स्कन्ध 12 || अध्याय 02 || *कलियुग के धर्म*

*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
       "श्रीमद्भागवतमहापुराण" 

स्कन्ध 12 || अध्याय 02 || 
*कलियुग के धर्म*
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! समय बड़ा बलवान् है; ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जायेगा, त्यों-त्यों उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरण शक्ति का लोप होता जायेगा। कलियुग में जिसके पास धन होगा, उसी को लोग कुलीन, सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे। जिसके हाथ में शक्ति होगी वही धर्म और न्याय की व्यवस्था अपने अनुकूल करा सकेगा। विवाह-सम्बन्ध के लिये कुल-शील-योग्यता आदि की परख-निरख नहीं रहेगी, युवक-युवती की पारम्परिक रुचि से ही सम्बन्ध हो जायेगा। व्यवहार की निपुणता सच्चाई और ईमानदारी में नहीं रहेगी; जो जितना छल-कपट कर सकेगा, वह उतना ही व्यवहारकुशल माना जायेगा। स्त्री और पुरुष की श्रेष्ठता का आधार उनका शील-संयम न होकर केवल रतिकौशल ही रहेगा। ब्राह्मण की पहचान उसके गुण-स्वभाव से नहीं यज्ञोपवीत से हुआ करेगी। वस्त्र, दण्ड-कमण्डलु आदि से ही ब्रह्मचारी, संन्यासी आदि आश्रमियों की पहचान होगी और एक-दूसरे का चिह्न स्वीकार कर लेना ही एक से दूसरे आश्रम में प्रवेश का स्वरूप होगा। जो घूस देने या धन खर्च करने में असमर्थ होगा, उसे अदालतों में ठीक-ठीक न्याय न मिल सकेगा। जो बोलचाल में जितना चालक होगा, उसे उतना ही बड़ा पण्डित माना जायेगा।

असाधुता की-दोषी होने की एक ही पहचान रहेगी-गरीब होना। जो जितना अधिक दम्भ-पाखण्ड कर सकेगा, उसे उतना ही बड़ा साधु समझा जायेगा। विवाह के लिये एक-दूसरे की स्वीकृति ही पर्याप्त होगी, शास्त्रीय विधि-विधान की-संस्कार आदि की कोई आवश्यकता न समझी जायेगी। बाल आदि सँवारकर कपड़े-लत्ते से लैस हो जाना ही स्नान समझा जायेगा। लोग दूर के तालाब को तीर्थ मानेंगे और निकट के तीर्थ गंगा-गोमती, माता-पिता आदि की उपेक्षा करेंगे। सिर पर बड़े-बड़े बाल-काकुल रखना ही शारीरिक सौन्दर्य का चिह्न समझा जायेगा और जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा-अपना पेट भर लेना। जो जितनी ढिठाई से बात कर सकेगा, उसे उतना ही सच्चा समझा जायेगा। योग्यता चतुराई का सबसे बड़ा लक्षण यह होगा कि मनुष्य अपने कुटुम्ब का पालन कर ले। धर्म का सेवन यश के लिये किया जायेगा।

इस प्रकार जब सारी पृथ्वी पर दुष्टों का बोलबाला हो जायेगा, तब राजा होने का कोई नियम न रहेगा; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रों में जो बली होगा, वही राजा बन बैठेगा। उस समय के नीच राजा अत्यन्त निर्दय एवं क्रूर होंगे; लोभी तो इतने होंगे कि उसमें और लुटेरों में कोई अन्तर न किया जा सकेगा। वे प्रजा की पूँजी एवं पत्नियों तक को छीन लेंगे। उनसे डरकर प्रजा पहाड़ों और जंगलों में भाग जायेगी। उस समय प्रजा तरह-तरह के शाक, कन्द-मूल, मांस, मधु, फल-फूल और बीज-गुठली आदि खा-खाकर अपना पेट भरेगी। कभी वर्षा न होगी-सूखा पड़ जायेगा; तो कभी कर-पर-कर लगाये जायेंगे। कभी कड़ाके की सर्दी पड़ेगी तो कभी पाला पड़ेगा, कभी आँधी चलेगी, कभी गरमी पड़ेगी तो कभी बाढ़ आ जायेगी। इन उत्पातों से तथा आपस के संघर्ष से प्रजा अत्यन्त पीड़ित होगी, नष्ट हो जायेगी। लोग भूख-प्यास तथा नाना प्रकार की चिन्ताओं से दुःखी रहेंगे। रोगों से तो उन्हें छुटकारा ही न मिलेगा। कलियुग में मनुष्यों की परमायु केवल बीस या तीस वर्ष की होगी।

परीक्षित! कलिकाल के दोष से प्राणियों के शरीर छोटे-छोटे, क्षीण और रोगग्रस्त होने लगेंगे। वर्ण और आश्रमों का धर्म बतलाने वाला वेद-आर्ग नष्टप्राय हो जायेगा। धर्म में पाखण्ड की प्रधानता हो जायेगी। राजे-महाराजे डाकू-लुटेरों के समान हो जायेंगे। मनुष्य चोरी, झूठ तथा निरपराध हिंसा आदि नाना प्रकार के कुकर्मों से जीविका चलाने लगेंगे। चारों वर्णों के लोग शूद्रों के समान हो जायेंगे। गौएँ बकरियों की तरह छोटी-छोटी और कम दूध देने वाली हो जायेंगी। वानप्रस्थी और संन्यासी आदि विरक्त आश्रम वाले भी घर-गृहस्थी जुटाकर गृहस्थों का-सा व्यापार करने लगेंगे। जिनसे विवाहित सम्बन्ध हैं, उन्हीं को अपना सम्बन्धी माना जायेगा। धान, जौ, गेंहूँ आदि धान्यों के पौधे छोटे-छोटे होने लगेंगे। वृक्षों में अधिकांश शमी के समान छोटे और कँटीले वृक्ष ही रह जायेंगे। बादलों में बिजली तो बहुत चमकेगी, परन्तु वर्षा कम होगी। गृहस्थों के घर अतिथि-सत्कार या वेदध्वनि से रहित होने के कारण अथवा जनसंख्या घट जाने के कारण सूने-सूने हो जायेंगे।

परीक्षित! अधिक क्या कहें-कलियुग का अन्त होते-होते मनुष्यों का स्वभाव गधों-जैसा दुःसह बन जायेगा, लोग प्रायः गृहस्थी का भार ढोने वाले और विषयी हो जायेंगे। ऐसी स्थिति में धर्म की रक्षा करने के लिये सत्त्वगुण स्वीकार करके स्वयं भगवान अवतार ग्रहण करेंगे। प्रिय परीक्षित! सर्वव्यापक भगवान विष्णु सर्वशक्तिमान् हैं। वे सर्वस्वरूप होने पर भी चराचर जगत् के शिक्षक-सद्गुरु हैं। वे साधु-सज्जन पुरुषों के धर्म की रक्षा के लिये, उनके कर्म का बन्धन काटकर उन्हें जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने के लिये अवतार ग्रहण करते हैं। उन दिनों शम्भल-ग्राम में विष्णुयश नाम के श्रेष्ठ ब्राह्मण होंगे। उनका हृदय बड़ा उदार एवं भगवद्भक्ति से पूर्ण होगा। उन्हीं के घर कल्कि भगवान अवतार ग्रहण करेंगे। श्रीभगवान ही अष्टसिद्धियों के और समस्त सद्गुणों के एकमात्र आश्रय हैं। समस्त चराचर जगत् के वे ही रक्षक और स्वामी हैं। वे देवदत्त नामक शीघ्रगामी घोड़े पर सवार होकर दुष्टों को तलवार के घाट उतार कर ठीक करेंगे। उनके रोम-रोम से अतुलनीय तेज की किरणें छिटकती होंगी। वे अपने शीघ्रगामी घोड़े से पृथ्वी पर सर्वत्र विचरण करेंगे और राजा के वेष में छिपकर रहने वाले कोटि-कोटि डाकुओं का संहार करेंगे।

प्रिय परीक्षित! जब सब डाकुओं का संहार हो चुकेगा, तब नगर की और देश की सारी प्रजा का हृदय पवित्रता से भर जायेगा; क्योंकि भगवान कल्कि के शरीर में लगे हुए अंगरांग का स्पर्श पाकर अत्यन्त पवित्र हुई वायु उनका स्पर्श करेगी और इस प्रकार वे भगवान के श्रीविग्रह की दिव्य गन्ध प्राप्त कर सकेंगे। उनके पवित्र हृदय में सत्त्वमूर्ति भगवान वासुदेव विराजमान होंगे और फिर उनकी सन्तान पहले की भाँति हष्ट-पुष्ट और बलवान् होने लगेगी। प्रजा के नयन-मनोहारी हरि ही धर्म के रक्षक और स्वामी हैं। वे ही भगवान जब कल्कि के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे, उसी समय सत्ययुग का प्रारम्भ हो जायेगा और प्रजा की सन्तान-परम्परा स्वयं ही सत्त्वगुण से युक्त हो जायेगी। जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक ही समय एक ही साथ पुष्य नक्षत्र के प्रथम पल में प्रवेश करके एक राशि पर आते हैं, उसी समय सत्ययुग का प्रारम्भ होता है।

परीक्षित! चन्द्रवंश और सूर्यवंश में जितने राजा हो गये हैं या होंगे, उन सब का मैंने संक्षेप से वर्णन कर दिया। तूम्हारे जन्म से लेकर राजा नन्द के अभिषेक तक एक हजार एक सौ पन्द्रह वर्ष का समय लगेगा। जिस समय आकाश में सप्तर्षियों का उदय होता है, उस समय पहले उनमें से दो ही दिखायी पड़ते हैं। उनके बीच में दक्षिणोत्तर रेखा पर समभाग में अश्विनी आदि नक्षत्रों में से एक नक्षत्र दिखायी पड़ता है। उस नक्षत्र के साथ सप्तर्षिगण मनुष्यों की गणना से सौ वर्ष तक रहते हैं। वे तुम्हारे जन्म के समय और इस समय भी मघा नक्षत्र पर स्थित हैं। स्वयं सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् भगवान ही शुद्ध सत्त्वमय विग्रह के साथ श्रीकृष्ण  के रूप में प्रकट हुए थे। वे जिस समय अपनी लीला संवरण करके परमधाम को पधार गये, उसी समय कलियुग ने संसार में प्रवेश किया। उसी के कारण मनुष्यों की मति-गति पाप की ओर ढुलक गयी। जब तक लक्ष्मीपती भगवान श्रीकृष्ण अपने चरणकमलों से पृथ्वी का स्पर्श करते रहे, तब तक कलियुग पृथ्वी पर अपना पैर न जमा सका।

परीक्षित! जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर विचरण करते रहते हैं, उसी समय कलियुग का प्रारम्भ होता है। कलियुग की आयु देवताओं की वर्ष गणना से बारह सौ वर्षों की अर्थात् मनुष्यों की गणना के अनुसार चार लाख बत्तीस हजार वर्ष की है। जिस समय सप्तर्षि मघा से चलकर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में जा चुके होंगे, उस समय राजा नन्द का राज्य रहेगा। तभी से कलियुग की वृद्धि शुरू होगी। पुरातत्त्ववेत्ता ऐतिहासिक विद्वानों का कहना है कि जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम-धाम को प्रयाण किया, उसी दिन, उसी समय कलियुग का प्रारम्भ हो गया। परीक्षित! जब देवताओं की वर्ष गणना के अनुसार एक हजार वर्ष बीत चुकेंगे, तब कलियुग के अन्तिम दिनों में फिर से कल्कि भगवान की कृपा से मनुष्यों के मन में सात्त्विकता का संचार होगा, लोग अपने वास्तविक स्वरूप को जान सकेंगे और तभी से सत्ययुग का प्रारम्भ भी होगा।

परीक्षित! मैंने तो तुमसे केवल मनुवंश का, सो भी संक्षेप से वर्णन किया है। जैसे मनुवंश की गणना होती है, वैसे ही प्रत्येक युग में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्रों को भी वंश परम्परा समझनी चाहिये। राजन्! जिन पुरुषों और महात्माओं का वर्णन मैंने तुमसे किया है, अब केवल नाम से ही उनकी पहचान होती है। अब वे नहीं हैं, केवल उनकी यह कथा रह गयी है। अब उनकी कीर्ति ही पृथ्वी पर जहाँ-तहाँ सुनने को मिलती है। भीष्म पितामह के पिता राजा शान्तनु के भाई देवापि  और इक्ष्वाकुवंशी मरू इस समय कलाप-ग्राम में स्थित हैं। वे बहुत बड़े योगबल से युक्त हैं। कलियुग के अन्त में कल्कि भगवान की आज्ञा से वे फिर यहाँ आयेंगे और पहले की भाँति ही वर्णाश्रम धर्म का विस्तार करेंगे। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग- ये ही चार युग हैं; ये पूर्वोक्त क्रम के अनुसार अपने-अपने समय में पृथ्वी के प्राणियों पर अपना प्रभाव दिखाते रहते हैं।

परीक्षित! मैंने तुमसे जिन राजाओं का वर्णन किया है, वे सब और उनके अतिरिक्त दूसरे राजा भी इस पृथ्वी को ‘मेरी-मेरी’ करते रहे, परन्तु अन्त में मरकर धूल में मिल गये। यह शरीर को भले ही कोई राजा कह ले; परन्तु अन्त में यह कीड़ा, विष्ठा अथवा राख के रूप में ही परिणत होगा, राख ही होकर रहेगा। इसी शरीर के या इसके सम्बन्धियों के लिये जो भी किसी भी प्राणी को सताता है, वह न तो अपना स्वार्थ जानता है और न तो परमार्थ। क्योंकि प्राणियों को सताना तो नरक का द्वार है। वे लोग यही सोचा करते हैं कि मेरे दादा-परदादा इस अखण्ड भूमण्डल का शासन करते थे; अब वह मेरे अधीन किस प्रकार रहे और मेरे बाद मेरे बेटे-पोते, मेरे वंशज किस प्रकार इसका उपभोग करें। जो मूर्ख इस आग, पानी और मिट्टी के शरीर को अपना आपा मान बैठते हैं और बड़े अभिमान के साथ डींग हाँकते हैं कि यह पृथ्वी मेरी है। अन्त में वे शरीर और पृथ्वी दोनों को छोड़कर स्वयं ही अदृश्य हो जाते हैं।

प्रिय परीक्षित! जो-जो नरपति बड़े उत्साह और बल-पौरुष से इस पृथ्वी के उपभोग में लगे रहे, उन सब को काल ने अपने विकराल गाल में धर दबाया। अब केवल इतिहास में उनकी कहानी ही शेष रह गयी है।  (01-44)

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