*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 12 || अध्याय 06 ||
*परीक्षित की परमगति, जनमेजय का सर्पसत्र और वेदों के शाखा भेद*
श्रीसूत जी कहते हैं- शौनकादि ऋषियों! व्यासनन्दन श्रीशुकदेव मुनि समस्त चराचर जगत् को अपनी आत्मा के रूप में अनुभव करते हैं और व्यवहार में सबके प्रति समदृष्टि रखते हैं। भगवान के शरणागत एवं उनके द्वारा सुरक्षित राजर्षि परीक्षित ने उसका सम्पूर्ण उपदेश बड़े ध्यान से श्रवण किया। अब वे सिर झुकाकर उनके चरणों के तनिक और पास खिसक आये तथा अंजलि बाँधकर उनसे यह प्रार्थना करने लगे।
राजा परीक्षित ने कहा- भगवन्! आप करुणा के मूर्तिमान् स्वरूप हैं। आपने मुझ पर परम कृपा करके अनादि-अनन्त, एकरस, सत्य भगवान श्रीहरि के स्वरूप और लीलाओं का वर्णन किया है। अब मैं आपकी कृपा से परम अनुगृहीत और कृतकृत्य हो गया हूँ। संसार के प्राणी अपने स्वार्थ और परमार्थ के ज्ञान से शून्य हैं और विभिन्न प्रकार के दुःखों के दावानल से दग्ध हो रहे हैं। उनके ऊपर भगवन्मय महात्माओं का अनुग्रह होना कोई नयी घटना अथवा आश्चर्य की बात नहीं है। यह तो उनके लिये स्वाभाविक ही है। मैंने और मेरे साथ बहुत-से लोगों ने आपके मुखारविन्द से इस श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रवण किया है। इस पुराण में पद-पद पर भगवान श्रीहरि के उस स्वरूप और उन लीलाओं का वर्णन हुआ है, जिसके गान में बड़े-बड़े आत्माराम पुरुष रमते हैं।
भगवन्! आपने मुझे अभयपद का, ब्रह्म और आत्मा की एकता का साक्षात्कार करा दिया है। अब मैं परम शान्ति-स्वरूप ब्रह्म में स्थित हूँ। अब मुझे तक्षक आदि किसी भी मृत्यु के निमित्त से अथवा दल-के-दल मृत्युओं से भी भय नहीं है। मैं अभय हो गया हूँ। ब्रह्मन्! अब आप मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं अपनी वाणी बंद कर लूँ, मौन हो जाऊँ और साथ कामनाओं के संस्कार से भी रहित चित्त को इन्द्रियातीत परमात्मा के स्वरूप में विलीन करके अपने प्राणों का त्याग कर दूँ। आपके द्वारा उपदेश किये हुए ज्ञान और विज्ञान में परिनिष्ठित हो जाने से मेरा अज्ञान सर्वदा के लिये नष्ट हो गया। आपने भगवान के परम कल्याणमय स्वरूप का मुझे साक्षात्कार करा दिया है।
सूत जी कहते हैं- शौनकादि ऋषियों! राजा परीक्षित ने भगवान श्रीशुकदेव जी से इस प्रकार कहकर बड़े प्रेम से उनकी पूजा की। अब वे परीक्षित से विदा लेकर समागत त्यागी महात्माओं, भिक्षुओं के साथ वहाँ से चले गये। राजर्षि परीक्षित ने भी बिना किसी बाह्य सहायता के स्वयं ही अपने अन्तरात्मा को परमात्मा के चिन्तन में समाहित किया और ध्यानमग्न हो गये। उस समय उनका श्वास-प्रश्वास भी नहीं चलता था, ऐसा जान पड़ता था मानो कोई वृक्ष का ठूँठ हो। उन्होंने गंगा जी के तट पर कुशों को इस प्रकार बिछा रखा था, जिसमें उनका अग्रभाव पूर्व की ओर हो और उन पर स्वयं उत्तर मुँह होकर बैठे हुए थे। उनकी आसक्ति और संशय तो पहले ही मिट चुके थे। अब वे ब्रह्म और आत्मा की एकतारूप महायोग में स्थित होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये।
शौनकादि ऋषियों! मुनिकुमार श्रृंगी ने क्रोधित होकर परीक्षित को शाप दे दिया था। अब उनका भेजा हुआ तक्षक सर्प राजा परीक्षित को डसने के लिये उनके पास चला। रास्ते में उसने कश्यप नाम के एक ब्राह्मण को देखा।
कश्यप ब्राह्मण सर्पविष की चिकित्सा करने में बड़े निपुण थे। तक्षक ने बहुत-सा धन देकर कश्यप को वहीं से लौटा दिया, उन्हें राजा के पास न जाने दिया और स्वयं ब्राह्मण के रूप में छिपकर, क्योंकि वह इच्छानुसार रूप धारण कर सकता था, राजा परीक्षित के पास गया और उन्हें डस लिया। राजर्षि परीक्षित् तक्षक के डसने के पहले ही ब्रह्म में स्थित हो चुके थे। अब तक्षक के विष की आग से उनका शरीर सबके समाने ही जलकर भस्म हो गया। पृथ्वी, आकाश और सब दिशाओं में बड़े जोर से ‘हाय-हाय’ की ध्वनि होने लगी। देवता, असुर, मनुष्य आदि सब-के-सब परीक्षित् की यह परम गति देखकर विस्मित हो गये। देवताओं की दुन्दुभियाँ अपने-आप बज उठीं। गन्धर्व और अप्सराएँ गान करने लगीं। देवता लोग ‘साधु-साधु’ के नारे लगाकर पुष्पों की वर्षा करने लगे।
जब जनमेजय ने सुना कि तक्षक ने मेरे पिताजी को डस लिया है, तो उसे बड़ा क्रोध हुआ। अब वह ब्राह्मणों के साथ विधिपूर्वक सर्पों का अग्निकुण्ड में हवन करने लगा। तक्षक ने देखा कि जनमेजय के सर्पसत्र की प्रज्वलित अग्नि में बड़े-बड़े महासर्प भस्म होते जा रहे हैं, तब वह अत्यन्त भयभीत होकर देवराज इन्द्र की शरण में गया। बहुत सर्पों के भस्म होने पर भी तक्षक न आया, यह देखकर परीक्षितनन्दन राजा जनमेजय ने ब्राह्मणों से कहा कि- ‘ब्राह्मणों! अब तक सर्पाधम तक्षक क्यों नहीं भस्म हो रहा है?’ ब्राह्मणों ने कहा- ‘राजेन्द्र! तक्षक इस समय इन्द्र की शरण में चला गया है और वे उसकी रक्षा कर रहे हैं। उन्होंने ही तक्षक को स्तम्भित कर दिया है, इसी से वह अग्निकुण्ड में गिरकर भस्म नहीं हो रहा है’। परीक्षितनन्दन जनमेजय बड़े ही बुद्धिमान और वीर थे। उन्होंने ब्राह्मणों की बात सुनकर ऋत्विजों से कहा कि- ‘ब्राह्मणों! आप लोग इन्द्र के साथ तक्षक को क्यों नहीं अग्नि में में गिरा देते?’ जनमेजय की बात सुनकर ब्राह्मणों ने उस यज्ञ में इन्द्र के साथ तक्षक का अग्निकुण्ड में आवाहन किया। उन्होंने कहा- ‘रे तक्षक! तू मरुद्गण के सहचर इन्द्र के साथ इस अग्निकुण्ड में शीघ्र आ पड़’। जब ब्राह्मणों ने इस प्रकार आकर्षण मन्त्र का पाठ किया, तब तो इन्द्र अपने स्थान स्वर्गलोक से विचलित हो गये। विमान पर बैठे हुए इन्द्र तक्षक के साथ ही बहुत घबड़ा गये और उनका विमान भी चक्कर काटने लगा।
अंगिरानन्दन बृहस्पति जी ने देखा कि आकाश से देवराज इन्द्र विमान और तक्षक के साथ ही अग्निकुण्ड में गिर रहे हैं; तब उन्होंने राजा जनमेजय से कहा- ‘नरेन्द्र! सर्पराज तक्षक को मार डालना आपके योग्य काम नहीं है। यह अमृत पी चुका है। इसलिये यह अजर और अमर है। राजन्! जगत् के प्राणी अपने-अपने कर्म के अनुसार ही जीवन, मरण और मरणोत्तर गति प्राप्त करते हैं। कर्म के अतिरिक्त और कोई भी किसी को सुख-दुःख नहीं दे सकता। जनमेजय! यों तो बहुत-से लोगों की मृत्यु साँप, चोर, आग, बिजली आदि से तथा भूख-प्यास, रोग आदि निमित्तों से होती है; परन्तु यह तो कहने की बात है। वास्तव में तो सभी प्राणी अपने प्रारब्ध-कर्म का ही उपभोग करते हैं।
राजन्! तुमने बहुत-से निरपराध सर्पों को जला दिया है। इस अभिचार-यज्ञ का फल केवल प्राणियों की हिंसा ही है। इसलिये इसे बन्द कर देना चाहिये। क्योंकि जगत् के सभी प्राणी अपने-अपने प्रारब्ध कर्म का ही भोग कर रहे हैं।'
सूत जी कहते हैं- शौनकादि ऋषियों! महर्षि बृहस्पति जी की बात का सम्मान करके जनमेजय ने कहा कि ‘आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।’ उन्होंने सर्पसत्र बंद कर दिया और देवगुरु बृहस्पति जी की विधिपूर्वक पूजा की। ऋषिगण! (जिससे विद्वान् ब्राह्मण को भी क्रोध आया, राजा को शाप हुआ, मृत्यु हुई, फिर जनमेजय को क्रोध आया, सर्प मारे गये) यह वही भगवान विष्णु की महामाया है। यह अनिर्वचनीय है, इसी से भगवान के स्वरूपभूत जीव क्रोधादि गुण-वृत्तियों के द्वारा शरीरों में मोहित हो जाते हैं, एक-दूसरे को दुःख देते और भोगते हैं और अपने प्रयत्न से इसको निवृत्त नहीं कर सकते। (विष्णु भगवान के स्वरूप का निश्चय करके उनका भजन करने से ही माया से निवृत्ति होती है; इसलिये उनके स्वरूप का निरूपण सुनो-) यह दम्भी है, कपटी है-इत्याकारक बुद्धि में बार-बार जो दम्भ-कपट स्फुरण होता है, वही माया है।
जब आत्मवादी पुरुष आत्मचर्चा करने लगते हैं, तब वह परमात्मा के स्वरूप में निर्भयरूप से प्रकाशित नहीं होती; किन्तु भयभीत होकर अपना मोह आदि कार्य न करती हुई ही किसी प्रकार रहती है। इस रूप में उसका प्रतिपादन किया गया है। माया के आश्रित नाना प्रकार के विवाद, मतवाद भी परमात्मा के स्वरूप में नहीं हैं; क्योंकि वे विशेष विषयक हैं और परमात्मा निर्विशेष है। केवल वाद-विवाद की तो बात ही क्या, लोक-परलोक के विषयों के सम्बन्ध में संकल्प-विकल्प करने वाला मन भी शान्त हो जाता है। कर्म, उसके सम्पादन की सामग्री और उनके द्वारा साध्यकर्म-इन तीनों से अन्वित अहंकारात्मक जीव-यह सब जिसमें नहीं हैं, वह आत्म-स्वरूप परमात्मा न तो कभी किसी के द्वारा बाधित होता है और न तो किसी का विरोधी ही है। जो पुरुष उस परमपद के स्वरूप का विचार करता है, वह मन की मायामयी लहरों, अहंकार आदि का बाध करके स्वयं अपने आत्मस्वरूप में विहार करने लगता है। जो मुमुक्षु एवं विचारशील पुरुष परमपद के अतिरिक्त वस्तु का परित्याग करते हुए ‘नेति-नेति’ के द्वारा उसका निषेध करके ऐसी वस्तु प्राप्त करते हैं, जिसका कभी निषेध नहीं हो सकता और न तो कभी त्याग ही, वही विष्णु भगवान का परम पद है; यह बात सभी महात्मा और श्रुतियाँ एक मत से स्वीकार करती हैं।
अपने चित्त को एकाग्र करने वाले पुरुष अन्तःकरण की अशुद्धियों को, असत्य भावनाओं को सदा-सर्वदा के लिये मिटाकर अनन्य प्रेमभाव से परिपूर्ण हृदय के द्वारा उसी परम पद का आलिंगन करते हैं और उसी में समा जाते हैं। विष्णु भगवान का यही वास्तविक स्वरूप है, यही उनका परम पद है। इसकी प्राप्ति उन्हीं लोगों को होती है, जिनके अन्तःकरण में शरीर के प्रति अहंभाव नहीं है, और न तो इसके सम्बन्धी गृह आदि पदार्थों में ममता ही। सचमुच जगत् की वस्तुओं में मैंपन और मेरेपन का आरोप बहुत बड़ी दुर्जनता है।
शौनक जी! जिसे इस परम पद की प्राप्ति अभीष्ट है, उसे चाहिये कि वह दूसरों की कटु वाणी सहन कर ले और बदले में किसी का अपमान न करे। इस क्षणभंगुर शरीर में अहंता-ममता करके किसी भी प्राणी से कभी वैर न करे। भगवान श्रीकृष्ण का ज्ञान अनन्त है। उन्हीं के चरणकमलों के ध्यान से मैंने इस श्रीमद्भागवत महापुराण का अध्ययन किया है। मैं अब उन्हीं को नमस्कार करके यह पुराण समाप्त करता हूँ।
शौनक जी ने पूछा- साधुशिरोमणि सूत जी! वेदव्यास जी के शिष्य पैल आदि महर्षि बड़े महात्मा और वेदों के आचार्य थे। उन लोगों ने कितने प्रकार से वेदों का विभाजन किया, यह बात आप कृपा करके हमें सुनाइये।
सूत जी ने कहा- ब्रह्मन्! जिस समय परमेष्ठी ब्रह्मा जी पूर्व सृष्टि का ज्ञान सम्पादन करने के लिये एकाग्रचित्त हुए, उस समय उनके हृदयाकाश से कण्ठ-तालु आदि स्थानों के संघर्ष से रहित एक अत्यन्त विलक्षण अनाहत नाद प्रकट हुआ। जब जीव अपनी मनोवृत्तियों को रोक लेता है, तब उसे भी उस अनाहत नाद का अनुभव होता है। शौनक जी! बड़े-बड़े योगी उसी अनाहत नाद की उपासना करते हैं और उसके प्रभाव से अन्तःकरण के द्रव्य (अधिभूत) रूप मल को नष्ट करके वह परमगतिरूप मोक्ष प्राप्त करते हैं, जिसमें जन्म-मृत्युरूप संसार चक्र नहीं है। उसी अनाहत नाद से ‘अ’ कार, ‘उ’ कार और और ‘म’ काररूप तीन मात्राओं से युक्त ॐकार प्रकट हुआ। इस ॐकार की शक्ति से ही प्रकृति अव्यक्त से व्यक्त रूप में परिणत हो जाती है। ॐकार स्वयं भी अव्यक्त एवं अनादि है और परमात्मा-स्वरूप होने के कारण स्वयं प्रकाश भी है। जिस परम वस्तु को भगवान ब्रह्म अथवा परमात्मा के नाम से कहा जाता है, उसके स्वरूप का बोध भी ॐकार के द्वारा ही होता है। जब श्रवणेन्द्रिय की शक्ति लुप्त हो जाती है, तब भी इस ॐकार को- समस्त अर्थों को प्रकाशित करने वाले स्फोट तत्त्व को जो सुनता है और सुषुप्ति एवं समाधि-अवस्थाओं में सबके अभाव को भी जानता है, वही परमात्मा का विशुद्ध स्वरूप है। वही ॐकार परमात्मा से हृदयाकाश में प्रकट होकर वेदरूपा वाणी को अभिव्यक्त करता है। ॐकार अपने आश्रय परमात्मा परब्रह्म का साक्षात् वाचक है और ॐकार ही सम्पूर्ण मन्त्र, उपनिषद और वेदों का सनातन बीज है।
शौनक जी! ॐकार के तीन वर्ण हैं- ‘अ’, ‘उ’, और ‘म’। ये ही तीनों वर्ण सत्त्व, रज, तम- इन तीन गुणों; ऋक्, यजुः, साम- इन तीनों; भूः, भुवः, स्वः- इन तीन अर्थों और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति- इन तीन वृत्तियों के रूप में तीन-तीन की संख्या वाले भावों को धारण करते हैं। इसके बाद सर्वशक्तिमान् ब्रह्मा जी ने ॐकार से ही अन्तःस्थ (य, र, ल, व), उष्म (श, ष, स, ह), स्वर (‘अ’ से ‘औ’ तक), स्पर्श (‘क’ से ‘म’ तक) तथा ह्रस्व और दीर्घ आदि लक्षणों से युक्त अक्षर-समाम्नाय अर्थात् वर्णमाला की रचना की। उसी वर्णमाला द्वारा उन्होंने अपने चार मुखों से होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा- इन चार ऋत्विजों के कर्म बतलाने के लिये ॐकार और व्याहृतिओं के सहित चार वेद प्रकट किये और अपने पुत्र ब्रह्मर्षि मरीचि आदि को वेदाध्ययन में कुशल देखकर उन्हें वेदों की शिक्षा दी। वे सभी जब धर्म का उपदेश करने में निपुण हो गये, तब उन्होंने अपने पुत्रों को उनका अध्ययन कराया।
तदनन्तर, उन्हीं लोगों के नैष्ठिक ब्रह्मचारी शिष्य-प्रशिष्यों के द्वारा चारों युगों में सम्प्रदाय के रूप में वेदों की रक्षा होती रही। द्वापर के अन्त में महर्षियों ने उनका विभाजन भी किया। जब ब्रह्मवेत्ता ऋषियों ने देखा कि समय के फेर से लोगों की आयु, शक्ति और बुद्धि क्षीण हो गयी है, तब उन्होंने अपने हृदय-देश में विराजमान परमात्मा की प्रेरणा से वेदों के अनेकों विभाग कर दिये।
शौनक जी! इस वैवस्वत मन्वन्तर में भी ब्रह्मा-शंकर आदि लोकपालों की प्रार्थना से अखिल विश्व के जीवन दाता भगवान ने धर्म की रक्षा के लिये महर्षि पराशर द्वारा सत्यवती के गर्भ से अपने अंशांश-कलास्वरूप व्यास के रूप में अवतार ग्रहण किया है। परम भाग्यवान् शौनक जी! उन्होंने ही वर्तमान युग में वेद के चार विभाग किये हैं। जैसे मणियों के समूह में से विभिन्न जाति की मणियाँ छाँटकर अलग-अलग कर दी जाती हैं, वैसे ही महामति भगवान व्यासदेव ने मन्त्र-समुदाय में से भिन्न-भिन्न प्रकरणों के अनुसार मन्त्रों का संग्रह करके उनसे ऋग्, यजु:, साम और अथर्व-ये चार सहिंताएँ बनायीं और अपने चार शिष्यों को बुलाकर प्रत्येक को एक-एक संहिता की शिक्षा दी। उन्होंने ‘बह्वृच’ नाम की पहली ऋक्संहिता पैल को, ‘निगद’ नाम की दूसरी यजुःसंहिता वैशम्पायन को, सामश्रुतियों की ‘छन्दोग-सहिंता’ जैमिनि को और अपने शिष्य सुमन्तु को ‘अथर्वांगिरससंहिता’ का अध्ययन कराया।
शौनक जी! पैल मुनि ने अपनी संहिता के दो विभाग करके एक का अध्ययन इन्द्र प्रमिति को और दूसरे का बाष्कल को कराया। बाष्कल ने भी अपनी शाखा के चार विभाग करके उन्हें अलग-अलग अपने शिष्य बोध, याज्ञवल्क्य, पराशर और अग्निमित्र को पढ़ाया। परमसंयमी इन्द्र-प्रमिति ने प्रतिभाशाली माण्डूकेय ऋषि को अपनी संहिता का अध्ययन कराया। माण्डूकेय के शिष्य थे-देवमित्र। उन्होंने सौभरि आदि ऋषियों को वेदों का अध्ययन कराया। माण्डूकेय के पुत्र का नाम था शाकल्य। उन्होंने अपनी संहिता के पाँच विभाग करके उन्हें वात्स्य, मुद्गल, शालीय, गोखल्य और शिशिर नामक शिष्यों को पढ़ाया। शाकल्य के एक और शिष्य थे-जातूक कर्ण्य मुनि। उन्होंने अपनी संहिता के तीन विभाग करके तत्सम्बन्धी निरुक्त के साथ अपने शिष्य बलाक, पैज, बैताल और विरज को पढ़ाया। बाष्कल के पुत्र बाष्कलि ने सब शाखाओं से एक ‘वालखिल्य’ नाम की शाखा रची। उसे बालायनि, भज्य एवं कासार ने ग्रहण किया। इन ब्रह्मर्षियों ने पूर्वोक्त सम्प्रदाय के अनुसार ऋग्वेद सम्बन्धी बह्वृच शाखाओं को धारण किया। जो मनुष्य यह वेदों के विभाजन का इतिहास श्रवण करता है, वह सब पापों से छूट जाता है।
शौनक जी! वैशम्पायन के कुछ शिष्यों का नाम था चरकाध्वर्यु। इन लोगों ने अपने गुरुदेव के ब्रह्महत्या-जनित पाप का प्रायश्चित् करने के लिये एक व्रत का अनुष्ठान किया। इसीलिये इनका नाम ‘चरकाध्वर्यु’ पड़ा। वैशम्पायन के एक शिष्य याज्ञवल्क्य मुनि भी थे। उन्होंने अपने गुरुदेव से कहा- ‘अहो भगवन्! ये चरकाध्वर्यु ब्राह्मण तो बहुत ही थोड़ी शक्ति रखते हैं। इनके व्रत पालन से लाभ ही कितना है? मैं आपके प्रायश्चित के लिये बहुत ही कठिन तपस्या करूँगा’। याज्ञवल्क्य मुनि की यह बात सुनकर वैशम्पायन मुनि को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा- ‘बस-बस’, चुप रहो। तुम्हारे-जैसे ब्राह्मणों का अपमान करने वाले शिष्य की मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। देखो, अब तक तुमने मुझसे जो कुछ अध्ययन किया है, उसका शीघ्र-से-शीघ्र त्याग कर दो और यहाँ से चले जाओ।
याज्ञवल्क्य जी देवरात के पुत्र थे। उन्होंने गुरुजी की आज्ञा पाते ही उनके पढ़ाये हुए यजुर्वेद का वमन कर दिया और वे वहाँ से चले गये। जब मुनियों ने देखा कि याज्ञवल्क्य ने तो यजुर्वेद का वमन कर दिया, तब उनके चित्त में इस बात के लिये बड़ा लालच हुआ कि हम लोग किसी प्रकार इसको ग्रहण कर लें। परन्तु ब्राह्मण होकर उगले हुए मन्त्रों को ग्रहण करना अनुचित है, ऐसा सोचकर वे तीतर बन गये और उस सहिंता को चुग लिया। इसी से यजुर्वेद की वह परम रमणीय शाखा ‘तैत्तिरीय’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
शौनक जी! अब याज्ञवल्क्य ने सोचा कि मैं ऐसी श्रुतियाँ प्राप्त करूँ, जो मेरे गुरुजी के पास भी न हों। इसके लिये वे सूर्य भगवान का उपस्थान करने लगे। याज्ञवल्क्य जी इस प्रकार उपस्थान करते हैं- 'मैं ॐकार स्वरूप भगवान सूर्य को नमस्कार करता हूँ। आप सम्पूर्ण जगत् के आत्मा और कालस्वरूप हैं। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त जितने भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज-चार प्रकार के प्राणी हैं, उन सबके हृदय देश में और बाहर आकाश के समान व्याप्त रहकर भी आप उपाधि के धर्मों से असंग रहने वाले अद्वितीय भगवान ही हैं। आप ही क्षण, लव, निमेष आदि अवयवों से संघटित संवत्सरों के द्वारा एवं जल के आकर्षण-विकर्षण-आदान-प्रदान के द्वारा समस्त लोकों की जीवन यात्रा चलाते हैं। प्रभो! आप समस्त देवताओं में श्रेष्ठ हैं। जो लोग प्रतिदिन तीनों समय वेद-विधि से आपकी उपासना करते हैं, उनके सारे पाप और दुःखों के बीजों को आप भस्म कर देते हैं। सूर्यदेव! आप सारी सृष्टि के मूल कारण एवं समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी हैं। इसलिये हम आपके इस तेजोमय मण्डल का पूरी एकाग्रता के साथ ध्यान करते हैं। आप सबके आत्मा और अन्तर्यामी हैं। जगत् में जितने चराचर प्राणी हैं, सब आपके ही आश्रित हैं। आप ही उनके अचेतन मन, इन्द्रिय और प्राणों के प्रेरक हैं। यह लोक प्रतिदिन अन्धकाररूप अजगर के विकराल मुँह में पड़कर अचेत और मुर्दा-सा हो जाता है। आप परम करुणास्वरूप हैं, इसलिये कृपा करके अपनी दृष्टिमात्र से ही इसे सचेत कर देते हैं और परम कल्याण के साधन समय-समय के धर्मानुष्ठानों में लगाकर आत्माभिमुख करते हैं। जैसे राजा दुष्टों को भयभीत करता हुआ अपने राज्य में विचरण करता है, वैसे ही आप चोर-जार आदि दुष्टों को भयभीत करते हुए विचरते रहते हैं। चारों ओर सभी दिक्पाल स्थान-स्थान पर अपनी कमल की कली के समान अंजलियों से आपको उपहार समर्पित करते हैं। भगवन्! आपके दोनों चरणकमल तीनों लोकों के गुरु-सदृश महानुभावों से भी वन्दित हैं। मैंने आपके युगल चरणकमलों की इसलिये शरण ली है कि मुझे ऐसे यजुर्वेद की प्राप्ति हो, जो अब तक किसी को न मिला हो।'
सूत जी कहते हैं- शौनकादि ऋषियों! जब याज्ञवल्क्य मुनि ने भगवान सूर्य की इस प्रकार स्तुति की, तब वे प्रसन्न होकर उनके सामने अश्वरूप से प्रकट हुए और उन्हें यजुर्वेद के उन मन्त्रों का उपदेश किया, जो अब तक किसी को प्राप्त न हुए थे। इसके बाद याज्ञवल्क्य मुनि ने यजुर्वेद के असंख्य मन्त्रों से उसकी पंद्रह शाखाओं की रचना की। वही 'वाजसनेय' शाखा के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्हें कण्व, माध्यन्दिन आदि ऋषियों ने ग्रहण किया।
यह बात मैं पहले ही कह चुका हूँ कि महर्षि श्रीकृष्ण-द्वैपायन ने जैमिनि मुनि को 'सामसंहिता' का अध्ययन कराया। उनके पुत्र थे सुमन्तु मुनि और पौत्र थे सुन्वान्। जैमिनि मुनि ने अपने पुत्र और पौत्र को एक-एक संहिता पढ़ायी।
जैमिनि मुनि के एक शिष्य का नाम था सुकर्मा। वह एक महान् पुरुष था। जैसे एक वृक्ष में बहुत-सी डालियाँ होती हैं, वैसे ही सुकर्मा ने सामवेद की एक हजार संहिताएँ बना दीं।
सुकर्मा के शिष्य कोसल देश निवासी हिरण्यनाभ, पौष्यंजि और ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ आवन्त्य ने उन शाखाओं को ग्रहण किया। पौष्यंजि और आवन्त्य के पाँच सौ शिष्य थे। वे उत्तर दिशा के निवासी होने के कारण औदीच्य सामवेदी भी कहलाते थे। उन्हीं को प्राच्य सामवेदी भी कहते हैं। उन्होंने एक-एक संहिता का अध्ययन किया। पौष्यंजि के और भी शिष्य थे- लौगाक्षि, मांगलि, कुल्य, कुसीद और कुक्षि। इसमें से प्रत्येक ने सौ-सौ सहिंताओं का अध्ययन किया।
हिरण्यनाभ का शिष्य था- कृत। उसने अपने शिष्यों को चौबीस संहिताएँ पढ़ायीं। शेष संहिताएँ परम संयमी आवन्त्य ने अपने शिष्यों को दीं। इस प्रकार सामदेव का विस्तार हुआ। (01-80)
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