को ही पहले मन के रूप में और इसके बाद पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय-इन दस रूपों में विभक्त कर दिया तथा उन्हीं के द्वारा विषयों का भोग कराने लगे। वह देहाभिमानी जीव अन्तर्यामी के द्वारा प्रकाशित इन्द्रियों के द्वारा विषयों का भोग करता है और इस पंचभूतों के द्वारा निर्मित शरीर को आत्मा-अपना स्वरूप मानकर उसी में आसक्त हो जाता है। (यह भगवान की माया है)।
अब वह कर्मेन्द्रियों से सकाम कर्म करता है और उनके अनुसार शुभ कर्म का फल सुख और अशुभ कर्म का फल दुःख भोग करने लगता है और शरीरधारी होकर इस संसार में भटकने लगता है। यह भगवान की माया है। इस प्रकार यह जीव ऐसी अनेक अमंगलमय कर्मगतियों को, उसने फलों को प्राप्त होता है और महाभूतों के प्रलयपर्यन्त विवश होकर जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म को प्राप्त होता रहता है-यह भगवान की माया है। जब पंचभूतों के प्रलय का समय आता है, तब अनादि और अनन्त काल स्थूल तथा सूक्ष्म द्रव्य एवं गुणरूप इस समस्त व्यक्त सृष्टि को अव्यक्त की ओर, उसके मूल कारण की ओर खींचता है-यह भगवान की माया है। उस समय पृथ्वी पर लगातार सौ वर्ष तक भयंकर सूखा पड़ता है, वर्षा बिलकुल नहीं होती; प्रलयकाल की शक्ति से सूर्य की उष्णता और भी बढ़ जाती है तथा वे तीनों लोकों को तपाने लगते हैं-यह भगवान की माया है। उस समय शेषनाग (संकर्षण) के मुँह से आग की प्रचण्ड लपटें निकलती हैं और वायु की प्रेरणा से वे लपटें पाताल लोक से जलाना आरम्भ करती हैं तथा और भी ऊँची-ऊँची होकर चारों ओर फैल जाती हैं-यह भगवान की माया है। इसके बाद प्रलयकालीन सांवर्तक मेघगण हाथी की सूंड़ के समान मोटी-मोटी धाराओं से सौ वर्ष तक बरसता रहता है। उससे यह विराट् ब्रह्माण्ड जल में डूब जाता है-यह भगवान की माया है।
राजन्! उस समय जैसे बिना ईधन के आग बुझ जाती है, वैसे ही विराट् पुरुष ब्रह्मा अपने ब्रह्माण्ड-शरीर को छोड़कर सूक्ष् मस्वरूप अव्यक्त में लीन हो जाते हैं-यह भगवान की माया है। वायु पृथ्वी की गन्ध खींच लेती है, जिससे वह जल के रूप में हो जाती है और जब वही वायु जल के रस को खींच लेती है, तब वह जल अपना कारण अग्नि बन जाता है-यह भगवान की माया है। जब अन्धकार अग्नि का रूप छीन लेता है, तब वह अग्नि वायु में लीन हो जाती है और जब अवकाशरूप आकाश वायु की स्पर्श-शक्ति छीन लेता है, तब वह आकाश में लीन हो जाता है-यह भगवान की माया है।
राजन्! तदनन्तर कालरूप ईश्वर आकाश के शब्द गुण को हरण कर लेता है, जिससे वह तामस अहंकार में लीन हो जाता है। इन्द्रियाँ और बुद्धि राजस अहंकार में लीन होती हैं। मन सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न देवताओं के साथ सात्त्विक अहंकार में प्रवेश कर जाता है तथा अपने तीन प्रकार के कार्यों के साथ अहंकार महत्तत्त्व में लीन हो जाता है। महत्तत्त्व प्रकृति में और प्रकृति ब्रह्म में लीन होती है। फिर इसी के उलटे क्रम से सृष्टि होती है-यह भगवान की माया है। यह सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाली त्रिगुणमयी माया है। इसका हमने आपसे वर्णन किया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?
राजा निमि ने पूछा- 'महर्षि जी! इस भगवान की माया को पार करना उन लोगों के लिये तो बहुत ही कठिन है, जो अपने मन को वश में नहीं कर पाये हैं। अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि जो लोग शरीर आदि में आत्मबुद्धि रखते हैं तथा जिनकी समझ मोटी है, वे भी अनायास ही इसे कैसे पार सकते हैं?'
अब चौथे योगीश्वर प्रबुद्ध जी बोले- राजन्! स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध आदि बन्धनों में बँधे हुए संसारी मनुष्य सुख की प्राप्ति और दुःख की निवृत्ति के लिये बड़े-बड़े कर्म करते रहते हैं। जो पुरुष माया के पार जाना चाहता है, उसको विचार करना चाहिये कि उनके कर्मों का फल किस प्रकार विपरीत होता जाता है। वे सुख के बदले दुःख पाते हैं और दुख-निवृत्ति के स्थान पर दिनोंदिन दुःख बढ़ता ही जाता है। एक धन को ही लो। इससे दिन-पर-दिन दुःख बढ़ता ही है, इसको पाना भी कठिन है और यदि किसी प्रकार मिल भी जाये तो आत्मा के लिये तो यह मृत्युस्वरूप ही है। जो इसकी उलझनों में पड़ जाता है, वह अपने-आपको भूल जाता है। इसी प्रकार घर, पुत्र, स्वजन-सम्बन्धी, पशुधन आदि भी अनित्य और नाशवान् ही हैं; यदि कोई इन्हें जुटा भी ले तो इनसे क्या सुख-शान्ति मिल सकती है? इसी प्रकार जो मनुष्य माया से पार जाना चाहता है, उसे यह भी समझ लेना चाहिये कि मरने के बाद प्राप्त होने वाले लोक-परलोक भी ऐसे ही नाशवान् हैं। क्योंकि इस लोग की वस्तुओं के समान वे भी कुछ सीमित कर्मों के सीमित फलमात्र हैं। वहाँ भी पृथ्वी के छोटे-छोटे राजाओं के समान बराबर वालों से होड़ अथवा लाग-डांट रहती है, अधिक ऐश्वर्य और सुख वालों के प्रति छिद्रान्वेषण तथा ईर्ष्या-द्वेष का भाव रहता है, कम सुख और ऐश्वर्य वालों के प्रति घृणा रहती है एवं कर्मों का फल पूरा हो जाने पर वहाँ से पतन तो होता ही है। उसका नाश निश्चित है। नाश का भय वहाँ भी नहीं छूट पाता।
इसलिये जो परम कल्याण का जिज्ञासु हो, उसे गुरुदेव की शरण लेनी चाहिये। गुरुदेव ऐसे हों, जो शब्दब्रह्म-वेदों के पारदर्शी विद्वान् हों, जिससे वे ठीक-ठीक समझा सकें; और साथ ही परब्रह्म में परिनिष्ठित तत्त्वज्ञानी भी हों, ताकि अपने अनुभव के द्वारा प्राप्त हुई रहस्य की बातों को बता सकें। उनका चित्त शान्त हो, व्यवहार के प्रपंच में विशेष प्रवृत्त न हो।
जिज्ञासु को चाहिये कि गुरु को ही अपना परम प्रियतम आत्मा और इष्टदेव माने। उनकी निष्कपट भाव से सेवा करे और उनके पास रहकर भागवत धर्म की-भगवान को प्राप्त कराने वाले भक्ति-भाव के साधनों की क्रियात्मक शिक्षा ग्रहण करे। इन्हीं साधनों से सर्वात्मा एवं भक्त को अपने आत्मा का दान करने वाले भगवान प्रसन्न होते हैं। पहले शरीर, सन्तान आदि में मन की आसक्ति सीखें। फिर भगवान के भक्तों से प्रेम कैसा करना चाहिये-यह सीखे। इसके पश्चात् प्राणियों के प्रति यथा योग्य दया, मैत्री और विनय की निष्कपट भाव से शिक्षा ग्रहण करें।
मिट्टी, जल आदि से बाह्य शरीर की पवित्रता, छल-कपट आदि के त्याग से भीतर की पवित्रता, अपने धर्म का अनुष्ठान, सहनशक्ति, मौन, स्वाध्याय, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा तथा शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वंदों में हर्ष विषाद से रहित होना सीखे। सर्वत्र अर्थात् समस्त देश, काल और वस्तुओं में चेतन रूप से आत्मा और नियन्ता रूप से ईश्वर को देखना, एकान्त सेवन, ‘यही मेरा घर है’-ऐसा भाव न रखना, गृहस्थ हो तो पवित्र वस्त्र पहनना और त्यागी हो तो फटे-पुराने चिथड़े, जो कुछ प्रारब्ध के अनुसार मिल जाये, उसी में सन्तोष करना सीखे। भगवान की प्राप्ति का मार्ग बतलाने वाले शास्त्रों में श्रद्धा और दूसरे किसी भी शास्त्र की निन्दा न करना, प्राणायाम के द्वारा मन का, मौन के द्वारा वाणी का और वासनाहीनता के अभ्यास से कर्मों का संयम करना, सत्य बोलना, इन्द्रियों को अपने-अपने गोलकों में स्थिर रखना और मन को कहीं बाहर न जाने देना सीखे।
राजन्! भगवान की लीलाएँ अद्भुत हैं। उनके जन्म, कर्म और गुण दिव्य हैं। उन्हीं का श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना तथा शरीर से जितनी भी चेष्टाएँ हों, सब भगवान के लिये करना सीखे। यज्ञ, दान, तप अथवा जप, सदाचार का पालन और स्त्री, पुत्र, घर, अपना जीवन, प्राण तथा जो कुछ अपने को प्रिय लगता हो-सब-का-सब भगवान के चरणों में निवेदन करना उन्हें सौंप देना सीखे। जिन संत पुरुषों ने सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण का अपने आत्मा और स्वामी के रूप में साक्षात्कार कर लिया हो, उनसे प्रेम और स्थावर, जंगम दोनों प्रकार के प्राणियों की सेवा; विशेष करके मनुष्यों की, मनुष्यों में भी परोपकारी सज्जनों की और उनमें भी भगवत्प्रेमी संतों की करना सीखे।
भगवान के परम पावन यश के सम्बन्ध में ही एक-दूसरे से बातचीत करना और इस प्रकार के साधकों का इकट्ठे होकर आपस में प्रेम करना, आपस में सन्तुष्ट रहना और प्रपंच से निवृत्त होकर आपस में ही आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव करना सीखे। राजन्! श्रीकृष्ण राशि-राशि पापों को एक क्षण में भस्म कर देते हैं। सब उन्हीं का स्मरण करें और एक-दूसरे को स्मरण करावें। इस साधन-भक्ति का अनुष्ठान करते-करते प्रेम-भक्ति का उदय हो जाता है और वे प्रेमोद्रेक से पुलकित-शरीर धारण करते हैं।
उनके हृदय की बड़ी विलक्षण स्थिति होती है। कभी-कभी वे इस प्रकार चिन्ता करने लगते हैं कि अब तक भगवान नहीं मिले, क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किसे पूछूँ, कौन मुझे उनकी प्राप्ति करावे? इस तरह सोचते-सोचते वे रोने लगते हैं तो कभी भगवान की लीला की स्फूर्ति हो जाने से ऐसा देखकर कि परमैश्वर्यशाली भगवान गोपियों के डर से छिपे हुए हैं, खिलखिलाकर हँसने लगते हैं। कभी-कभी उनके प्रेम और दर्शन की अनुभूति से आनन्दमग्न हो जाते हैं तो कभी लोकातीत भाव में स्थित होकर भगवान के साथ बातचीत करने लगते हैं। कभी मानो उन्हें सुना रहे हों, इस प्रकार उनके गुणों का गान छेड़ देते हैं और कभी नाच-नाचकर उन्हें रिझाने लगते हैं। कभी-कभी उन्हें अपने पास न पाकर इधर-उधर ढूँढने लगते हैं तो कभी-कभी उनसे एक होकर, उसकी सन्निधि में स्थित होकर परम शान्ति का अनुभव करते और चुप हो जाते हैं।
राजन्! जो इस प्रकार भागवत धर्मों की शिक्षा ग्रहण करता है, उसे उनके द्वारा प्रेम-भक्ति की प्राप्ति हो जाती है और वह भगवान नारायण के परायण होकर उस माया को अनायास ही पार कर जाता है, जिसके पंजे से निकलना बहुत ही कठिन है।
राजा निमि ने पूछा- 'महर्षियो! आप लोग परमात्मा का वास्तविक स्वरूप जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिए मुझे यह बतलाइये कि जिस परब्रह्म परमात्मा का ‘नारायण’ नाम से वर्णन किया जाता है, उनका स्वरूप क्या है?'
अब पाँचवे योगीश्वर पिप्पलायन जी ने कहा- राजन्! जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का निमित्त कारण और उपादान-कारण दोनों ही है, बनने वाला भी है और बनाने वला भी-परन्तु स्वयं कारणरहित है; जो स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति अवस्थाओं में उनके साक्षी के रूप में विद्यामान रहता है और उनके अतिरिक्त समाधि में भी ज्यों-का-त्यों एकरस रहता है; जिसकी सत्ता से ही सत्तावान् होकर शरीर, इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरण अपना-अपना काम करने में समर्थ होते हैं, उसी परम सत्य वस्तु को आप ‘नारायण’ समझिये। जैसे चिनगारियाँ न तो अग्नि को प्रकाशित ही कर सकती हैं और न जला ही सकती हैं, वैसे ही उस परमतत्त्व में-आत्मस्वरूप में न तो मन की गति है और न वाणी की, नेत्र उसे देख नहीं सकते और बुद्धि सोच नहीं सकती, प्राण और इन्द्रियाँ तो उसके पास तक नहीं फटक पातीं। ‘नेति-नेति’-इत्यादि श्रुतियों के शब्द भी वह यह है-इस रूप में उसका वर्णन नहीं करते, बल्कि उसको बोध कराने वाले जितने भी साधन हैं, उनका निषेध करके तात्पर्यरूप से अपना मूल-निषेध का मूल लक्षित करा देते हैं; क्योंकि यदि निषेध के आधार की, आत्मा की सत्ता न हो तो निषेध कौन कर रहा है, निषेध की वृत्ति किसमें है-इन प्रश्नों का कोई उत्तर ही न रहे, निषेध की ही सिद्धि न हो।
जब सृष्टि नहीं थी, तब केवल एक वही था। सृष्टि का निरूपण करने के लिये उसी को त्रिगुण (सत्त्व-रज-तम) मयी प्रकृति कहकर वर्णन किया गया। फिर उसी को ज्ञान प्रधान होने से महत्तत्त्व, क्रिया प्रधान होने से सूत्रात्मा और जीव की उपाधि होने से अहंकार के रूप में वर्णन किया गया। वास्तव में जितनी भी शक्तियाँ हैं-चाहे वे इन्द्रियों के अधिष्ठातृ-देवताओं के रूप में हों, चाहे इन्द्रियों के, उनके विषयों के अथवा विषयों के प्रकाश के रूप में हों-सब-का-सब वह ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म की शक्ति अनन्त है। कहाँ तक कहूँ? जो कुछ दृश्य-अदृश्य, कार्य-कारण, सत्य और असत्य है-सब कुछ ब्रह्म है। इनसे परे जो कुछ है, वह भी ब्रह्म ही है। वह ब्रह्मस्वरूप आत्मा न तो कभी जन्म लेता है और न मरता है। वह न तो बढ़ता है और न घटता ही है। जितने भी पर्तिवर्तनशील पदार्थ हैं-चाहे वे क्रिया, संकल्प और उनके अभाव के रूप में ही क्यों न हों-सब की भूत, भविष्यत् और वर्तमान सत्ता का वह साक्षी है। सब में है। देश, काल और वस्तु से अपरिच्छिन्न है, अविनाशी है। वह उपलब्धि करने वाला अथवा उपलब्धि का विषय नहीं है। केवल उपलब्धिस्वरूप-ज्ञानस्वरूप है। जैसे प्राण तो एक ही रहता है, परन्तु स्थान भेद से उसके अनेक नाम हो जाते हैं-वैसे ही ज्ञान एक होने पर भी इन्द्रियों के सहयोग से उसमें अनेकता की कल्पना हो जाती है।
जगत् में चार प्रकार के जीव होते हैं- अंडा फोड़कर पैदा होने वाले पक्षी-साँप आदि, नाल में बँधे पैदा होने वाले पशु-मनुष्य, धरती फोड़कर निकलने वाले वृक्ष-वनस्पति और पसीने से उत्पन्न होने वाले खटमल आदि। इन सभी जीव-शरीर में प्राणशक्ति जीव के पीछे लगी रहती है। शरीरों के भिन्न-भिन्न होने पर भी प्राण एक ही रहता है। सुषुप्ति-अवस्था में जब इन्द्रियाँ निश्चेष्ट हो जाती हैं, अहंकार भी सो जाता है-लीन हो जाता है, अर्थात् लिंग शरीर नहीं रहता, उस समय यदि कूटस्थ आत्मा भी न हो तो इस बात की पीछे से स्मृति ही कैसे हो कि मैं सुख से सोया था। पीछे होने वाली यह स्मृति ही उस समय आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करती है।
जब भगवान कमलनाभ के चरणकमलों को प्राप्त करने की इच्छा से तीव्र भक्ति की जाती है, तब वह भक्ति ही अग्नि की भाँति गुण और कर्मों से उत्पन्न हुए चित्त के सारे मलों को जला डालती है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तब आत्मतत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है-जैसे नेत्रों के निर्विकार हो जाने पर सूर्य के प्रकाश की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है।
राजा निमि ने पूछा- 'योगीश्वरो! अब आप लोग हमें कर्मयोग का उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा शुद्ध होकर मनुष्य शीघ्रातिशीघ्र परम नैष्कर्म्य अर्थात् कर्तृत्व, कर्म और कर्मफल की निवृत्ति करने वाला ज्ञान प्राप्त करता है। एक बार यही प्रश्न मैंने अपने पिता महाराज इक्ष्वाकु के सामने ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनकादि ऋषियों से पूछा था, परन्तु उन्होंने सर्वज्ञ होने पर भी मेरे प्रश्न का उत्तर न दिया। इसका क्या कारण था? कृपा करके मुझे बतलाइये।'
अब छठे योगीश्वर आविर्होत्र जी ने कहा- राजन्! कर्म (शास्त्रविहित), अकर्म (निषिद्ध) और विकर्म (विहित का उल्लंघन) ये तीनों एकमात्र वेद के द्वारा जाने जाते हैं, इनकी व्यवस्था लौकिक रीति से नहीं होती। वेद अपौरुषेय हैं-ईश्वररूप हैं; इसलिए उनके तात्पर्य का निश्चय करना बहुत कठिन है। इसी से बड़े-बड़े विद्वान भी उनके अभिप्राय का निर्णय करने में भूल कर बैठते हैं। (इसी से तुम्हरे बचपन की ओर देखकर-तुम्हें अनधिकारी समझकर सनकादि ऋषियों ने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया)। यह वेद परोक्षवादात्मक है। यह कर्मों की निवृत्ति के लिये कर्म का विधान करता है, जैसे बालक को मिठाई आदि का लालच देकर औषध खिलाते हैं, वैसे ही यह अनभिज्ञों को स्वर्ग आदि का प्रलोभन देकर श्रेष्ठ कर्म में प्रवृत्त करता है।
जिसका अज्ञान निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, वह यदि मनमाने ढंग से वेदोक्त कर्मों का परित्याग कर देता है, तो वह विहित कर्मों का आचरण न करने के कारण विकर्मरूप अधर्म ही करता है। इसलिये वह मृत्यु के बाद फिर मृत्यु को प्राप्त होता है। इसलिये फल की अभिलाषा छोड़कर और विश्वात्मा भगवान को समर्पित कर जो वेदोक्त कर्म का ही अनुष्ठान करता है, उसे कर्मों की निवृत्ति से प्राप्त होने वाली ज्ञानरूप सिद्धि मिल जाती है। जो वेदों में स्वर्गादिरूप फल का वर्णन है, उसका तात्पर्य फल की सत्यता में नहीं है, वह तो कर्मों में रुचि उत्पन्न कराने के लिये है।
राजन्! जो पुरुष चाहता है कि शीघ्र-से शीघ्र मेरे ब्रह्मस्वरूप आत्मा की हृदय-ग्रन्थि-मैं और मेरे की कल्पित गाँठ खुल जाये, उसे चाहिये कि वह वैदिक और तान्त्रिक दोनों ही पद्धतियों से भगवान की आराधना करे। पहले सेवा आदि के द्वारा गुरुदेव की दीक्षा प्राप्त करे, फिर उनके द्वारा अनुष्ठान की विधि सीखे; अपने को भगवान की जो मूर्ति प्रिय लगे, अभीष्ट जान पड़े, उसी के द्वरा पुरुषोत्तम भगवान की पूजा करे। पहले स्नानादि से शरीर और सन्तोष आदि से अन्तः-करण को शुद्ध करे, इसके बाद भगवान की मूर्ति के सामने बैठकर प्राणायाम आदि के द्वारा भूतशुद्धि-नाड़ी-शोधन करे, तत्पश्चात् विधिपूर्वक मन्त्र, देवता आदि के न्यास से अंगरक्षा करके भगवान की पूजा करे। पहले पुष्प आदि पदार्थों का जन्तु आदि निकालकर, पृथ्वी को सम्मार्जन आदि से, अपने को अव्यग्र होकर और भगवान की मूर्ति को पहले ही की पूजा के लगे हुए पदार्थों के क्षालन आदि से पूजा के योग्य बनाकर फिर आसन पर मन्त्रोच्चारणपूर्वक जल छिड़कर पाद्य, अर्ध्य आदि पात्रों को स्थापित करे। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर हृदय में भगवान का ध्यान करके फिर उसे सामने की श्रीमूर्ति में चिन्तन करे। तदनन्तर हृदय, सिर, शिखा (हृदयाय नमः, शिर से स्वाहा) इत्यादि मन्त्रों से न्यास करे और अपने इष्टदेव के मूलमन्त्र के द्वारा देश, काल आदि के अनुकूल प्राप्त पूजा-सामग्री से प्रतिमा आदि में अथवा हृदय में भगवान की पूजा करे।
अपने-अपने उपास्यदेव के विग्रह की हृदयादि अंग, आयुधादि उपांग और पार्षदों सहित उसके मूलमन्त्र द्वारा पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गन्ध, पुष्प, दधि-अक्षत के तिलक, माला, धूप, दीप और नैवेद्य आदि से विधिवत् पूजा करे तथा फिर स्तोत्रों द्वारा स्तुति करके सपरिवार भगवान श्रीहरि को नमस्कार करे।
अपने-आपको भगवन्य ध्यान करते हुए ही भगवान की मूर्ति का पूजन करना चाहिये। निर्माल्य को अपने सिर पर रखे और आदर के साथ भगवद्विग्रह को यथास्थान स्थापित कर पूजा समाप्त करनी चाहिये।
इस प्रकार जो पुरुष अग्नि, सूर्य, जल, अतिथि और अपने हृदय में आत्मरूप श्रीहरि की पूजा करता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। (01-55)
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