*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 11 || अध्याय 05 ||
*भक्तिहीन पुरुषों की गति और भगवान की पूजाविधि का वर्णन*
राजा निमि ने पूछा- योगीश्वरों! आप लोग तो श्रेष्ठ आत्मज्ञानी और भगवान के परमभक्त हैं। कृपा करके यह बतलाइये कि जिनकी कामनाएँ शान्त नहीं हुई हैं, लौकिक-पारलौकिक भोगों की लालसा मिटी नहीं है और मन एवं इन्द्रियाँ भी वश में नहीं हैं तथा जो प्रायः भगवान का भजन भी नहीं करते, ऐसे लोगों की क्या गति होती है?
अब आठवें योगीश्वर चमस जी ने कहा- राजन्! विराट् पुरुष के मुख से सत्त्वप्रधान ब्राह्मण, भुजाओं से सत्त्व-रजप्रधान क्षत्रिय, जाँघों से रज-तम-प्रधान वैश्य और चरणों से तमःप्रधान शूद्र की उत्पत्ति हुई है। उन्हीं की जाँघों से गृहस्थाश्रम, हृदय से ब्रह्मचर्य, वक्षःस्थल से वानप्रस्थ और मस्तक से संन्यास-ये चार आश्रम प्रकट हुए हैं। इन चारों वर्णों और आश्रमों के जन्मदाता स्वयं भगवान ही हैं। वही इनके स्वामी, नियन्ता और आत्मा भी हैं। इसलिए इन वर्ण और आश्रम में रहने वाला जो मनुष्य भगवान का भजन नहीं करता, बल्कि उलटा उनका अनादर करता है, वह अपने स्थान, वर्ण, आश्रम और मनुष्य-योनि से भी च्युत हो जाता है; उसका अधःपतन हो जाता है।
बहुत-सी स्त्रियाँ और शूद्र आदि भगवान की कथा और उनके नामकीर्तन आदि से कुछ दूर पड़ गये हैं। वे आप-जैसे भगवद्भक्तों की दया के पात्र हैं। आप लोग उन्हें कथा-कीर्तन की सुविधा देकर उनका उद्धार करें। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जन्म से, वेदाध्ययन से तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कारों से भगवान के चरणों के निकट तक पहुँच चुके हैं। फिर भी वे वेदों का असली तात्पर्य न समझकर अर्थवाद में लगकर मोहित हो जाते हैं। उन्हें कर्म का रहस्य मालूम नहीं है। मूर्ख होने पर भी वे अपने को पण्डित मानते हैं और अभिमान में अकड़े रहते हैं। वे मीठी-मीठी बातों में भूल जाते हैं और केवल वस्तु-शून्य शब्द-माधुरी के मोह में पड़कर चटकीली-भड़कीली बातें कहा करते हैं। रजोगुण की अधिकता के कारण उनके संकल्प बड़े घोर होते हैं। कामनाओं की तो सीमा ही नहीं रहती, उनका क्रोध भी ऐसा होता है जैसे साँप का, बनावट और घमंड से उन्हें प्रेम होता है। वे पापी लोग भगवान के प्यारे भक्तों की हँसी उड़ाया करते हैं। वे मूर्ख बड़े-बूढ़ों की नहीं, स्त्रियों की उपासना करते हैं। यही नहीं, वे परस्पर इकट्ठे होकर उस घर-गृहस्थी के सम्बन्ध में ही बड़े-बड़े मनसूबे बाँधते हैं, जहाँ का सबसे बड़ा सुख स्त्री-सहवास में ही सीमित है। वे यदि कभी यज्ञ भी करते हैं तो अन्न-दान नहीं करते, विधि का उल्लंघन करते और दक्षिणा तक नहीं देते। वे कर्म का रहस्य न जानने वाले मूर्ख केवल अपनी जीभ को सन्तुष्ट करने और पेट की भूख मिटाने-शरीर को पुष्ट करने के लिये बेचारे पशुओं की हत्या करते हैं। धन-वैभव, कुलीनता, विद्या, दान, सौन्दर्य, बल और कर्म आदि के घमंड से अंधे हो जाते हैं तथा वे दुष्ट उन भगवत्प्रेमी संतों तथा ईश्वर का भी अपमान करते रहते हैं।
राजन्! वेदों ने इस बात को बार-बार दुहराया है कि भगवान आकाश के समान नित्य-निरन्तर समस्त शरीरधारियों में स्थित हैं। वे ही अपने आत्मा और प्रियतम हैं। परन्तु वे मूर्ख इस वेदवाणी को तो सुनते ही नहीं और केवल बड़े-बड़े मनोरथों की बात आपस में कहते-सुनते रहते हैं।
(वेद विधि के रूप में ऐसे ही कर्मों के करने की आज्ञा देता है कि जिसमें मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं होती।) संसार में देखा जाता है कि मैथुन, मांस और मद्य की ओर प्राणी की स्वाभाविक प्रवृत्ति हो जाती है। तब उसे उसमें प्रवृत्त करने के लिये विधान तो हो ही नहीं सकता। ऐसी स्थिति में विवाह, यज्ञ और सूत्रामणि यज्ञ के द्वारा ही जो उनके सेवन की व्यवस्था दी गयी है, उसका अर्थ है लोगों की उच्छ्रंखल प्रवृत्ति का नियन्त्रण, उनका मर्यादा में स्थापन। वास्तव में उसकी ओर से लोगों को हटाना ही श्रुति को अभीष्ट है। धन का एकमात्र फल है धर्म; क्योंकि धर्म से ही परम-तत्त्व का ज्ञान और उसकी निष्ठा-अपरोक्ष अनुभूति सिद्ध होती है और निष्ठा में ही परम शान्ति है। परन्तु यह कितने खेद की बात है कि लोग उस धन का उपयोग घर-गृहस्थी के स्वार्थों में या कामभोग में ही करते हैं और यह नहीं देखते कि हमारा यह शरीर मृत्यु का शिकार है और वह मृत्यु किसी प्रकार भी टाली नहीं जा सकती।
सौत्रामणि यज्ञ में भी सूरा को सूँघने का ही विधान है, पीने का नहीं। यज्ञ में पशु का आलभन (स्पर्शमात्र) ही विहित है, हिंसा नहीं। इसी प्रकार अपनी धर्मपत्नी के साथ मैथुन की आज्ञा भी विषयभोग के लिये नहीं, धार्मिक परम्परा की रक्षा के निमित्त सन्तान उत्पन्न करने के लिये ही दी गयी है। परन्तु जो लोग अर्थवाद के वचनों में फँसे हैं, विषयी हैं, वे अपने इस विशुद्ध धर्म को जानते ही नहीं। जो इस विशुद्ध धर्म को नहीं जानते, वे घमंडी वास्तव में तो दुष्ट हैं, परन्तु समझते हैं अपने को श्रेष्ठ। वे धोखे में पड़े हुए लोग पशुओं की हिंसा करते हैं और मरने के बाद वे पशु ही उन मारने वालों को खाते हैं। यह शरीर मृतक-शरीर है। इसके सम्बन्धी भी इसके साथ ही छूट जाते हैं। जो लोग इस शरीर से तो प्रेम की गाँठ बाँध लेते हैं और दूसरे शरीरों में रहने वाले अपने ही आत्मा एवं सर्वशक्तिमान् भगवान से द्वेष करते हैं, उन मूर्खों का अधःपतन निश्चित है।
जिन लोगों ने आत्मज्ञान सम्पादन करके कैवल्य-मोक्ष नहीं प्राप्त किया है और जो पूरे-पूरे मूढ़ भी नहीं हैं, वे अधूरे न इधर के हैं और न उधर के। वे अर्थ, धर्म, काम-इन तीनों पुरुषार्थों में फँसे रहते हैं, एक क्षण के लिये भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती। वे अपने हाथों अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। ऐसे ही लोगों को आत्मघाती कहते हैं। अज्ञान को ही ज्ञान मानने-वाले इन आत्मघातियों को कभी शान्ति नहीं मिलती, इनके कर्मों की परम्परा कभी शान्त नहीं होती। काल-भगवान सदा-सर्वदा इनके मनोरथों पर पानी फेरते रहते हैं। इनके हृदय की जलन, विषाद कभी मिटने का नहीं।
राजन्! जो लोग अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण से विमुख हैं, वे अत्यन्त परिश्रम करके गृह, पुत्र, मित्र और धन-सम्पत्ति इकट्ठी करते हैं; परन्तु उन्हें अन्त में सब कुछ छोड़ देना पड़ता है और न चाहने पर भी विवश होकर घोर नरक में जाना पड़ता है। (भगवान का भजन न करने वाले विषयों पुरुषों की यही गति होती है)।
राजा निमि ने पूछ- 'योगीश्वरों! आप लोग कृपा करके यह बतलाइये कि भगवान किस समय किस रंग का, कौन-सा आकार स्वीकार करते हैं और मनुष्य किन नामों और विधियों से उनकी उपासना करते हैं।'
अब नवें योगीश्वर करभाजन जी ने कहा- राजन्! चार युग हैं- सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि। इन युगों में भगवान के अनेकों रंग, नाम और आकृतियाँ होती हैं तथा विभिन्न विधियों से उनकी पूजा की जाती है। सत्ययुग में भगवान के श्रीविग्रह का रंग होता है श्वेत। उनके चार भुजाएँ और सिर पर जटा होती है तथा वे वल्कल का ही वस्त्र पहनते हैं। काले मृग का चर्म, यज्ञोपवीत, रुद्राक्ष की माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते हैं। सत्ययुग के मनुष्य बड़े शान्त, परस्पर वैररहित, सबके हितैषी और समदर्शी होते हैं। वे लोग इन्द्रियों और मन को वश में रखकर ध्यानरूप तपस्या के द्वारा सबके प्रकाशक परमात्मा की आराधना करते हैं। वे लोग हंस, सुपर्ण, वैकुण्ठ, धर्म, योगेश्वर, अमल, ईश्वर, पुरुष, अव्यक्त और परमात्मा आदि नामों के द्वारा भगवान के गुण, लीला आदि का गान करते हैं।
राजन्! त्रेतायुग में भगवान के श्रीविग्रह का रंग होता है लाल। चार भुजाएँ होती हैं और कटिभाग में वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञ के रूप में रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रों को धारण किया करते हैं। उस युग के मनुष्य अपने धर्म में बड़ी निष्ठा रखने वाले और वेदों के अध्ययन-अध्यापन में बड़े प्रवीण होते हैं। वे लोग ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदरूप वेदत्रयी के द्वारा सर्वदेवस्वरूप देवाधिदेव भगवान श्रीहरि की आराधना करते हैं ।
त्रेतायुग में अधिकांश लोग विष्णु, यज्ञ, पृष्निगर्भ, सर्वदेव, उरुक्रम, वृषाकपि, जयन्त और उरुगाय आदि नामों से उनके गुण और लीला आदि का कीर्तन करते हैं। राजन्! द्वापर युग में भगवान के श्रीविग्रह का रंग होता है साँवला। वे पीताम्बर तथा शंख, चक्र, गदा आदि अपने आयुध धारण करते हैं। वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न, भृगुलता, कौस्तुभ मणि आदि लक्षणों से वे पहचाने जाते हैं। राजन्! उस समय जिज्ञासु मनुष्य महाराजों के चिह्न, छत्र, चँवर आदि से युक्त परमपुरुष भगवान की वैदिक और तान्त्रिक विधि से आराधना करते हैं। वे लोग इस प्रकार भगवान की स्तुति करते हैं- 'हे ज्ञानस्वरूप भगवान वासुदेव एवं क्रिया शक्तिरूप संकर्षण! हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं। भगवान प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के रूप में हम आपको नमस्कार करते हैं। ऋषि नारायण, महात्मा नर, विश्वेश्वर, विश्वरूप और सर्वभूतात्मा भगवान को हम नमस्कार करते हैं।' राजन्! द्वापर युग में इस प्रकार लोग जगदीश्वर भगवान स्तुति करते हैं।
अब कलियुग में अनेक तन्त्रों के विधि-विधान से भगवान की जैसी पूजा की जाती है, उसका वर्णन सुनो-
कलियुग में भगवान का श्रीविग्रह होता है कृष्ण-वर्ण-काले रंग का। जैसे नीलम मणि में से उज्ज्वल कान्तिधारा निकलती रहती है, वैसे ही उनके अंग की छटा भी उज्ज्वल होती है। वे हृदय आदि अंग, कौस्तुभ आदि उपांग, सुदर्शन आदि अस्त्र और सुनन्द प्रभृति पार्षदों से संयुक्त रहते हैं। कलियुग में श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न पुरुष ऐसे यज्ञों के द्वारा उनकी आराधना करते हैं जिनमें नाम, गुण, लीला आदि के कीर्तन की प्रधानता रहती है।
वे लोग भगवान स्तुति इस प्रकार करते हैं- ‘प्रभो! आप शरणागत रक्षक हैं। आपके चरणारविन्द सदा-सर्वदा ध्यान करने योग्य, माया-मोह के कारण होने वाले सांसारिक पराजयों का अन्त कर देने वाले तथा भक्तों की समस्त अभीष्ट वस्तुओं का दान करने वाले कामधेनुस्वरूप हैं। वे तीर्थों को भी तीर्थ बनाने वाले स्वयं परम तीर्थस्वरूप हैं; शिव, ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवता उन्हें नमस्कार करते हैं और चाहे जो कोई उनकी शरण में आ जाये, उसे स्वीकार कर लेते हैं। सेवकों की समस्त आर्ति और विपत्ति के नाशक तथा संसार-सागर से पार जाने के लिये जहाज हैं। महापुरुष! मैं आपके उन्हीं चरणारविन्दों की वन्दना करता हूँ। भगवन्! आपके चरणकमलों की महिमा कौन कहे? रामावतार में अपने पिता दशरथ जी के वचनों में देवताओं के लिये भी वांछनीय और दुस्त्य्ज राज्य-लक्ष्मी को छोड़कर आपके चरण-कमल वन-वन घूमते फिरे! सचमुच आप धर्मनिष्ठता की सीमा हैं। और महापुरुष! अपनी प्रेयसी सीता के चाहने पर जान-बूझकर आपके चरणकमल माया मृग के पीछे दौड़ते रहे। सचमुच आप प्रेम की सीमा हैं। प्रभो! मैं आपके उन्हीं चरणारविन्दों की वन्दना करता हूँ’।
राजन्! इस प्रकार विभिन्न युगों के लोग अपने-अपने युग के अनुरूप नाम-रूपों द्वारा विभिन्न प्रकार से भगवान की आराधना करते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-सभी पुरुषार्थों के एकमात्र स्वामी भगवान श्रीहरि ही हैं। कलियुग में केवल संकीर्तन से ही सारे स्वार्थ और परमार्थ बन जाते हैं। इसलिए इस युग का गुण जानने वाले सारग्राही श्रेष्ठ पुरुष कलियुग की बड़ी प्रशंसा करते हैं, इससे बड़ा प्रेम करते हैं। देहाभिमानी जीव संसार चक्र में अनादि काल से भटक रहे हैं। उनके लिये भगवान की लीला, गुण और नाम के कीर्तन से बढ़कर और कोई परम लाभ नहीं है; क्योंकि इससे संसार में भटकना मिट जाता है और परम शान्ति का अनुभव होता है। राजन्! सत्ययुग, त्रेता और द्वापर की प्रजा चाहती है कि हमारा जन्म कलियुग में हो; क्योंकि कलियुग में कहीं-कहीं भगवान नारायण के शरणागत उन्हीं के आश्रय में रहने वाले बहुत-से भक्त उत्पन्न होंगे।
महाराज विदेह! कलियुग में द्रविड़ देश में अधिक भक्त पाये जाते हैं; जहाँ ताम्रपपर्णी, कृतमाला, पयस्विनी, परम पवित्र कावेरी, महानदी और प्रतीची नाम की नदियाँ बहती हैं। राजन्! जो मनुष्य इन नदियों का जल पीते हैं, प्रायः उनका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और वे भगवान वासुदेव के भक्त हो जाते हैं।
राजन्! जो मनुष्य ‘यह करना बाकी है, वह करना आवश्यक है’ इत्यादि कर्म-वासनाओं का अथवा भेद-बुद्धि का परित्याग करके सर्वात्मभाव से शरणागतवत्सल, प्रेम के वरदानी भगवान मुकुन्द की शरण में आ गया है, वह देवताओं, ऋषियों, पितरों, प्राणियों, कुटुम्बियों और अतिथियों के ऋण से उऋण हो जाता है; वह किसी के अधीन, किसी का सेवक, किसी के बन्धन में नहीं रहता। जो प्रेमी भक्त अपने प्रियतम भगवान के चरण-कमलों का अनन्यभाव से-दूसरी भावनाओं, आस्थाओं, वृत्तियों और प्रवृत्तियों को छोड़कर-भजन करता है, उससे, पहली बात तो यह है कि पापकर्म होते ही नहीं; परन्तु यदि कभी किसी प्रकार हो भी जाये तो परमपुरुष भगवान श्रीहरि उसके हृदय में बैठकर वह सब धो-बहा देते और उसके हृदय को शुद्ध कर देते हैं।
नारद जी कहते हैं- वसुदेव जी! मिथिला नरेश राजा निमि नौ योगीश्वरों से इस प्रकार भागवत धर्मों का वर्णन सुनकर बहुत आनन्दित हुए। उन्होंने अपने ऋत्विज् और आचार्यों के साथ ऋषभनन्दन नव योगीश्वरों की पूजा की। इसके बाद सब लोगों के सामने ही वे सिद्ध अन्तर्धान हो गये। विदेहराज निमि ने उनसे सुने हुए भागवत धर्मों का आचरण किया और परमगति प्राप्त की।
महाभाग्यवान् वसुदेव जी! मैंने तुम्हारे आगे जिन भागवत धर्मों का वर्णन किया है, तुम भी यदि श्रद्धा के साथ इनका आचरण करोगे तो अन्त में सब आसक्तियों से छूटकर भगवान का परमपद प्राप्त कर लोगे। वसुदेव जी! त्तुम्हारे और देवकी के यश से तो सारा जगत् भरपूर हो रहा है; क्योंकि सर्वशक्तिमान् भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारे पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। तुम लोगों ने भगवान के दर्शन, आलिंगन तथा बातचीत करने एवं उन्हें सुलाने, बैठाने, खिलाने आदि के द्वारा वात्सल्य-स्नेह करके अपना हृदय शुद्ध कर लिया है; तुम परम पवित्र हो गये हो।
वसुदेव जी! शिशुपाल, पौण्ड्रक और शाल्व आदि राजाओं ने तो वैरभाव से श्रीकृष्ण की चाल-ढाल, लीला-विलास, चितवन-बोलन आदि का स्मरण किया था। वह भी नियमानुसार नहीं, सोते, बैठते, चलते-फिरते-स्वाभाविक रूप से ही। फिर भी उनकी चित्तवृत्ति श्रीकृष्णाकार हो गयी और वे सारूप्यमुक्ति के अधिकारी हुए। फिर जो लोग प्रेम भाव और अनुराग से श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं, उन्हें श्रीकृष्ण की प्राप्ति होने में कोई सन्देह है क्या?
वसुदेव जी! तुम श्रीकृष्ण को केवल अपना पुत्र ही मत समझो। वे सर्वात्मा, सर्वेश्वर, कारणातीत और अविनाशी हैं। उन्होंने लीला के लिये मनुष्य रूप प्रकट करके अपना ऐश्वर्य छिपा रखा है। वे पृथ्वी के भारभूत राजवेषधारी असुरों का नाश और संतों की रक्षा करने के लिये तथा जीवों को परम शान्ति और मुक्ति देने के लिये ही अवतीर्ण हुए हैं और इसी के लिये जगत् में उनकी कीर्ति भी गायी जाती है।
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- प्रिय परीक्षित! नारद जी के मुख से यह सब सुनकर परम भाग्यवान् वसुदेव जी और परम भाग्यवती देवकी जी को बड़ा ही विस्मय हुआ। उनमें जो कुछ माया-मोह अवशेष था, उसे उन्होंने तत्क्षण छोड़ दिया। राजन्! यह इतिहास परम पवित्र है। जो एकाग्रचित्त से इसे धारण करता है, वह अपना सारा शोक-मोह दूर करके ब्रह्मपद को प्राप्त होता है।
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