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“नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः।।”
– मुण्डकोपनिषद २/३/११
‘परम् ऋषियों को नमस्कार है, परम् ऋषियों को नमस्कार है।’
सप्तर्षियों का प्रादुर्भाव श्री ब्रह्मा जी के मानस संकल्प से हुआ है। सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्मा जी ने अपने ही समान दस मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके नाम हैं – मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष तथा नारद।
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
भृगुर्वसिष्ठो दक्षश्च दशमस्तत्र नारदः ॥ – श्रीमद्भागवत महापुराण ३/१२/२२
ये ऋषि गुणों में ब्रह्मा जी के समान ही हैं, अतः पुराणों में ये नौ ब्रह्मा भी कहे गए हैं। – “नव ब्राह्मण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥” (विष्णु पुराण १/७/६)
विष्णुपुराण (१/७/५) में नारद जी का नाम पृथक लिया गया है और नौ की गणना हुई है।
भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्ग़िरसं तथा।
मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसम् ॥
यही आदि ऋषि – सर्ग है। ये ही ऋषि भिन्न – भिन्न मन्वन्तरों में नामभेद से सप्तर्षियों के रूप में अवतरित होते रहते हैं।
श्रीमद्भागवत में श्री सूत जी शौनकादि ऋषियों से कहते हैं कि ऋषि, मनु, देवता, प्रजापति, मनुपुत्र और जितने भी शक्तिशाली हैं, वे सब के सब भगवान श्री हरि के अंशावतार अथवा कलावतार हैं।
ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः।
कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयस्तथा ॥ – श्रीमद्भागवत १/३/२७
इस प्रकार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सप्तर्षिगण भी भगवान के ही अवतार हैं। सप्तर्षियों का परिगणन भगवद्भूतियों में हुआ है।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्।। – गीता १०/४१
इन ऋषियों का प्रादुर्भाव ब्रह्मा जी के मानसिक संकल्प से उनके अनेक अंगों से हुआ है, अतः यह ऋषिसृष्टि मानससृष्टि या अंगिकसृष्टि अथवा सांकल्पित सृष्टि भी कहलाती है।
इनमें नारद जी प्रजापति ब्रह्मा की गोद से, दक्ष अंगूठे से, वशिष्ठ प्राण से, भृगु त्वचा से, क्रतु हाथ से, पुलह नाभि से, पुलस्त्य कानों से, अंगिरा मुख से, अत्रि नेत्रों से और मरीचि मन से उत्पन्न हुए।
उत्सङ्गान्नारदो जज्ञे दक्षोऽङ्गुष्ठात्स्वयम्भुवः ।
प्राणाद्वसिष्ठः सञ्जातो भृगुस्त्वचि करात्क्रतुः ॥
पुलहो नाभितो जज्ञे पुलस्त्यः कर्णयोः ऋषिः ।
अङ्गिरा मुखतोऽक्ष्णोऽत्रिः मरीचिर्मनसोऽभवत् ॥ – श्रीमद्भ० ३/१२/२३ – २४
ब्रह्मा जी से प्रादुर्भूत ऋषियों की इस सृष्टि को पुराणों में ऋषिसर्ग कहा गया है। प्रकारांतर से ये ऋषि ब्रह्माजी के ही आत्मरूप, अंशरूप हैं और उन्ही के अवतार हैं। सृष्टि के विस्तार तथा उसके रक्षण में इन ऋषियों का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक मन्वन्तर में नामभेद से ये ही ऋषि सप्तर्षि होकर महाप्रलय में चराचर के सूक्ष्मतम स्वरूप और वनस्पतियों तथा औषधियों को बीज रूप में धारण कर विद्यमान रहते हैं, प्रलय में भी ये बने रहते हैं और पुनः नई सृष्टि में उसका विस्तार करते हैं। इस प्रकार से सप्तर्षिगण जीवों पर महान कृपा करते हैं। कदाचित ये स्थूल सृष्टि के सत्त्वांश और चैतन्यांश को धारण कर प्रलयकाल में सुरक्षित न रखते तो नवीन सृष्टि पुनः होना कठिन होती।
ये ऋषि भगवान के अनन्य भक्त हैं और उन्ही के कृपा प्रसाद से समर्थ होकर जीवों का कल्याण करते रहते हैं। ये एक रूप से नक्षत्रलोक में सप्तर्षिमण्डल में स्थित रहते हैं और दूसरे रूप में तीनों लोकों में विशेष रूप से भूलोक में स्थित रह कर लोगों को धर्माचरण तथा सदाचरण की शिक्षा देते हैं तथा ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, तप, भगवत्प्रेम, सत्य, परोपकार, क्षमा, अहिंसा आदि सात्विक भावों की प्रतिष्ठा करते हैं।
प्रति चार युग (सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि) बीतने पर ‘वेदविप्लव’ होता है। इसीलिए सप्तर्षिगण भूतल पर अवतीर्ण होकर वेद का उद्धार करते हैं। सप्तर्षिमण्डल आकाश में सुप्रसिद्ध ज्योतिर्मंडलों में है। इसके अधिष्ठाता ऋषिगण लोक में ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखते हैं। अधिकारी जिज्ञासु को प्रत्यक्ष या परोक्ष, जैसा वह अधिकारी हो, तत्वज्ञान की ओर उन्मुख कर के मुक्तिपथ में लगाते हैं।
ये सभी ऋषि कल्पान्तचिरजीवी, त्रिकालदर्शी, मुक्तात्मा और दिव्य देहधारी होते हैं। ये स्थितप्रज्ञ तथा अतिन्द्रीयद्रष्टा हैं। पुराणों में इन्हें ब्रह्मवादी और गृहमेधी कहा गया है (वायुपुराण)। गृहस्थ होते हुए भी ये मुनिवृत्ति से रहते हैं। ये सत्य, धर्म, ज्ञान, शौच, संतोष और ब्रह्मतेज से सम्पन्न होते हैं। यज्ञों द्वारा देवताओं का आप्यायन और नित्य स्वाध्याय इनकी मुख्य चर्या रहती है।
…
अलग – अलग मन्वन्तरों में सप्तर्षि बदल जाते हैं। मनुकाल ही मन्वन्तर कहलाता है। ब्रह्मा जी के एक दिन (कल्प) में चौदह मनु होते हैं। चौदह मनु तथा मनुपुत्र एक – एक कर समस्त पृथ्वी के राजा होकर धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करते हैं। मनुओं के नाम के अनुसार ही चौदह मन्वन्तरों के चौदह नाम पड़े हैं। इन चौदह मनुओं में प्रथम मनु का नाम स्वायम्भुव मनु है।
भगवान विष्णु के नाभिपद्म से चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने आविर्भूत होकर मैथुनी सृष्टि के संकल्प को लेकर अपने ही शरीर से स्वायम्भुव मनु तथा महारानी शतरूपा को प्रकट किया। ये आदि मनु ही प्रथम मनु हैं, जिनके नाम से स्वायम्भुव मन्वन्तर पड़ा। कल्पभेद से मन्वन्तरों के नाम में भी अंतर मिलता है।
प्रत्येक मन्वन्तर में सप्तर्षि भिन्न – भिन्न नाम रूपों से अवतरित होते हैं। पुराणों में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। उदाहरण के रूप में विष्णु पुराण में चौदह मन्वन्तरों के सप्तर्षियों का नाम दिए गए हैं।
इसप्रकार चौदह मन्वन्तरों में सप्तर्षियों का परिगणन पृथक – पृथक नाम – रूपों में हुआ है। इन ऋषियों की अपार महिमा है, ये सभी तपोधन हैं।
ऋषियों ने वेदमंत्रों का दर्शन किया है, इसीलिए ‘ऋषयो मंत्रद्रष्टारः’ कहा गया है। ऋषि कौन हैं? इसकी व्याख्या में बताया गया है कि ऋषि वेदमंत्रों के द्रष्टा और स्मर्ता हैं। इसीलिए वेदों को अपरुषेय कहा गया है। “ऋषिर्दर्शनात् स्तोमान् ददर्श” (निरुक्त नैगमकाण्ड २/११) आदि कहा गया है।
यह वैदिक सिद्धांत है कि वेद का अध्ययन ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग के अधिष्ठान के साथ करना चाहिए। आचार्य शौनक कहते हैं :
एतान्यविदित्वा योऽधीतेऽनुब्रूते जपति जुहोति यजते याजयते तस्य ब्रह्म निर्वीर्यं यातयामं भवति…। (अनुक्रमणी १/१)
अर्थात जो मनुष्य ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग को जाने बिना वेद का अध्ययन, अध्यापन, जप, हवन, यजन, याजन आदि करते हैं उनका वेदाध्ययन निष्फल तथा दोषयुक्त होता है।
इसप्रकार ऋषियों के स्मरण की विशेष महिमा है। प्रातः काल जगने के अनन्तर ऋषियों के नाम – स्मरणपूर्वक उनके मंगल की कामना की जाती है।
भृगुवाशिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च,
मनुः पुलस्त्यः पुलहश्च गौतमः।
रेभ्योः मरीचिश्च्यवनश्च दक्षः,
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ – वामनपुराण
वेदों में तो सप्तर्षियों की महिमा का बार – बार प्रख्यापन हुआ है। वहां सात संख्या का परिगणन ऋषियों के एक विशेष वर्ग के लिए हुआ है।
ब्रम्हर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि तथा रजर्षि – इन सात रूपों में भी ऋषियों का विभाजन है। जैसे ४९ मरुद् देवताओं का सात – सात का वर्ग है, वैसे ही ऋषियों में भी सात ऋषियों के वर्ग हैं, जो सप्तर्षि कहलाते हैं। सात की संख्या की विशेष महिमा है। इस ब्रह्मांड में सात लोक ऊपर और सात लोक नीचे हैं, सात ही सागर हैं, वेद के गायत्री, उष्णिक् आदि सात छन्द ही मुख्य हैं, भगवान सूर्य सप्तश्ववाहन कहे जाते हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में सात की संख्या का विशेष परिज्ञान कराया गया है।
“सप्त ते अन्गे समिधः सप्त जिह्वाः” – यजुर्वेद १७/७९
उपनिषद के एक मंत्र में भी सात की संख्या का अवबोधन कराया गया है।
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्,
सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः।
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा,
गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ – मुण्डकोपनिषद २/१/८
यज्ञ में छंदोमय सात परिधियाँ तथा सात – सात की संख्या में समिधाएं बताई गई हैं।
“सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृतः” (यजुर्वेद ३१/१५)
सप्तशती तथा सप्ताह आदि में भी सप्त पद निहित है।
प्रातः स्मरण के एक मांगलिक श्लोक में सप्तर्षियों तथा सात सात की संख्या वाले पदार्थों से प्रभात को सुप्रभात बनाने की प्रार्थना की गई है –
सप्त स्वराः सप्त रसातलानि,
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम।
सप्तार्णवाः सप्त कुलाचलाश्च,
सप्तर्षयो द्वीपवनानि सप्त।
भूरादिकृत्वा भुवनानि सप्त,
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ – वामनपुराण
अर्थात षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद – ये सप्त स्वर, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल तथा पाताल, ये सात अधोलोक सभी मेरे प्रातःकाल को मंगलमय करें। सातों समुद्र, सातों कुलपर्वत, सप्तर्षिगण, सातों वन तथा सातों द्वीप, भूलोक, भुवर्लोक आदि सातों लोक, सभी मेरे प्रातः काल को मंगलमय करें।
इसी आशय से ऋषियों की सात की संख्या को लेकर एक विशेष वर्ग है, जो सप्तर्षि कहलाता है।
सप्तर्षियों की आराधना – वेदों के अनेक मंत्रों में सप्तर्षियों की प्रार्थना की गई है। तर्पण में नित्य ऋषितर्पण तथा श्रावणी के दिन ऋषियों का तर्पण तथा विशेष पूजन होता है। वेदों में प्राप्त सप्तर्षियों की प्रार्थना के मुख्य मंत्र का भाव यह है कि सप्तर्षिगण सूक्ष्म रूप से इस देह में भी विद्यमान रह कर देव रूप होकर इसका संचालन करते हैं। ये सात ऋषि प्राण, त्वचा, चक्षु, श्रवण, रसना, घ्राण तथा मन रूप से देह में स्थित रहते हैं और सुषुप्तिकाल में देह में व्याप्त रहते हुए भी हृदयाकाश स्थित विज्ञानात्मक ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाते हैं –
सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम् ।
सप्तापः स्वपतो लोकमीयुस्तत्र जागृतो अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ।। – यजुर्वेद ३४/५५
इसके साथ ही यजुर्वेद १३/५४ – ५८ में सप्तर्षियों के पूजन में मंत्र आये हैं। भाद्रपद शुक्ल पंचमी ऋषिपंचमी के नाम से विख्यात है, इस दिन इनकी विशेष पूजा आराधना की जाती है तथा सातों ऋषियों की पृथक पृथक यथाशक्ति स्वर्णादि की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा की जाती है।
“अरुन्धतीसहितसप्तऋर्षिभ्यो नमः” इस नाम मंत्र से भी एक साथ यजन किया जा सकता है। इनके ध्यान में बताया गया है कि ये ऋषिश्रेष्ठ ब्रह्मतेज और करोड़ो सूर्यों की आभा से सम्पन्न हैं।
कश्यपोऽत्रिरर्भरद्वाजो विश्वामित्रऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च अरुन्धत्या सहाष्टकाः।।
मूर्ति ब्रह्मण्यदेववर्षेर्बह्मण्यं तेज उत्तमम्।
सूर्यकोटिप्रतिकाशमृषिवृन्दं विचिन्तयेत्।। – वर्षकृत्यदीपक
कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि तथा वशिष्ठ – ये वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं। महर्षि वशिष्ठ जी के साथ उनकी धर्मप्राणा देवी अरुंधति भी साथ में ही सप्तर्षिमण्डल में स्थित रहती हैं। महाभागा अरुंधति के पातिव्रत्य की अपार महिमा है, इसी के बल पर ये सदा वशिष्ठ जी के साथ रहती हैं। सप्तर्षियों के साथ देवी अरुंधति का भी पूजन होता है। अखंड सौभाग्य तथा श्रेष्ठ दाम्पत्य के लिए इनकी आराधना होती है।
आकाश में सप्तर्षिमण्डल कहाँ स्थित है, इस विषय में श्रीमद्भागवत ५/२२/१७ में बताया गया है कि नवग्रहों के लोकों से ऊपर ग्यारह लाख योजन की दूरी पर कश्यप आदि सप्तर्षि दिखाई देते हैं। ये सब लोकों की मंगलकामना करते हुए भगवान विष्णु के परम् ध्रुवलोक की प्रदक्षिणा किया करते हैं।
तत उत्तरस्मादृषय एकादशलक्षयोजनान्तर उपलभ्यन्ते य एव लोकानां शमनुभावयन्तो भगवतो विष्णोर्यत्परमं पदं प्रदक्षिणं प्रक्रमन्ति ॥
आकाश में सप्तर्षिमण्डल के उत्तर में ध्रुवलोक स्थित है। इसप्रकार सप्तर्षिमण्डल में स्थित रहकर ये सप्तर्षिगण जीवों के शुभाशुभ कर्मो के साक्षी बनते हैं और भगवान की अवतरण लीला में सहयोगी बनते हैं। भगवान श्री राम आदि की लीला में महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम तथा अत्रि आदि ऋषि सहयोगी रहे हैं। ऐसे ही अन्य अवतारों में भी ऋषिगण भगवान की भक्ति करते हैं और उनके कृपाप्रसाद से जगत के कल्याण कार्य में सतत चेष्टारत रहते हैं। भगवान के लीलासंवरण के अनन्तर भी ये उनके द्वारा प्रतिपादित धर्म की मर्यादा को सुरक्षित रखने के लिए कल्पपर्यंत बने रहते हैं और पुनः अवतरित होते हैं।
ब्रह्माण्ड की आयु (Universe Age - Vedas|ShriMadBhagwatam)
श्री मदभागवतम् में ब्रह्माण्ड उत्पति का जो वर्णन मिलता है वो इस प्रकार है :
ब्रह्माण्ड उत्पति से पूर्व भगवान विष्णु ही केवल विधमान थे और शयनाधीन थे. विष्णु जी की नाभि से एक कमल अंकुरित हुआ । उसी कमल में ब्रह्मा विराजमान थे।
While Vishnu is asleep, a lotus sprouts of his navel (note that navel is symbolised as the root of creation!). Inside this lotus, Brahma resides. Brahma represents the universe which we all live in, and it is this Brahma who creates life forms.
कमल में विराजमान ब्रह्मा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधित्व करते है अर्थात ब्रह्मा ही ब्रह्माण्ड है इसी कारण इसे ब्रह्म+अण्ड (Cosmic Egg) कहा गया है .
बिल्कुल इसी प्रकार के थ्योरी आधुनिक विज्ञानं की है जिसे बिगबेंग की संज्ञा दी गयी । इसमे बताया गया है की ब्रह्माण्ड उत्पति एक बिंदु (शुन्य) से हुई .
Brahma represents our universe which has birth and death, a big bang and a big crunch from a navel singularity. Vishnu represents the eternity that lies beyond our universe which has no birth or death and that which is eternal! Many such universes like ours exist in Vishnu.
ब्रह्माण्ड उत्पति से पूर्व जो शक्ति विद्यमान थी वो विष्णु है, जिस ब्रह्माण्ड में अभी हम है ये अस्थायी है, इसका आरंभ व् अंत सतत रूप से होता रहता है। किन्तु ब्रह्माण्ड अंत के पश्चात पुनः सब पदार्थ व् अपदार्थ उसी शक्ति में विलीन हो जाते है जो श्री विष्णु का स्वरुप है।
शास्त्रों में ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष बताई गयी है ब्रह्मा की आयु अर्थात ब्रह्माण्ड की आयु.
जैसा की हम ऊपर कह चुके है की चतुर्मुखी ब्रह्मा , ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधित्व करते है . चारों वेदों की उत्पति इन्ही से हुई है अतः चोरों वेदों के ज्ञाता होने के कारन ही ये चतुर्मुखी है .
इसी प्रकार की व्याख्या ऋग्वेद के १ ० वें मंडल के १ २ ९ वें सूक्त (नासदीय सूक्त) में मिलती है ! निम्न विडियो देखें :
इन 100 ब्रह्म वर्षों के पश्चात ब्रह्माण्ड का अंत एक महासंकुचन (big crunch) के साथ होता है . वेदों का कहना है की अब तक कई ब्रह्मा आये और गये अर्थात जिस ब्रह्माण्ड में हम जी रहे है ये न ही प्रथम है और न ही अंतिम .
Vedas say that thousands of brahmas have passed away! In other words, this is not the first time universe has been created.
अब हम ये देखते है की ब्रह्मा का 1 वर्ष हमारे लिए कितना बड़ा है .
ब्रह्मा का 1 वर्ष :
ब्रह्मा के प्रत्येक वर्ष में 360 दिन होते है।
ब्रह्मा का 1 दिन :
ब्रह्मा के 1 दिन में दिन +रात होते है . जिसे एक कल्प भी कहा जाता है ,
A kalpa is made up of brahma’s one day and one night.
ब्रह्मा केवल दिन में ही स्रष्टि रचते है और रात्रि में उनके निद्राधीन होते ही ब्रह्माण्ड का अंत उंसी प्रकार होता है जैसे कोई सुन्दर स्वप्न टुटा हो .
हम, मानव दिन में कार्य करते है तथा रात्रि को नींद में स्वप्न देखते है और हमारे स्वप्न की एक अलग ही दुनिया होती है जिसे स्वप्न आकाश कहा जाता है। जो प्रतेक व्यक्ति का भिन्न होता है। किन्तु ब्रह्मा जी का हिसाब किताब मनुष्यों से उल्टा है, वे दिन समय में जो स्वप्न देकते है वह उनका स्वप्न आकाश है जो ब्रह्माण्ड है और अनंत है जिसमे सारा ब्रहमांड तथा चराचर जिव, हम मनुष्य आदि जीते है।
इसी करण हमारे यहाँ कहा गया है :- "ब्रह्म सत्य, जगह मिथ्या"
जगह को मिथ्या इसी लिए कहा गया है क्यू की ये तो ईश्वर का एक सुन्दर स्वप्न मात्र है। और ब्रह्म सत्य इसलिए क्यू की जगत के अंत के पश्चात एक ईश्वर ही शेष रहता है।
तो कुल मिला कर बात यह है की ब्रह्मा दिन में जो स्वप्न देखते है, हम उसी में जीते है और रात्रि में निद्राधीन होते ही ब्रह्मा (ब्रह्माण्ड) सुप्त अवस्था में चले जाते है . और अगले दिन पुनः उनका स्वप्न आरंभ होता है और ब्रहमांड उपस्थित हो जाता है .
अब देखना ये है की ब्रह्मा का एक दिन कितना बड़ा होता है ??
ब्रह्मा के एक दिन (एक कल्प) में 28 मन्वन्तर होते है . अर्थात दिन समय में 14 मन्वन्तर और 14 ही रात्रि में .
ब्रह्मा का 1 मन्वन्तर :
ब्रह्मा के 1 मन्वन्तर में 71 महायुग होते है ।
ब्रह्मा का १ महायुग :
ब्रह्मा के 1 महायुग में 4 युग होते है । क्रमश : सत्य(क्रेता) , त्रेता , द्वापर , कलि ।
ब्रह्मा की आयु : 100 वर्ष
1 वर्ष = 360 दिन
1 दिन = 1 कल्प =28 मन्वन्तर
1 मन्वन्तर = 71 महायुग
1 महायुग = 4 युग
गणना :
कलियुग की आयु जो बताई गई है वो है : 4,32,000 साल ।
इस कलियुग के लगभग 5000 वर्ष बीत चुके है, इसे घटाने पर :
2038607000 -5000 =2038602000 वर्ष
ऐसे कितने ब्रह्माण्ड?:
जैसा की हम देख चुके है की न तो वर्तमान ब्रह्माण्ड प्रथम है और न ही अंतिम ।
परन्तु पुराणों में एक और रोचक तथ्य मिलता है वो ये है की एक समय में भी एक से अधिक ब्रह्माण्ड अस्तित्व में रहते है प्रत्येक के ब्रह्मा भिन्न होते है । इसलिए कहा गया है की महाविष्णु के उदर में असंख्य ब्रह्माण्ड वास करते है । इसे निम्न फोटो द्वारा समझे :
आधुनिक विज्ञानी इसे Multiverse कहते है ।
"The multiverse (or meta-universe) is the hypothetical set of multiple possible universes"
http://en.wikipedia.org/wiki/Multiverse
वैदिक ऋषियों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंच मण्डल क्रम वाली है। चन्द्र मंडल, पृथ्वी मंडल, सूर्य मंडल, परमेष्ठी मंडल और स्वायम्भू मंडल। ये उत्तरोत्तर मण्डल का चक्कर लगा रहे हैं।
जैसी चन्द्र प्रथ्वी के, प्रथ्वी सूर्य के , सूर्य परमेष्ठी के, परमेष्ठी स्वायम्भू के|
चन्द्र की प्रथ्वी की एक परिक्रमा -> एक मास
जैसा की हम उपर देख चुके है :
![]() |
| संकल्प। Sankalpa |
संकल्प मंत्र में कहते हैं....
ॐ अस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्राहृणां द्वितीये परार्धे
अर्थात् महाविष्णु द्वारा प्रवर्तित अनंत कालचक्र में वर्तमान ब्रह्मा की आयु का द्वितीय परार्ध-वर्तमान ब्रह्मा की आयु के 50 वर्ष पूरे हो गये हैं।
श्वेत वाराह कल्पे-कल्प याने ब्रह्मा के 51वें वर्ष का पहला दिन है।
वैवस्वतमन्वंतरे- ब्रह्मा के दिन में 14 मन्वंतर होते हैं उसमें सातवां मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है।
अष्टाविंशतितमे कलियुगे- एक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी होती हैं, उनमें से 28वीं चतुर्युगी का कलियुग चल रहा है।
कलियुगे प्रथमचरणे- कलियुग का प्रारंभिक समय है।
कलिसंवते या युगाब्दे- कलिसंवत् या युगाब्द वर्तमान में 5104 चल रहा है।
जम्बु द्वीपे, ब्रह्मावर्त देशे, भारत खंडे- देश प्रदेश का नाम
अमुक स्थाने - कार्य का स्थान
अमुक संवत्सरे - संवत्सर का नाम
अमुक अयने - उत्तरायन/दक्षिणायन
अमुक ऋतौ - वसंत आदि छह ऋतु हैं
अमुक मासे - चैत्र आदि 12 मास हैं
अमुक पक्षे - पक्ष का नाम (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)
अमुक तिथौ - तिथि का नाम
अमुक वासरे - दिन का नाम
अमुक समये - दिन में कौन सा समय
उपरोक्त में अमुक के स्थान पर क्रमश : नाम बोलने पड़ते है ।
अमुक - व्यक्ति - अपना नाम, फिर पिता का नाम, गोत्र तथा किस उद्देश्य से कौन सा काम कर रहा है, यह बोलकर संकल्प करता है।
इस प्रकार जिस समय संकल्प करता है, सृष्टि आरंभ से उस समय तक का स्मरण सहज व्यवहार में भारतीय जीवन पद्धति में इस व्यवस्था के द्वारा आया है।
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| उपनिषद | The Upanishads |
वही एक सत्य है - वही आत्मा है - वही सत्य तुम स्वयं हो ! तत् त्वम् असि !
Dr Richard Thompson ने वेदों के अध्यन के पश्चात निम्न विडियो बनाया है :
इसके अतिरिक्त पोराणिक कथाओं में सापेक्षता का सिधांत (Theory of relativity) भी मिलता है यहाँ देखें :
http://www.vedicbharat.com/2013/03/theory-of-relativity.html
युग, हिंदु सभ्यता के अनुसार, एक निर्धारित संख्या के वर्षों की कालावधि है। ब्रम्हांड का काल चक्र चार युगों के बाद दोहराता है। हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान से हमे यह पता चलता है की हर ४.१-८.२ अरब सालों बाद ब्रम्हांड में जीवन एक बार निर्माण एवं नष्ट होता है। इस कालावधि को हम ब्रह्मा का एक पूरा दिन (रात और दिन मिलाकर) भी मानते है। ब्रह्मा का जीवनकाल ४० अरब से ३११० अरब वर्षों के बीच होता है।
काल के अंगविशेष के रूप में 'युग' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद से ही मिलता है (दश युगे, ऋग्0 1.158.6) इस युग शब्द का परिमाण अस्पष्ट है। ज्यौतिष-पुराणादि में युग के परिमाण एवं युगधर्म आदि की सुविशद चर्चा मिलती है।
वेदांग ज्योतिष में युग का विवरण है (1,5 श्लोक)। यह युग पंचसंवत्सरात्मक है। कौटिल्य ने भी इस पंचवत्सरात्मक युग का उल्लेख किया है। महाभारत में भी यह युग स्मृत हुआ है। पर यह युग पारिभाषिक है, अर्थात् शास्त्रकारों ने शास्त्रीय व्यवहारसिद्धि के लिये इस युग की कल्पना की है।
युग आदि का परिमाण
मुख्य लौकिक युग सत्य (उकृत), त्रेता, द्वापर और कलि नाम से चार भागों में (चतुर्धा) विभक्त है। इस युग के आधार पर ही मन्वंतर और कल्प की गणना की जाती है। इस गणना के अनुसार सत्य आदि चार युग संध्या (युगारंभ के पहले का काल) और संध्यांश (युगांत के बाद का काल) के साथ 12000 वर्ष परिमित होते हैं। चार युगों का मान 4000 + 3000 + 2000 + 1000 = 10000 वर्ष है; संध्या का 400 + 300 + 200 + 100 = 1000 वर्ष; संध्यांश का भी 1000 वर्ष है। युगों का यह परिमाण दिव्य वर्ष में है। दिव्य वर्ष = 360 मनुष्य वर्ष है; अत: 12000 x 360 = 4320000 वर्ष चतुर्युग का मानुष परिमाण हुआ। तदनुसार सत्ययुग = 1728000; त्रेता = 1296000; द्वापर = 864000; कलि = 432000 वर्ष है। ईद्दश 1000 चतुर्युग (चतुर्युग को युग भी कहा जाता है) से एक कल्प याने ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष है। 71 दिव्ययुगों से एक मन्वंतर होता है। यह वस्तुत: महायुग है। अन्य अवांतर युग भी है।
युगधर्म
युगधर्म का विस्तार के साथ प्रतिपादन इतिहास पुराणों में बहुत मिलता है (देखिये, मत्स्यपुरण 142-144 अ0; गरूड़पुराण 1.223 अध्यय; वनपर्व 149 अध्याय)। किस काल में युग (चतुर्युग) संबंधी पूर्वोक्त धारण प्रवृत्त हुई थी, इस संबंध में गवेषकों का अनुमान है कि खोष्टीय चौथी शती में यह विवरण अपने पूर्ण रूप में प्रसिद्ध हो गया था। वस्तुत: ईसा पूर्व प्रथम शती में भी यह काल माना जाए तो कोई दोष प्रतीत नहीं होताा
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काल विभाजन
This write up is piece of continued research work conducted by the author for a number of years. Each and every thing quoted here is authentic. One may contribute to it, quoting source and authenticity.![]()
A number of words used here are from Sanskrat, for which no English equivalents are available. Sanskrat is the oldest language, which emerged with the universe, is the mother of all languages and most scientific language of the world. It’s the only language in the world, which is perfect and can be understood by computer in To-To. Latin is close to Sanskrat.
The purpose of writing this is to help those who are engaged in research pertaining to evolution of life on our planet and else where in the universe-galaxies.The scientist has not been able to peep beyond this earth, in the absence of useful links and proper measuring tools/units. This write up will provide him with an insight into the various living abodes, much beyond his imagination, which existed and continue to exist.
Considering the birth of Jesus as yard stick, it comes to around at least 27,880-2,71,680 years ago. Till Pop Gregory (1,582) issued Fatwa (dictatorial order) to change calendar year from April to January the Britishers too followed Hindu Vikrami Sanwat calendar which had close contacts of Europe with India ever since Bhagwan Ram solemnised the marriage of Vaners with the illegitimate daughters of Ravan. Europe was created by Jalandhar Maa Lakshmi’s brother and son of Samudr-ocean. Berlin has been mentioned in scriptures and Vaner-a locality still exist there.
विक्रम संवत 2,005 को आधार मानकर ज्योतिष और काल निर्णय के अनुसार सृष्टि का आरम्भ 1,95,58,85,049 वर्ष पूर्व हुआ। तब से लेकर अब तक 6 मन्वतर व्यतीत चुके हैं। वर्तमान अर्थात सातवें मन्वन्तर के 28 वें कलियुग के भी 5,049 वर्ष व्यतीत चुके हैं। मैत्र्युपनिषद् का रचना काल आधे धनिष्ठा से उत्तरायण का आरम्भ है।
“मघाद्यं श्रविष्ठार्द्धम्”[मैत्र्युपनिषद् 6.14]
यह दक्षिणायन को बताता है। ज्योतिष के अनुसार उपनिषदों का रचना काल लगभग उन्हीं नक्षत्रों में हुआ, जो 26,000 वर्षों के अंतराल के बाद पुनः-पुनः आते हैं। यही स्थिति ईसा से 27,880-2,71,680 वर्ष पहले भी थी।
Considering 2,005 Vikrami Sanwat as the base year and calculate the origin of life in the universe & earth specifically, it comes to at least 1,95,58,85,049 years ago. Since then, 6 Manvantars have elapsed-passed and the 7th Manvantar is running. The present cosmic era observes 28th Kali Yug of which 5,049 (in 2011) years had passed in Vikrami Sanwat 2005. Shlok 6.14 of Maetrupnishad mentions Dakshinayan as that point of time. The evolution of Maetrupnishad took place when half of Dhanishtha passed to Uttrayan i.e., the beginning of Makar Rashi-constellation. This situations occurs after every 26,000 years.
Atharv Ved, Varah Mihir’s Panch Siddhantika, Brahm Gupt, Brahmn Sphut Siddhant, Sury Siddhant, and astronomer Lal Achary’s writings describes-mentions, the instruments used for measuring time very-very accurately-precisely, correct to 1,000th fraction of a second. These devices were different from of Sundials, water clocks, hourglasses using sand, incense sticks or candles etc.
Sundial utilises the change in the length of the shadows of some vertical-erect rod. Jantar Mantar-New Delhi and Jaipur has such clocks. Ujjain is the place which was used to measure time with accuracy, ever since. Kurukshetr is the place where life evolved on earth.
Water clock was a device used in ancient India to measure small time intervals required for various events. Small tapered-conical utensils with narrow hole at the bottom were generally used. Leela Wati’s (profounder of Beej Ganit-Algebra) father-a great astrologer used such technique to decide, whether she should marry or not.
During medieval period such vessels were used as hourglass by filling them with fine sand. Flow of sand through the hole was used to measure the time. Burning time of certain incense sticks or candles was also used to measure time, especially in temples in ancient India.
Life will perpetuate in our Universe for 108 divine years (age of Brahma Ji), when Shri Hari will close his eyes. Life on Earth, Swarg and Patal perpetuates till one Kalp-Brahma’s one day.
While, learning Ved, Puran, Upnishad, Brahman, Maha Bharat, Ramayan etc., one comes across the various units of time invariably, which have been used in different Kalps, for the same quantity. In Astrology and Scientific calculations, these units and terms are of immense use and help. It can be established easily, that the units of time, used all over the world currently, have their roots, in the ancient Sanatan Dharm.
Truti (Vaidh, Love and Vipal represent the same quantity), is the fundamental unit of time, described in Puran’s. It is the time taken by the Sun to cross three tri molecules (like Ozone), which can be seen flying in the Sun light, coming through the crevices, in a house through windows.
Nimesh is the time taken by a healthy person, to blink eyes or to pronounce a Matra (Sanskrat-Hindi alphabet called swar-quantity, स्वर).
FUNDAMENTAL UNITS OF TIME :: Vedic-Divine astronomy give a very detailed division of time up to the lowest sub division level of Pran (breath, respiration), a time lapse of four seconds. The lowest sub divisions Pran is the same part of the day as the minute is of the circle, so that a respiration of time is equivalent to a minute of apparent revolution of the heavenly bodies above the earth.
The astronomical division of sidereal time are:
1 क्रति = 1 सैकंड का 34,000 वाँ भाग, 1 त्रुटि=सैकंड का 300 वाँ भाग, 2 त्रुटि = I लव = 1 क्षण, 30 क्षण = 1 विपल, 60 विपल = 1 पल, 60 पल = 1 घड़ी = 24 मिनट।
2.5 घड़ी = 1 होरा = 1 घण्टा = 24 होरा = 1 दिन, 1 सप्ताह = 7 दिन, 1 माह = 4 सप्ताह, 1 ऋतु = 2 माह, 1 वर्ष = 6 ऋतु, 1 शताब्दी = 100 वर्ष, 1 सहस्त्राब्दी = 10 शताब्दी = 1000 वर्ष, 1 युग = 432 सहत्राब्दी = 4,32,000वर्ष, 1 महाकाल = 730 कल्प (1 ब्रह्मा का अन्त और दूसरे ब्रह्मा का उदय; अतः ब्रह्मा एक पद, Post-Title है)।
Thus, Brahma can be used as a unit of time at macro level.
1 Krati = 1/34,000 second,
1 Truti = 1/300 Second, 2 Truti = 2 Love=1 Kshan,
1 Truti त्रुटि = 2 Nimesh = 24 per Second = 1/10 Asu = 29.6296 microseconds or 33,750th part of second = 1/100 Tatpar तत्पर = 29.6296 microseconds.
10 Truti = 10 Vipal = 1 Asu = 4 Seconds.
100 Truti (atoms) = 1 Tatpar (speck),
30 Tatpar (specks) = 1 Nimesh (blinking of an eye, twinkling),
18 Nimesh (blinking of eye, twinkling’s) = 1 Kashtha (bit),
30 Kashtha (bits) = 1 Kala (~minute),
30 Kala (minutes) = 1 Ghatika (~half hour),
1 Nimesh निमेष = 1/45 Pran प्राण = 88.889 milliseconds,
45 Nimesh निमेष = 1 Pran प्राण = 4 Seconds = 6 Pran प्राण,
1 Tatpar तत्पर = 2.96296 milliseconds = 1/30 Nimesh निमेष = 2.96296 milliseconds,
30 Kshan = 1 Vipal, 60 Vipal =1 Pal, 60 Pal =1 Ghadi = 24 Minutes.
1 Pal = 6 Asu/Pran = 24 Seconds = 60 Vipal.
1 Asu आसु or Pran प्राण = 4 seconds,
1 Vinadi विनाड़ी = 24 seconds,
60 Vinadi विनाड़ी = 1 Nadi नाड़ी = 24 Minutes,
60 Nadi नाड़ी = 1 Ahoratr अहो रात्र =1,440 Minutes.
1 Nadi or Dand = 24 minutes,
2 ½ Pal = 1 Minute = 60 Seconds =15 Asu.
60 Pal = 1 Ghunti = 24 Minutes = 460 Asu.
2 ½ Ghunti = 1 Ghunta (hour) = 60 Minutes = 900 Asu,
60 Ghunti = 24 Ghunta = 1 Ahoratr (Day-Night).
2 ½ Vipal = 1 Second = 60 Prati Seconds = 32, 40,000 Atoms.
1 Kala = 60 Vikala,
1 Ansh (Degree, part, segment) = 60 Kala,
1 Rashi = 30 Ansh.
1 Bhagan (One solar year) = 12 Rashi (Astrological signs).
1 Nimesh निमेष = 88.889 milliseconds,
2 Ghatika (half hour) = 1 Muhurt मुहूर्त (~hour)
30 Muhurt मुहूर्त (hour) = 1 Ahoratr अहोरात्र (~day).
1 Muhurt = 48 minutes,
1 Ghati = 24 minutes,
1 Kala = 48 seconds,
1 Kashtha = 1.6 seconds,
1 Kshan क्षण = 3 Nimesh, 1 Kshan= 30 Kala, 1 Kastha= 5 Kshan, 1 Kastha = 15 Nimesh.
1 Kala = 30 Kastha, 1 Laghu = 15 Kastha, 1 Nadika = 15 Laghu, 1 Nadik a (Dand) = 15 Kala,
1 Muhurt = 2 Nadika = 30 Kala = 30 Kastha = 30 Laghu, [further subdivided into 12 parts]
1 Sangav (Morning/Day Break) = 3 Muhurt,
1 Madhyan (Mid Day) = 3 Muhurt, 1 Aprahn (After noon) = 3 Muhurt, 1 Sayahn (Evening, Sandhya) = 3 Muhurt,
1 Divsansh (End of the day) = 3 Muhurt,
1 Day = 15 Muhurt,1 (Day- Night) = 30 Muhurt.
1 Pitr Din (Day) = 30 Bhartiy Din (Length of day in India).
1 Brahm Din = 72,00,000 Bhartiy Din (Length of the day in India), 1 month = 27 days.
1 Day = 4 Prehr = 1 Night.
1 Week = 7 days 1 Paksh (Fortnight) = 15 (Day-Night).
1 Month = 2 Paksh (Fortnight) = 30 (Day-Night).
1 Ritu (Season) = 2 Months.
1 Year = 12 Months = 52 weeks = 6 Seasons = 2 Ayan.
Paksh (Shukl Paksh & Krashn Paksh) is a period of 13 to 16 days (which depend upon Lunar month having 27 to 31 days, sometimes full moon night continues for 2 to 3 days i.e., overlapping of 2 to 3 dates).
Two elementary particles make one double particle, and three double particles make one hexaparticle. The time duration needed for the integration of three hexaparticle is called a Truti and 100 Truti make one Vedh. Three Vedh make one lav. It is calculated that if a second is divided into 1687.5 parts, each part is the duration of one Truti, which is the time needed for the integration of eighteen elementary particles. [Bhagwat 3.11.5-6]
The duration of three Lav = 1 Nimesh, the combination of 3 Nimesh = 1 Kshan. 5 Kshan = one Kashtha and 15 Kastha make one Laghu.
Two Laghu = Two minutes, 15 Laghu make one Nadika, which is also called a Dand. Two Dand make one Muhurt and 6 Dand make one fourth of a day or night. [Bhagwat 3.11.8]
Four Prahar, which are also called Yam, in the day and four in the night of the human being. Similarly, 15 nights are a fortnight and there are two fortnights in a month.[Bhagwat 3.11.10]
The aggregate of two fortnights is one month. The duration of life of a human being is said to be 100 earth years. One day and night on Saty Lok planetary system = 8,640,000 years on earth. [Bhagwat 3.11.11]
ALTERNATE DIVISION-SYSTEM OF THE UNITS OF TIME ::
1 परमाणु = काल की सबसे सूक्ष्मतम अवस्था
2 परमाणु = 1 अणु
3 अणु = 1 त्रसरेणु
3 त्रसरेणु = 1 त्रुटि
10 त्रुटि = 1 प्राण
10 प्राण = 1 वेध
3 वेध = 1 लव या 60 रेणु
3 लव = 1 निमेष
1 निमेष = 1 पलक झपकने का समय (निमेश शब्द राजा निमि के नाम से बना है)
2 निमेष = 1 विपल (60 विपल एक पल होता है)
3 निमेष = 1 क्षण
5 निमेष = 2 सही 1 बटा 2 (21/2) त्रुटि
2 सही 1 बटा 2 त्रुटि = 1 सेकंड या 1 लीक्षक से कुछ कम।
20 निमेष = 10 विपल, एक प्राण या 4 सेकंड
5 क्षण = 1 काष्ठा
15 काष्ठा = 1 दंड, 1 लघु, 1 नाड़ी या 24 मिनट
2 दंड = 1 मुहूर्त
15 लघु = 1 घटी = 1 नाड़ी
1 घटी = 24 मिनट, 60 पल या एक नाड़ी
3 मुहूर्त = 1 प्रहर
2 घटी = 1 मुहूर्त = 48 मिनट
1 प्रहर = 1 याम
60 घटी = 1 अहोरात्र (दिन-रात)
2 निमेष = 1 त्रुटि = 24 सैकेण्ड = 1/10 असु = 1 विपल 10 त्रुटि =1 प्राण =4 सैकेण्ड = 1 असु = 10 विपल 6 प्राण =1 पल = 24 सैकेण्ड = 6 असु = 60 विपल 2 1/2 पल =1 मिनट =60 सैकेण्ड = 15 असु 60 पल = 1 घण्टी = 24 मिनट = 460 असु 2 1/2 घटी =1 घण्टा = 60 मिनट = 900 असु 60 घटी = 24 घण्टा =1 अहरोत्र (दिन-रात) 2 1/2 विपल=1 सैकेण्ड 60 विकला =1 कला; 60 कला = 1 अंश (भाग); 30 अंश=1 राशि; 12 राशि = 1 भगण (नक्षत्र समूह) |
15 दिन-रात = 1 पक्ष,
2 पक्ष = 1 मास (पितरों का एक दिन-रात),
2 मास = 1 ऋतु,
3 ऋतु = 6 मास,
6 मास = 1 अयन (देवताओं का एक दिन-रात)।
2 अयन = 1 वर्ष (यह हिन्दु समय मापन इकाई है। यह इकाई मध्यम श्रेणी की है। एक अयन छः मास के बराबर होता है।
एक याम = 7½ घटि
8 याम अर्ध दिवस = दिन या रात्रि।
एक अहोरात्र = नाक्षत्रीय दिवस (जो कि सूर्योदय से आरम्भ होता है)।
एक तिथि वह समय होता है, जिसमें सूर्य और चंद्र के बीच का देशांतरीय कोण बारह अंश बढ़ जाता है। तिथि दिन में किसी भी समय आरम्भ हो सकती हैं और इनकी अवधि उन्नीस से छब्बीस घंटे तक हो सकती है।
एक पक्ष या पखवाड़ा = पंद्रह तिथियाँ।
एक मास = 2 पक्ष (पूर्णिमा से अमावस्या तक कॄष्ण पक्ष और अमावस्या से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष)।
एक ॠतु = 2 मास।
एक अयन = 3 ॠतुएं।
एक वर्ष = 2 अयन।
उत्तरायन = देवताओं का दिन और दक्षिणायन = देवताओं की रात।
Ayan is the time spent by the Sun in one Hemisphere = 6 months.
Uttrayan (Divine Day): Movement of the Sun towards North (Northern hemisphere); from Maker Rashi to Mithun Rashi, marks the beginning of the day Sun rise of deities-demigods and Sun set of demons day. Its a period of 6 months-equivalent to the day of demigods-deities. Every year on 14th or 15th January (sometimes date change due to correction in solar time) it occurs as a festival called Makar Sankranti, Pongal, Bihu, Lohri in India.
Dakshinayan (Divine Night-Aho Ratr) :: Movement of the Sun towards South (Southern hemisphere); from Kark Rashi to Dhnu Rashi, Sun set of demigods-deities and Sun rise of demons, on the eve of Makar Sankranti. Its a period of 6 months-equivalent to the day of demons.
मानवों का एक वर्ष = देवताओं का एक दिन जिसे दिव्य दिन कहते हैं।
1 वर्ष = 1 संवत्सर=1 अब्द,
10 अब्द = 1 दशाब्द,
100 अब्द = शताब्द।
360 वर्ष = 1 दिव्य वर्ष अर्थात देवताओं का 1 वर्ष।
12,000 दिव्य वर्ष = एक महायुग (चारों युगों को मिलाकर एक महायुग)।
सतयुग :: 4,000 देव वर्ष (सत्रह लाख अट्ठाईस हजार मानव-सौर वर्ष)।
त्रेतायुग :: 3,000 देव वर्ष (बारह लाख छियानवे हजार मानव-सौर वर्ष)।
द्वापरयुग :: 2,000 देववर्ष (आठ लाख चौसठ हजार मानव-सौर वर्ष)।
कलियुग :: 1,000 देव वर्ष (चार लाख बत्तीस हतार मानव-सौर वर्ष)।
निमेषा दश चाश्टौ च काष्ठा त्रिंशत्तु ता: कला। त्रिंशत्कला मुहूर्त: स्यादहोरात्रः॥1.64॥
अठारह निमेष (पलक झपकना) एक काष्ठा, तीस काष्ठा का एक कला, तीस कला का एक मुहूर्त और तीस मुहूर्त का एक अहोरात्र होता है।
Eighteen Nimesh (twinkling of the eye) constitute one Kashtha, thirty Kashtha are equal to one Kala, thirty Kala makes one Muhurt and 30 Muhurt constitute one Ahoratr i.e., day and night.
18 Nimesh = 1 Kashtha,
30 Kashtha = 1 Kala,
30 Kala = 1 Muhurt,
30 Muhurt = 1 Ahoratr.
अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषदैविके। रात्रि: स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामह:॥1.65॥
सूर्य मनुष्य और देवताओं के अहोरात्र का विभाग करता है। प्राणियों के सोने के लिए रात और काम करने के लिए दिन है।
The Sun divides Ahoratr into days and nights for both human and divinity-demigods & deities; the night (being intended) for the repose-sleeping of created beings and the day for performing deeds-work.
पित्र्ये रात्र्यहनी मास: प्रविभागस्तु पक्षयो:।
कर्म चेष्टास्त्वह: कृष्ण: शुक्ल: स्वप्नाय शर्वरी॥1.66॥
मनुष्यों के मास के बराबर पितरों का एक दिन-रात (अहोरात्र) होता है, मास में दो पक्ष होते हैं, मनुष्यों का कृष्णपक्ष, पितरों के कर्म का दिन और शुक्लपक्ष पितरों के सोने के लिए रात होती है।
A month of the humans on earth is equal to one Ahoratr of the Manes i.e,. a day and a night, which is equal to a fortnight constituting of Krashn Paksh and Shukl Paksh. The Krashn Paksh of the Humans is the day of the manes meant for work while the Shukl Paksh-bright phase of the Humans is the night of the Manes meant for sleep-rest.
1 Month of Humans = 1 Ahoratr of Manes = 2 Fortnights of Humans (Krashn Paksh-Dark Phase & Shukl Paksh-Bright phase of Humans),
1 Ahoratr of Manes = 1 day and night of Manes.
1 day of Manes = 1 Krashn Paksh-Dark Phase of Humans-meant for work by the Manes & 1 Shukl Paksh-Bright Phase of Humans meant for rest-sleep by the Manes.
दैवे रात्र्यहनी वर्षं प्रविभाग सत्यो: पुनः।
अहस्तत्रोदगयनं रात्रि: स्यादृक्षिणायनम्॥1.67॥
मनुष्यों के एक वर्ष के तुल्य देवताओं का अहोरात्र होता है। उत्तरायण (मकर से 6 राशि पर्यन्त अर्थात मिथुन तक सूर्य के रहते) दिन और दक्षिणायन (कर्क से मकर तक सूर्य के रहते) में देवताओं की रात्रि होती है।
The Ahoratr of the demigods-deities is equal to one solar year of the humans on earth. Uttrayan, when the Sun is in Northern hemisphere (Period of six constellations Makar- Capricorn to Mithun-Gemini) is demigod’s day and Dakshinayan, when the Sun is in the Southern hemisphere (Period of six constellations Kark-Crab to Makar-Capricorn) is demigods night.
1 Ahoratr of the demigods = 1 Solar year of the humans on earth,
1 Day of demigods = Uttrayan-Sun in Northern hemisphere (period of six constellations Makar- Capricorn to Mithun-Gemini); the period of 6 months,
1 Night of demigods = Dakshinayan-Sun is in the Southern hemisphere (Kark-Crab to Makar-Capricorn) is demigods night, the period of 6 months.
ब्राह्मस्य तु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समासत:।
एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत॥1.68॥
ब्रह्मा जी के रात-दिन का एक-एक युग का जो प्रमाण है, वह क्रमशः इस प्रकार है।
The length of the day & night of Brahma Ji, pertaining to divine cosmic era (Yug) is described respectively, in a systematic order as follows.
चत्वार्याहु: सहस्त्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।
तस्य तावच्छति सन्ध्या संध्यांशश्च तथाविध:॥1.69॥
चार हजार वर्षों का सतयुग होता है, युगारंभ और युगान्त में क्रम से चार-चार सौ वर्ष की संध्या संध्यांश होते हैं।
The Krat-Sat Yug constitutes of 4,000 divine years along with Sandhya-twilight (half-light, semi-darkness, dimness, gloom, partial visibility in the evening) constituting of 400 years and the Sandhyansh (fraction of evening), which is again of 400 years duration.
इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु। एकापायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च॥1.70॥
अन्य तीनों युगों का मान क्रमशः एक दूसरे के वर्षमान में से एक-एक हजार घटाने से प्राप्त होता है और उतने ही सौ वर्ष उनके संध्या और संध्यांश होते हैं। त्रेता युग तीन हजार वर्ष और इसके संध्या और संध्यांश तीन-तीन सौ वर्ष, द्वापर दो हजार वर्ष इसके संध्या और संध्यांश दो-दो सौ वर्ष और कलियुग एक हजार वर्ष का और इसके संध्या और संध्यांश एक-एक सौ वर्ष के होते हैं।
| युग YUG COSMIC ERA | दिव्य वर्षमान LIFE SPAN IN DIVINE YEARS | संध्या SANDHYA LIFE SPAN IN DIVINE YEARS | संध्यांश SANDHYANSH LIFE SPAN IN DIVINE YEARS | सकल दिव्य वर्षमान TOTAL LIFE SPAN OF COSMIC ERA IN DIVINE YEARS | सौरवर्षों में वर्षमान TOTAL LIFE SPAN OF COSMIC ERA IN SOLAR YEARS |
| क्रतयुग-सतयुग SAT YUG | 4,000 | 400 | 400 | 4,800 | 17,28,000 |
| त्रेतायुग TRETA YUG | 3,000 | 300 | 300 | 3,600 | 12,96,000 |
| द्वापरयुग DWAPAR YUG | 2,000 | 200 | 200 | 2,400 | 8,64,000 |
| कलि युग KALI YUG | 1,000 | 100 | 100 | 1,200 | 4,32,000 |
The life span-duration of the other three cosmic era (twilights, ages) is obtained by subtracting (diminishing) 1,000 years and 100-100 years from Treta Yug, for Dwapar Yug subtract 1,000 years from Treta Yug’s duration and 100-100 years and lastly subtract 1,000 years from the age of Dwapar Yug along with 100-100 years towards Sandhya and Sandhyansh.
यदेतत्परिसंख्यातमादावेव चतुर्युगम्। एतद् द्वादशसाहस्त्रं तावतीं रात्रिमेव च॥1.71॥
पहले जो चारों युगों का प्रमाण कहा गया है, इन सबको मिलने से संध्या और संध्यांश के सहित बारह हजार वर्ष हुए इसी को महायुग कहते हैं और यही देवताओं कोा युग है।
The sum total of divine years comes to 12,000 divine years which is called a Yug for the demigods while for the humans this period is termed as Maha Yug measuring 4,320,000 solar years.
1 DIVINE YUG = 12,000 DIVINE YEARS = MAHA YUG FOR HUMANS = 43,20,000 SOLAR YEARS.
दैविकानां युगानां तु सहस्त्रं परिसंख्यया। ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च॥1.72॥
देवताओं के एक हजार युगों का ब्रह्मा का एक दिन और एक हजार युगों की रात होती हैंऔर इतने ही वर्षों का देवताओं का एक दिन होता है।
One thousand Yugs of the demigods constitute Brahma Ji’s one day & another 1,000 Yugs of the demigods make Brahma Ji’s one night.
1,000 DIVINE YUGS OF DEMIGODS = 1 DAY OF BRAHMA JI =1 NIGHT OF BRAHMA JI
One transition of Sun to another, constitute one solar month. 12 solar months constitute one solar year.
1,000 Maha Yugs of Humans = 1,20,00,000 Divine Years of demigods = 4,32,00,00,000 Solar Years of Humans.
71 महायुग = 1 मन्वंतर (लगभग 30,84,48,000 मानव वर्ष बाद प्रलय काल)।
चौदह मन्वंतर = एक कल्प।
एक कल्प = ब्रह्मा जी का एक दिन। (ब्रह्मा का एक दिन बीतने के बाद महाप्रलय होती है और फिर इतनी ही लंबी रात्रि होती है)। इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु 100 वर्ष होती है। उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है।
ब्रह्मा जी का वर्ष यानी 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष। ब्रह्मा जी की 100 वर्ष की आयु अथवा ब्रह्मांड की आयु-31 नील 10 अरब 40 अरब वर्ष (31,10,40,00,00,00,000 वर्ष)।
मन्वंतर की अवधि :: विष्णु पुराण के अनुसार मन्वंतर की अवधि 71 चतुर्युगी के बराबर होती है। इसके अलावा कुछ अतिरिक्त वर्ष भी जोड़े जाते हैं। एक मन्वंतर = 71 चतुर्युगी = 8,52,000 दिव्य वर्ष = 30,67,20,000 मानव वर्ष।
मन्वंतर काल का मान :: वैदिक ऋषियों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंच मंडल क्रम वाली है। चन्द्र मंडल, पृथ्वी मंडल, सूर्य मंडल, परमेष्ठी मंडल और स्वायम्भू मंडल। ये उत्तरोत्तर मंडल का चक्कर लगा रहे हैं।
सूर्य मंडल के परमेष्ठी मंडल (आकाश गंगा) के केंद्र का चक्र पूरा होने पर उसे मन्वंतर काल कहा गया। इसका माप है 30,67,20,000 (तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्ष)।
एक से दूसरे मन्वंतर के बीच 1 संध्यांश सतयुग के बराबर होता है। अत: संध्यांश सहित मन्वंतर का माप हुआ 30 करोड़ 84 लाख 48 हजार वर्ष। आधुनिक मान के अनुसार सूर्य 25 से 27 करोड़ वर्ष में आकाश गंगा के केंद्र का चक्र पूरा करता है।
कल्प का मान :: परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल का परिभ्रमण कर रहा है यानी आकाशगंगा अपने से ऊपर वाली आकाशगंगा का चक्कर लगा रही है। इस काल को कल्प कहा गया यानी इसकी माप है 4 अरब 32 करोड़ वर्ष (4,32,00,00,000)।
इसे ब्रह्मा का 1 दिन कहा गया। जितना बड़ा दिन, उतनी बड़ी रात अत: ब्रह्मा का अहोरात्र यानी 864 करोड़ वर्ष हुआ।
इस कल्प में 6 मन्वंतर अपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब 7वां मन्वंतर काल चल रहा है जिसे वैवस्वत: मनु की संतानों का काल माना जाता है। 27वां चतुर्युगी बीत चुका है। वर्तमान में यह 28वें चतुर्युगी का कृतयुग बीत चुका है और यह कलियुग चल रहा है।
यह कलियुग ब्रह्मा जी के द्वितीय परार्ध में श्वेतवराह नाम के कल्प में और वैवस्वत मनु के मन्वंतर में चल रहा है। इसका प्रथम चरण ही चल रहा है।
30 कल्प :: श्वेत, नीललोहित, वामदेव, रथनतारा, रौरव, देवा, वृत, कंद्रप, साध्य, ईशान, तमाह, सारस्वत, उडान, गरूढ़, कुर्म, नरसिंह, समान, आग्नेय, सोम, मानव, तत्पुमन, वैकुंठ, लक्ष्मी, अघोर, वराह, वैराज, गौरी, महेश्वर, पितृ।
14 मन्वंतर :: स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, (10) ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि तथा इन्द्रसावर्णि।
1 Ayan = 3 Ritu (Seasons).
1 Shravan Month = 30 Days of 24 Hours duration. 1 Sor (Solar) Month = 30 Days and 10 Hours.
1 Nakshtr (Constellations) Month = 29 Days and 22 Hours.
1 Chandr (Lunar) Month = 29 Days and 12 Hours.
Equinox :: A day measuring 24 hours is called Shravan or Vishub.
1 Shravan Year = 360 Shravan Days.
1 Chandr(Lunar) year = 354 Shravan Days = 359 Shravan Days.
1 Som-Varsh (Year) = 1,000 Shrawan Days.
1 Asw Madh Varsh = 1,461 Shravan Days.
1 Sudhar Varsh = 1,826 Shravan Days.
1 Samvatser = 360 Days.
1 Solar Year = 365.2432 Shravan Days = 1 Year on earth: Solar Scale = 365 days, Shravan Scale = 360 Days, Lunar Scale = 354 Days, Constellation Scale = 335 Days.
Paternal, Ancestors, Manes Night = Shukla Paksh, Paternal Ancestors Day = Krishan Paksh, Paternal Ancestors (Day + Night) = 1 Month.
Brahma Ji created life during the day (1 Kalp) which is abolished during the night (1 Kalp) by the Mahesh. Entire creations (life forms/species) of Brahma Ji, all deities, all Praja Patis and Mahrishis remain during the day and are created again after the night. Brahma’s Aho Ratr is not associated with Sun rise and Sun set. It’s a never ending cycle.
Bhagwati’s one Nimesh (blink of eye) = 2 Prardh.
Bhagwan Shanker’s Age = 8 Prardh.
Bhagwan Vishnu’s Age = 4 Prardh.
Bhagwan Brahma’s Age = 2 Prardh = Divine-Deity’s 108 years. Second half-Prardh of Brahma’s life is running currently.
Brahma’s one day (Kalp) = 1 Divine Night.
1 Kalp = 1000 Chatur Yug = 4,32,00,00,000 years.
1 Year of Brahma = 1,000 Kalp.
1 Yug of Brahma Ji = 8,000 Divine Years of Brahma Ji.
1,000 Divine Chatur Yug make the day of 12 hours for Brahma Ji (the Creator) and during another 12 hours, Brahma Ji takes rest and there is no creation during this period.
1 day for Brahma Ji constitutes 1,000 Chatur Yug (= 4,320,000,000 years).
1 Year constitutes 360 x 4,320,000,000 = 1,555,200,000,000 years;
Life span of Brahma Ji is 100 years = 100 x 1,555,200,000,000 = 155,520,000,000,000 years.
1 Day of Bhagwan Vishnu = 1,000 Yug of Brahma
1 Day of Bhagwan Sada Shiv (Kalatma-Maha Kal) = 9000 Days of Bhagwan Vishnu.
Brahma’s 1 Day Night = 28 Indr’s.
1 Indr’s age = 1 Manvantar = Divine 71 Yug.
1 Divine Maha Yug = 1000 Divine Chatur Yug = 14 Manu’s Period.
1 Manu’s Period = Slightly more than 71 6/14 Manvanters.
1 Manvantar = 30, 67, 20,000 Solar years = 8, 52,000 Divine years.
1 Divine-Deity’s Aho Ratr (Day-Night) = 1 Solar Year on earth (Human’s).
1 Divine month = 30 Aho Ratr = 3 Solar (Human’s) years. 100 Human years = Divine 3 months and 10 days.
1 Divine year = 12 Divine months = 360 solar years on earth.
1 Divine Yug = 12,000 Divine years.
1 Sapt Rishi’s Year = 3,030 Solar years.
1 Dhruv (Pole star) Year = 90,000 years. 100 Divine Years = 36,000 Solar (Human, on earth) Years.
YUG-COSMIC ERA-EPOCH-युग यहाँ एक ही हैं।
1 Chatur Yug = Saty Yug + Treta Yug + Dwaper Yug + Kal Yug.
SATY YUG (Cosmic Era) :: Saty Yug + Sandhyance + Sandhya = 4,000 years + 400 years + 400 years = 4,800 Divine years = 17,28,000 Solar Years,
TRETA YUG (Cosmic Era) :: Treta Yug + Sandhyance + Sandhya = 3,000 years + 300 years + 300 years = 3,600 Divine years = 12,96,000 Solar Years,
DWAPER YUG (Cosmic Era) :: Dwaper Yug + Sandhyance + Sandhya = 2,000 years + 200 years + 200 years = 2,400 Divine years = 8,64,000 Solar Years,
KALI YUG (Cosmic Era) :: Kal Yug + Sandhyance + Sandhya = 1,000 years + 100 years + 100 years = 1,200 Divine years = 4,32,000 Solar Years.
Sandhya is the period between the day and night; Sandhyance is a fraction of it. Time Period of Yug including Sandhya and Sandhyance: Solar Years on Earth.
PRALAY (deluge, destruction, devastation, doom’s day प्रलय) :: ALL THE LIVING BEINGS-CREATURES-ORGANISM OF THIS UNIVERSE INCLUDING CHATURMUKH BRAHMA AND DEITIES ARE RULED BY TIME. THEY ARE CREATED, NURTURED AND ARE DESTROYED BY ONE SUPREME AND POWERFUL BEING, WHO IS BEYOND BIRTH OR DEATH.
Initially, there is no rain for 100 years followed by drought and inauspicious signs, disturbances all over the earth. Sun rays tend to destroy all creatures followed by the fire emanating in the ocean. Poisonous flames from the 1000 mouths-hoods of Bhagwan Anant-Shesh Nag, engulf the earth. 3rd eye of Bhagwan Mahesh opens. Entire earth turns into big heap of ash looks like the shell of tortoise. It starts raining with droplets as thick as elephants trunk and all the 7 heavens and the 7 Patal-Sutal Lok are covered with water having the earth in between.Their identity is lost till Bhagwan Vishnu-Narayan do not emerge out of the golden shell floating over the surface of water. Re emergence of Brahma from the Lotus navel of The Lord of Lords Vishnu and Mahesh from the forehead of Brahma Ji, sees the process of evolution again.
(1). Nity Pralay (नित्य प्रलय) :: Nity Pralay is the sleep (an extension of Death).
(2). Naemittik Pralay (नैमित्तिक प्रलय) :: End of a single day of Brahma Ji. The three abodes (Bhu: भू:, Bhuvh भुव: and Suvh: स्व:) disintegrate and assimilate in the Almighty.
(3). Maha Pralay (महा प्रलय) :: Ultimate deluge at the end of the age of one Brahma, which consists of 100 Brahmic Years (365 Times 1,000 Chatur Yug).
(4). Atyantik Pralay (आत्यान्तिक प्रलय) :: The final deliverance or the attainment of Salvation by a creature-living being-entity. One will be free from the cycle of life (Life जीवन) and death (Death मृत्यु), birth rebirth. He is free from the impact of Karm-deeds and the Sansar (universe, world संसार). (This is considered to be variable time span depending upon the different Manvantr, Manu, Yog or the Prajapati.)
All Brahmand’s (Universes are created in One Nimesh and are Destroyed in One Nimesh of Brahma Ji).
VAIKUNTH’S 1/2 GHADI = 21 YUG.
GAULOKE’S 1/2 CHHAN = EARTH’S I MANVANTER.
HUMAN’S AGE: SAT YUG = 400 years, TRETA YUG = 300 Years, DWAPER YUG = 200 Years, KALI YUG = 100 YEARS. PARAM AYU = 105-120 Years in Kali Yug.
Different Calendars essential to understand our universe as a single unit :: Samvatser, Perivatser, Indrvatser, Anuvatser, Vatser.
Names of Days in Brahma’s month.
SHUKL PAKSH-BRIGHT PHASE :: (1). Shwat Varah Kalp, (2). Neel Lohit Kalp, (3). Vam Dev Kalp, (4). Gathanter Kalp, (5). Rorav Kalp, (6). Pran Kalp, (7). Vraht Kalp, (8). Kandarp Kalp, (9). Saty Kalp, (10). Ishan Kalp, (11). Dhyan Kalp, (12). Saraswat Kalp, (13). Udan Kalp, (14). Garud Kalp, (15). Kaurm Kalp;
KRASHN PAKSH-DARK PHASE :: (16). Narsingh Kalp, (17). Samadhi Kalp, (18). Agnay Kalp, (19). Vishnuj Kalp, (20). Sour Kalp, (21). Som Kalp, (22). Bhawan Kalp, (23). Supt Mali Kalp, (24). Vaikunth Kalp, (25). Achiki Kalp, (26). Valmiki Kalp, (27). Vairaj Kalp, (28). Gauri Kalp, (29). Maheshwar Kalp, (30). Pitr Kalp.
Fourteen Manu’s expire in one day (Kalp) of Brahma Ji.
At present 5,011th year (i.e, 2011 AD) of Kali Yug, of the Shwat Varah Kalp is running.
Life span of one Manu is 71 6/14 Chatur Yug or Maha Yug measuring 30,67,20,000 solar years.
Names of the Manu’s :: (1). Swayambhu Manu, (2). Swarochit Manu, (3). Uttam Manu, (4). Tamas Manu, (5). Raiwat Manu, (6). Chakshush Manu, (7). Vaewasvat Manu, (8). Sawarni Manu, (9). Daksh Sawarni Manu, (10). Brahm Sawarni Manu, (11). Dharm Sawarni Manu, (12). Rudr Sawarni Manu, (13). Rauty-Dev Sawarni Manu, (14). Indr Sawarni-Mautyak.
(1). Swayambhu :: One who appears by himself-the self-born (beginning of evolution).
(2). Swarochit :: Incarnation of Aura-brightness, glow.
(3). Uttam :: Incarnation of excellence.
(4). Tamas :: Incarnation of Tam (darkness).
(5). Raewat :: Incarnation of Kuber.
(6). Chakshush :: Son of the vision.
(7). Vaewasvat :: Vaewasvat is the son of Bhagwan Sury Narayan. This is the current phase.
(8). Ark Sawarni (Sawarnika) :: A Manifestation of Bhagwan Sury Narayan.
(9). Daksh Sawarni :: Incarnation of Daksh Prajapati.
(10). Brahm Sawarni :: Incarnation Of Brahma Ji.
(11). Dharm Sawarni :: Incarnation of Dharm Raj (Yam Raj).
(12). Rudr Sawarni :: Incarnation of Bhagwan Shiv.
(13). Dev Sawarni :: Incarnation of the Luster.
(14). Indr Sawarni :: Incarnation of Indr.
71 6/14 cycles of Chatur Yug is called a Manvantar. At the end of each Manvantar, there comes a partial devastation period, which is equivalent to the duration of Krat-Sat Yug. After the elapse of every Manvantar period, the universe is partially dissolved to be recreated.
| TIME SCALE :: Manvantar in Hindu units of time measurement, on a logarithmic. A cosmic days consists of 14 Manvantar of 30,67,20,000 solar years. A Manvantar is further sub divided into 14 MANU. Currently the 7th Manvantar with 7th Manu is running. A Manvantar is one of the 14 sub-units of a cosmic creation and lasts for 710 days or 30,67,20,000 solar years. A Manvantar is divided into a total of 71 Maha Yug. Currently, we live the 28th Maha Yug the 7th Manvantar. The Maha Yug close to each other seamlessly, without having a period of twilight to be separated. |
| 1 MANVANTAR | = 71 6/14 CYCLES OF CHATUR YUG |
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MAHA KALP-THE LIFE SPAN OF BRAHMA JI :: Brahma Ji (the creator) lives for 100 years of 360 such days and at the end, he is said to dissolve, along with his entire Creation, into the Par Matma-Par Brahm Parmeshwar the Almighty (Eternal Soul). The scriptures put Brahma’s age at 100 years in his divine time scale.
Brahma’s life span is equal to 311,040,000,000,000 human years. This period in named as Maha Kalp. A universe lasts only for one Maha Kalp. At the juncture the universe dissolves completely along with the creator Brahm. There after a new universe will be created with a next Brahma. This cycle goes on endlessly. This process of creation and dissolution of the universe goes on endlessly through repetitive cycles of creation and destruction. During the annihilation of the universe, energy is conserved, to manifest again in the next creation.
| 1 MAHA KALP | 100 years of Brahm Ji (311,040,000,000,000) SOLAR YEARS |
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Manu’s live a long and happy life for 100 divine years. India has been the hub of the Sages, Saints, Rishi, Muni’s who have been practicing Yog and other methods for surviving a long period of time. Here are some tried and trusted means for Longevity.
Life span of a human being in Sat/Kret Yug :: 400 years, Treta :: 300 years, Dwaper :: 200 Years, Kali Yug :: 100 years.
There is a long list of people with life span of 100 to millions of years like Pralad Ji, Bahu Bali, Markanday, Lomash, Hanuman Ji, Sugreev, Vibhishan, Bhagwan Ved Vyas, Krapacharya, Kapil Muni, Ashawasthama.
DIVINE-VEDIC CALENDAR :: The Hindu view of time can be broadly referred to as the Vedic-Divine Time System. KAL (Time) is regarded as multi-dimensional. Yam Raj-Dharm Raj is the son of Bhagwan Sury an incarnation of Narayan-Bhagwan Vishnu. He is Kal. Bhagwan Shiv is Maha Kal.
सूर्य के पुत्र यमराज-धर्मराज काल कहे जाते हैं और भगवान् शिव को महाकाल कहा जाता है। पृथ्वी सहित समस्त लोकों में सभी कार्य-कलाप सूर्य से ही निर्धारित किये जाते हैं। सूर्य पुत्र काल समस्त चराचर, जन्म-मरण और समय को निर्धारित करते हैं।
One observes that Indian heritage-scriptures-epics describes-discuss-elaborate this concept of time, in great detail, at great length. It includes Astrology which is a perfect science detailing the various Galaxies, solar systems, stars, constellations, planets, tail stars, nebulae, satellites etc., their movements, orbits, mutual interaction and impact-effect at great length. In fact this is Ultimate.
CYCLIC NATURE OF TIME :: Movement of Sun planets, solar system, Heavens, Petals and all celestial bodies-abodes is cyclical in nature. Entire universe undergoes more than 5 different types of motions simultaneously, at the same moment.
A seed grows into a sapling, a plant and ultimately into a tree. The tree produces seeds for the next generation before its death. Similarly, the process of evolution continues from one generation to another, undergoing mutations-both forward and back ward), changes, modification simultaneously, in its genetic map.
Its common knowledge that water from the ocean evaporates, turns into clouds, rains, changes into hails, snow, water vapours, hydrogen & oxygen, rivers, streams, channels, ponds, lakes and ultimately return back to the ocean, after nurturing the living world.
The rosary has 108 beads. One returns to the first bead, after counting all the 108 beads.
FUNDAMENTAL UNIT OF TIME :: Vedic-Divine astronomy give a very detailed division of time up to the lowest sub division level of Pran (breath, respiration), a time lapse of four seconds. The lowest sub divisions Pran is the same part of the day as the minute is of the circle, so that a respiration of time is equivalent to a minute of apparent revolution of the heavenly bodies above the earth.
One observes remarkable perfection added with precision, still a lot of work is left to be done to correlate various systems prevailing in ancient India, pertaining to measurement of time.
Pran is the basic unit of time of an average healthy man who needs to complete one respiration-breath or to pronounce ten long syllables Guravakshar (गुरावक्षर).
60 Ghatika or Nadi make one day and night.
Purans provide another elaborate division of time (Kal काल, समय), where the fundamental unit is Nimesh (-twinkling-blinking of an eye) (Sury Siddhant).
Truti is referred to as a quarter of the time of falling of an eye lid (twinkling, blinking of an eye).
The earth is performing-observing 5 different kinds of motions as a component of the Galaxy, Solar system as a whole, along with the Sun, revolution round the Sun and rotation around its own axis. The time taken to complete one rotation is 24 hours with the speed of nearly 1,660 Km per hour. Half of it remains in front of the Sun and is illuminated while the portion is on the opposite side remains dark. The illuminated segment observes the day while the dark part has the night.
The illuminated half portion is called-referred to as ahh अहह (day) and the dark half is called the Ratri (रात्रि, night).
60 Ghatika or Nadi make one day and night.
SURY SIDDHANT सूर्य सिद्धांत :: It has two dimensions viz., Virtual and Practical. Time is Murt (मूर्त embodied) and Amurt (अमूर्त, virtual). It unites procession recession and stasis. The Sury Siddhant delineates that ‘what begins with Pran (respiration, breath) is real; that which begins with Truti (त्रुटि, defect) is unreal. Divine-Vedic astronomical text divides the units of time into two categories :: (1). Murt Kala (मूर्त कला) and (2). Amurt Kala (अमूर्त कला). The units of the former kind (Murt Kala मूर्त कला) are manifested by the nature while, the later (Amurt Kala अमूर्त कला) are man’s creation. Thus, Ahoratr, Pran or Asu, Nimesh constitutes (Murt Kala, मूर्त कला), while the remaining ones constitute Amurt Kala (अमूर्त कला).
HOUR (घंटा) :: [अ + होरा + रात्र] Ahoratr is composed of [a + hora + Ratr]. Hora is another measuring fundamental unit of time utilized in Astrological calculations. Varah Mihir-the great Indian mathematician, used this system widely in his works. Its further subdivides into 24 hours.
NOMENCLATURE OF WEEK DAYS :: 60 Ghati or Dand (दण्ड) make one day and night or Ahoratr. Indian astronomers dedicated each Ghati of the day to a planet as its lord and derived the name of the day as per the lord of the first Ghati of the day.
| Sury Sun सूर्य | Sunday रविवार |
| Som-Moon-Luna चन्द्र | Monday सोमवार |
| Mangal-Bhom-Mars मंगल | Tuesday मंगलवार |
| Buddh-Mercury बुद्ध | Wednesday बुद्धवार |
| Guru-Vrahaspati वृहस्पति | Thursday वृहस्पतिवार |
| Shukr-Venus शुक्र | Friday शुक्रवार |
| Shani-Saturn शनि | Saturday शनिवार |
| Rahu-Ketu राहु केतु | Eclipse ग्रहण |
The Solar system has Sun at the focus and the planets revolve round it in elliptical orbits specific orbits in specific intervals of time keeping Sun at one of the two focus depending their distance from it. Life on earth is sustained by the Sun. It is the Lord of the first-initial Ghati, of the first day of the week Ravi Var-Sunday. The Lords of second and third Ghati of Ravi are Mars and Jupiter, respectively. Saturn is the Lord of the 60th Ghati and the moon or Som becomes the Lord of the first Ghati of the next day and is termed as Som Var or Monday (Moon’s Day). While counting 60 Ghati along the circle one has to make 8 complete revolutions involving another 4 planets. Thus, beginning from a particular planet, the 5th place goes to Shani Var-Saturday. When one begins from Saturday he goes to Sunday, completing the cycle.
Yagy Valkay Sanhita Verse (Shlok श्लोक 1-295) gives-mentions the names of the planets exactly in the same order as that of the week days.
SAMVATSAR सम्वतसर :: इनको वर्ष भी कहते हैं। प्रत्येक वर्ष का अलग नाम होता है। कुल 60 वर्ष होते हैं तो एक चक्र पूरा हो जाता है। इनके नाम :- प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृषप्रजा, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, अव्यय, सर्वजीत, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नंदन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्बी, विलम्बी, विकारी, शार्वरी, प्लव, शुभकृत, शोभकृत, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्ल्वंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत, परिधावी, प्रमादी, आनंद, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुन्दुभी, रूधिरोद्गारी, रक्ताक्षी, क्रोधन और अक्षय।
It’s a Sanskrat term for year. There are 60 Samvatsar, each of which has a name. Once all 60 Samvatsar are over, the cycle starts over again. The sixty Samvatsar are divided into 3 groups of 20 Samvatsar each. The first 20 from Prabhav to Vyay are attributed to Brahma. The next 20 from Sarv Jit to Parabhava are devoted to Bhagwan Vishnu & the last 20 are dedicated to Shiv. Kalo Gati Nivartti Sthiti: Samdadhati (Sankhyana Aranyak 7.20).
| 1. Prabhav प्रभव | 13. Pramathin | 25. Khar | 37. Shobhan | 49. Rakshas |
| 2. Vibhav | 14. Vikram | 26. Nandan | 38. Krodhin | 50. Anal |
| 3. Shukl | 15. Vrisha | 27. Vijay | 39. Vishvavasu | 51. Pingal |
| 4. Pramod | 16. Chitrabhanu | 28. Jay | 40. Parabhav | 52. Kal Yukti |
| 5. Prajapati | 17. Svabhanu | 29. Manmath | 41. Plavang | 53. Siddharthin |
| 6. Angira | 18. Taran | 30. Durmukh | 42. Kilak | 54. Raudr |
| 7. Shrimukh | 19. Parthiv | 31. Hemalambin | 43. Saumy | 55. Durmati |
| 8. Bhav | 20. Avyay | 32. Vilambin | 44. Sadharan | 56. Dundubhi |
| 9. Yuvan | 21. Sarvajit | 33. Vikarin | 45. Virodhikrit | 57. Rudhirodgarin |
| 10. Dhatri | 22. Sarvadharin | 34. Shravani | 46. Paritapin | 58. Raktaksh |
| 11. Ishvar | 23. Virodhin | 35. Plav | 47. Pramadin | 59. Krodhan |
| 12. Bahudhany | 24. Vikrit | 36. Shubhakrit | 48. Anand | 60. Kshay |
There are 4 epochs or Yug, namely, KRAT-SAT YUG, TRETA YUG, DWAPAR YUG and KAL YUG. These four Yug together constitute a CHATUR YUG-MAHA YUG. It constitutes of 4,320,000 Solar years on earth. Time period of these Yug has a ratio of (4:3:2:1).
| YUG | SOLAR YEARS | ratio |
| KRAT-SAT YUG | 17,28,000 years | 4 |
| TRETA YUG | 12,96,000 years | 3 |
| DWAPAR YUG | 8,64,000 years | 2 |
| KAL YUG | 4,32,000 years | 1 |
| 1 CHATUR YUG-MAHA YUG | 43,20,000 HUMAN YEARS ON EARTH |
These epochs-eras witness a gradual decline of Dharm, wisdom, enlightenment, knowledge, intellectual capability, life span and emotional and physical strength.
| KRAT-SAT YUG क्रत युग | TRETA YUG त्रेता युग | DWAPAR YUG द्वापर युग | KALI YUG कल युग |
| 17,28,000 | 12,96,000 | 8,64,000 | 4,32,000 |
| VIRTUES, PIOUSITY, TRUTH | ¾ of virtue and ¼ of sin. | ½ virtues and ½ sin. | ¼ of virtues and ¾ of sin. |
| 21 cubits | 14 cubits | 7 cubits | 3.5 cubits |
CORRELATION BETWEEN DIVINE AND HUMAN TIME
| DEITIES 1 DAY = | 1 HUMAN-SOLAR YEAR |
| DEITIES 1 MONTH = | DEITIES 30 DAYS |
| DEITIES 1 YEAR DIVINE YEAR = | DEITIES 12 MONTHS |
DEITIES LIFE SPAN= 100 DIVINE YEARS= 36,000 HUMAN YEARS
KALP-BRAHMA’S: 1 DAY
1 KALP = 1,000 CHATUR YUG = 1 MAHA YUG
BRAHMA’S 1 DAY =1 NIGHT = 2 KALP
290 MILLION YEAR OLD HUMAN FOOT PRINT
This is not an ordinary footprint. It resembles a modern-day human foot, but this is fossilised and embedded into a stone that researchers believe is at around 290 million years old. The discovery was made in New Mexico by palaeontologist Jerry MacDonald in 1987. In the vicinity of this mysterious footprint there are fossilised impressions of birds and other animals. The discovery of the human impression has left Mac Donald particularly puzzled and not he or anyone who has seen and studied the impression has not been able to explain how this modern footprint could have been located in the Permian strata, which according to scholars dates from 290 to 248 million years, a time period which occurred long before man or even birds and dinosaurs existed on this planet, of course, that is according to modern science and scientific thinking.
कल्प :: भगवान् ब्रह्मा जी के एक दिन।
(1). नील वराह कल्प :: पाद्मकल्प के अंत के बाद महाप्रलय हुई। सूर्य के भीषण ताप के चलते धरती के सभी वन-जंगल आदि सूख गए। समुद्र का जल भी जल गया। ज्वालामुखी फूट पड़े। सघन ताप के कारण सूखा हुआ जल वाष्प बनकर आकाश में मेघों के रूप में स्थिर होता गया।
अंत में न रुकने वाली जलप्रलय का सिलसिला शुरू हुआ। चक्रवात उठने लगे और देखते ही देखते समस्त धरती जल में डूब गई। यह देख भगवान् ब्रह्मा जी को चिंता होने लगी, तब उन्होंने जल में निवास करने वाले भगवान् श्री हरी विष्णु का स्मरण किया और फिर भगवान् विष्णु ने नील वराह रूप में प्रकट होकर इस धरती के कुछ हिस्से को जल से मुक्त किया। नील वराह देव ने अपनी पत्नी नयनादेवी के साथ अपनी संपूर्ण वराही सेना को प्रकट किया और धरती को जल से बचाने के लिए तीक्ष्ण दरातों, पाद प्रहारों, फावड़ों और कुदालियों और गैतियों द्वारा धरती को समतल किया।इसके लिए उन्होंने पर्वतों का छेदन तथा गर्तों के पूरण हेतु मृत्तिका के टीलों को जल में डालकर भूमि को बड़े श्रम के साथ समतल करने का प्रयास किया। यह एक प्रकार का यज्ञ ही था, इसलिए भगवान् नील वराह को भगवान् यज्ञ वराह भी कहा गया। नील वराह के इस कार्य को आकाश के सभी देवदूत देख रहे थे। प्रलयकाल का जल उतर जाने के बाद भगवान् के प्रयत्नों से अनेक सुगंधित वन और पुष्कर-पुष्करिणी सरोवर निर्मित हुए, वृक्ष, लताएं उग आईं और धरती पर फिर से हरियाली छा गई। संभवत: इसी काल में मधु और कैटभ का वध किया गया था।
(2). आदि वराह कल्प :- नील वराह कल्प के बाद आदि वराह कल्प शुरू हुआ। इस कल्प में भगवान् विष्णु ने आदि वराह नाम से अवतार लिया। यह वह काल था जबकि दिति और कश्यप के दो भयानक असुर पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का आतंक था। दोनों को ही ब्रह्माजी से वरदान मिला हुआ था।
हिरण्याक्ष का वध :- ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान् वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान् ने जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया।
आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ।
हिरण्यकश्यप का वध :- इस काल में भगवान् वराह ने नृसिंह का अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया था। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान् विष्णु का परम भक्त था, जो हिरण्यकश्यप को पसंद नहीं था तो उसने प्रहलाद को मारने के लिए कई उपाय किए। लेकिन भगवान् विष्णु ने अपने भक्त को बचाने के लिए अंत में नृसिंह का अवतार लिया।
हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी से अमरता का वर मिला था। उसने ब्रह्मा जी से वर मांगा था कि मुझे कोई मनुष्य, दानव, असुर, किन्नर, पशु, पक्षी और जलचर जंतु नहीं मार सके और न में दिन में मरूं, न रात में, न पाताल में, न धरती पर और न आकाश में। भगवान् ब्रह्मा ने कहा :- तथास्थु।
(3). श्वेत वराह कल्प :- वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। वैवस्वत मनु के 10 पुत्र और इला नाम की कन्या थी। वैवस्वत मनु को ही पृथ्वी का प्रथम राजा कहा जाता है। इला का विवाह बुध के साथ हुआ जिससे उसे पुरूरवा नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। यही पुरूरवा प्रख्यात ऐल या चंद्र वंश का संस्थापक था।
वैवस्वत मनु के काल के प्रमुख ऋषि :- वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि।
वैवस्वत मनु की शासन व्यवस्था में देवों में 5 तरह के विभाजन थे :- देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व।
प्रमुख प्रजातियाँ :: देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, भल्ल, वसु, अप्सराएं, रुद्र, मरुदगण, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है।
पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति :: प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीनकाल में 7 द्वीपों में बांटा गया था : जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है।
जम्बू द्वीप के 9 खंड थे :- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय।
देवताओं के गुरु बृहस्पति और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य थे।
तब ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि ये ऋषियों की 7 श्रेणियां होती थीं।
यह वैवस्वत मनु का काल था जबकि वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि ऋषिगण हुआ करते थे।
वराह काल में नील वराह अवतार से लेकर आदि वराह, श्वेत वराह, नृसिंह अवतार, वामन अवतार और कच्छप अवतार हुए । इस काल में सनकादि, इंद्रादि, नर-नारायण हुए, वासुकि-तक्षक, हाहा-हूहू, मेनका-रम्भा, मरुदगण, हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप हुए, दिति-अदिति पुत्र, रथकृत-ओज, हेति-प्रहेति हुए, मधु-कैटभ हुए, भस्मासुर, त्रिपुरासुर हुए, ब्रह्मा के 10 पुत्रों का कुल चला, राजा बाली हुए।
बाली के बाद कच्छप अवतार हुआ और अंत में स्वायंभुव मनु हुए। स्वायंभुव मनु के बाद स्वरोचिष, औत्तमी, तामस मनु, रैवत और चाक्षुष मनु हुए और अंत में जल प्रलय के बाद नए युग की शुरुआत हुई। जल प्रलय के दौरान सातवें मनु वैवस्वत मनु हुए।
इन्द्र-बलि (समुद्र मंथन) :- वामन अवतार के बाद कच्छप अवतार हुआ जिसे कूर्म अवतार भी कहा गया। कूर्म अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्र मंथन के समय मंदार पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदार पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एवं असुरों ने समुद्र मंथन करके 14 रत्नों की प्राप्ति की। इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था। इसके बाद जल प्रलय की घटना घटी।
वैवस्वत मनु सातवें मनु हुए और उनके समय में ही भगवान् श्री हरी विष्णु का मत्स्यावतार हुआ।
ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, शिव आदि पदों पर अलग-अलग कल्पों में अलग देवता विराजमान होते हैं।
मत्स्य पुराण में 30 कल्पों की चर्चा है :- श्वेत, नीललोहित, वामदेव, रथनतारा, रौरव, देवा, वृत, कंद्रप, साध्य, ईशान, तमाह, सारस्वत, उडान, गरूढ़, कुर्म, नरसिंह, समान, आग्नेय, सोम, मानव, तत्पुमन, वैकुंठ, लक्ष्मी, अघोर, वराह, वैराज, गौरी, महेश्वर, पितृ।
महत कल्प :- इस काल के बाद प्रलय हुई थी तो सभी कुछ नष्ट हो गया। इस कल्प में विचित्र-विचित्र और महत् (अंधकार से उत्पन्न) वाले प्राणी और मनुष्य होते थे। जो अंधकार में भी देखने में सक्षम थे।
हिरण्य गर्भ कल्प :- इस काल में धरती का रंग पीला था इसीलिए इसे हिरण्य कहते हैं। हिरण्य के 2 अर्थ होते हैं- एक जल और दूसरा स्वर्ण। हालांकि धतूरे को भी हिरण्य कहा जाता है। माना जाता है कि तब स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे। इस काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ, हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, देवता, हिरप्यानी रैडी (अरंडी), वृक्ष वनस्पति एवं हिरण ही सर्वोपयोगी पशु थे। सभी एकरंगी पशु और पक्षी थे।
ब्रह्मकल्प :- इस कल्प में मनुष्य जाति सिर्फ ब्रह्म (ईश्वर) की ही उपासक थी। क्रम विकास के तहत प्राणियों में विचित्रताओं और सुंदरताओं का जन्म हो चुका था। जम्बूद्वीप में इस काल में ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, रामपुर, रामगंगा केंद्र आदि नाम से स्थल हुआ करते थे। यहां की प्रजाएं परब्रह्म और ब्रह्मवाद की ही उपासना करती थी। इस काल का ऐतिहासिक विवरण हमें ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।
पद्मकल्प :- पुराणों के अनुसार इस कल्प में 16 समुद्र थे। यह कल्प नागवंशियों का था। धरती पर जल की अधिकता थी और नाग प्रजातियों की संख्या भी अधिक थी। कोल, कमठ, बानर (बंजारे) व किरात जातियां थीं और कमल पत्र पुष्पों का बहुविध प्रयोग होता था। सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की नारियां पद्मिनी प्रजाएं थीं। तब के श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति आज के श्रीलंका जैसी नहीं थी। इस कल्प का विवरण हमें पद्म पुराण में विस्तार से मिल सकता है।
वराहकल्प :- वर्तमान में वराह कल्प चल रहा है। इस कल्प में भगवान् विष्णु ने वराह रूप में 3 अवतार लिए :- पहला नील वराह, दूसरा आदि वराह और तीसरा श्वेत वराह। इसी कल्प में विष्णु के 24 अवतार हुए और इसी कल्प में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की थी। वर्तमान में हम इसी कल्प के इतिहास की बात कर रहे हैं। वराह पुराण में इसका विवरण मिलता है।
अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है।
CORRELATION OF TIME AND DISTANCE :: SPEED
SOLAR SYSTEM :: The Sun moves in its own orbit but holding earth and other heavenly bodies in a manner that they do not collide with each other through force of attraction.[Rig Ved 1.35.9]
GRAVITY :: This earth is devoid of hands and legs, yet it moves ahead. All the objects over the earth also move with it. It moves around the sun [Rig Ved 10.22.14].
SPEED OF LIGHT :: With deep respect, I bow to the Sun, who travels 2,202 Yojans in half a Nimesh-blink of eye.[Sayan 14th century AD].
Yojan is a unit of distance-length. 1 Yojan = 9 Miles, I Mile = 1.6 Km.
1 Nimesh is 16/75 of a second.Speed = Distance/Time
2,202 Yojan x 9 miles / 1/2 x 16/75 Nimesh = 185,794 miles per second which is remarkably equal to the actual value of 186 282.397 miles per second.
SOLAR ECLIPSE :: O Sun! When you are blocked by the one whom you gifted your own light (moon), then earth will be surprised by the sudden darkness. Rig Ved 5.40.5]
The Veds detailed descriptions of the universe, planets, and other phenomena demonstrates the vast knowledge of the people of those times far before modern civilisation even started to exist.
CIRCUMFERENCE OF EARTH :: The circumference of the Earth to be 36,000 km,[ Brahm Gupt, 7th century CE]
LENGTH OF THE YEAR :: Sury Siddhant speaks of 4 ways to measure the length of an year namely Nakshatr-constellations, Savan, Lunar-Moon and Saur-Solar. The Saur method accurately estimates the length of year to be 365 days, 6 hours 12 minutes and 30 seconds.
VALUE of PIE :: Arya Bhatt came to the conclusion that pi is irrational and is approximately 3.1416 in 499 CE when he was 23 years old. Pie is circumference of the circle divided by its diameter.
जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।
‘युग’ का मतलब चार युगों कलयुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग से है। कलयुग में 1200 साल, द्वापर में 2400 साल, त्रेता में 3600 और सतयुग में 4800 दिव्य वर्ष होते है। जिनका कुल योग 12000 दिव्य वर्ष है। ‘सहस्त्र’ का मतलब 1000 साल है। ‘योजन’ का मतलब 8 मील से होता है (1 मील में 1.6 किमी होते हैं)। अब अगर 1 योजन को युग और सहस्त्र से गुणा कर दिया जाए तो 8 x 1.6 x 12000 x 1000 = 15,36,00000 (15 करोड़ 36 लाख किमी), जो कि सूर्य से पृथ्वी के बीच की प्रमाणिक दूरी है।
1 Chatur Yug = 43,20,000, 1 Kalp = 1,000, Chatur Yug = 4,32,00,00,000 Solar years, 12,000 Divine years = 43,20,000 Solar Years on Earth.
अब जब यह सूर्य कि गणना सही है तो इसका तात्पर्य है कि चारों युगों कि गणना भी सही होगी अर्थात जब चारों युगों को जोड़ा जाये तब हमारी सभ्यता 12000 दिव्य वर्ष पूर्व प्रमाणित होती है।
अनुलोमगतिर्नौस्थ:पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्।
अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम्॥ [आर्यभटीय गोलपाद 9]
नाव में बैठकर नदी की धारा की या हवा की अनुलोम दिशा में जब स्वाभाविक रूप से नाव का वेग तीव्र होता है , उस समय नदी के दोनों ओर स्थित अचल और उस पर स्थित अचल वृक्षादि वस्तुएं विपरीत दिशा में जाती हुई जान पडती हैं।उसी प्रकार अचल नक्षत्र तारे भी लंका से पश्चिम की ओर जाते हुये दिखते हैं। (क्योंकि हम सब अपनी धुरी पर पश्चिम से पूरब की ओर घूमती हुई पृथ्वीके साथ पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रहे हैं।)
उदयो यो लंकायां सो$स्तमय: सवितुरेव सिद्ध पुरे।
मध्यान्हो यवकोट्यांलोमकविषये$र्धरात्रं स्यात्॥ [आर्यभटी गोलपाद 13]
जो लंका में सूर्योदय है, वही सिद्ध पुर में सूर्यास्त, वही यवकोटि में मध्याह्न और वही लोमकराष्ट्र में अर्धरात्रि है।
गोल पृथ्वी पर जहाँ लंका है, ठीक उसके दूसरी तरफ 180 अंश पर सिद्धपुर, एक तरफ 90 अंश पर यवकोटि, तो दूसरी तरफ उतने हीअंश पर लोमकराष्ट्र।जैसे ग्लोब पर चारों ओर लंका आदि इसी तरह लिखकर अंधेरे में दीपक के सामने रखकर ग्लोब को धीरे धीरे घुमाते हुए देखो घूमते ग्लोब के सामने प्रकाश में जैसे जैसे लंका आना शुरू होगा तो सिद्ध पुर प्रकाश से अंधकार कीओर जा रहा होगा यवकोटि दीपक के ठीक सामने और दूसरी ओर लोमकराष्ट्र पूरी तरह अंथकार के मध्य।जैसे दीपक के सामने घूमता ग्लोब ठीक इसी प्रकार प्रकाश पुञ्ज सूर्य के सामने घूमती पृथ्वी।
RELATIVITY :: If one crosses the limits of the planetary system and stayed there for 20 minutes, 116,640,000 years would have passed by on earth. He would neither found his friends, relatives nor sons, grandsons. He could not find a record of their family tree as well.[Bhagwat 9.3.30-32]
The king who initially built the temple at Jagan Nath Puri, accompanied Narad Ji to Brahm Lok to request Brahma Ji to inaugurate it. There they both stood in front of Brahma Ji who asked them to wait for a moment. When the three returned back the temple had been renovated by the other rulers. Millions of years on earth, had passed within a few minutes of Brahm Lok.
कलयति सर्वाणि भूतानि :: अर्थात काल संपूर्ण ब्रह्मांड को, सृष्टि को खा जाता है। इस काल का सूक्ष्मतम अंश परमाणु है और महानतम अंश ब्रह्मा। ब्रह्मा, इन्द्र देवताओं के नाम होने के साथ समय की इकाइयाँ भी हैं क्योंकि इनका कार्यकाल पूर्व निर्धारित है।
कलियुग में युधिष्ठर, विक्रमादित्य-विक्रमी, शालिवाहन, विजयाभिनन्दन, नागार्जुन और कल्की से नववर्ष की शुरुआत हुई। ब्रह्मा जी और सप्तऋषियों से काल का आरम्भ और गणना की जाती है। इसी प्रणाली में इन कैलेंडरों को जोड़ दिया गया है। वर्तमान में विक्रमी और शक संवत प्रयुक्त हो रहे हैं। विक्रमी संवत को अधिक विश्वनीय माना जाता है। यह पंचांग-कलैंडर पूर्णतया वैज्ञानिक और शास्त्र संवत है। कालगणना में क्रमश: प्रहर, दिन-रात, पक्ष, अयन, संवत्सर, दिव्यवर्ष, मन्वन्तर, युग, कल्प और ब्रह्मा, विष्णु और महेश के काल की गणना की जाती है।
चक्रीय अवधारणा के अतर्गत ही काल को कल्प, मन्वंतर, युग (सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग) आदि में विभाजित किया जिनका अविर्भाव बार-बार होता है, जो जाकर पुन: लौटते हैं। चक्रीय का अर्थ सिर्फ इतना ही है कि सूर्य उदय और अस्त होता है और फिर से वह उदय होता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि समय भी चक्रीय है। सिर्फ घटनाक्रम चक्रीय है। इसकी पुनरावृत्ति होती रहती है, लेकिन पुनरावृत्ति में भी वह पहले जैसी नहीं होती है।
चक्रीय काल-अवधारणा के अंतर्गत आज ब्रह्मा की आयु के दूसरे खंड में, श्वेतावाराह कल्प में, वैवस्वत मन्वंर में अट्ठाईसवां कलियुग चल रहा है। इस कलियुग की समाप्ति के पश्चात चक्रीय नियम में पुन: सतयुग आएगा। कालगणना के अनुसार धरती पर जीवन की शुरुआत वर्तमान कल्प में लगभग 200 करोड़ वर्ष पूर्व हुई थी।
ऋषियों ने इसके लिए सौरमास, चंद्रमास और नक्षत्रमास की गणना की और सभी को मिलाकर धरती का समय निर्धारण करते हुए संपूर्ण ब्रह्मांड का समय भी निर्धारण कर उसकी आयु का मान निकाला।
युगमान :: 4,32,000 वर्ष में सातों ग्रह अपने भोग और शर को छोड़कर एक जगह आते हैं। इस युति के काल को कलियुग कहा गया। दो युति को द्वापर, तीन युति को त्रेता तथा चार युति को सतयुग कहा गया। चतुर्युगी में सातों ग्रह भोग एवं शर सहित एक ही दिशा में आते हैं।
वर्तमान सृष्टि पंच मंडल क्रम वाली है। चन्द्र मंडल, पृथ्वी मंडल, सूर्य मंडल, परमेष्ठी मंडल और स्वायम्भू मंडल। ये उत्तरोत्तर मंडल का चक्कर लगा रहे हैं।
परमाणु समय की सबसे सूक्ष्मतम इकाई है। यहीं से समय की शुरुआत मानी जा सकती है। यह इकाई अति लघु श्रेणी की है। इससे छोटी कोई इकाई नहीं। आधुनिक घड़ी सेकंड का सौवां या 1000 वाँ हिस्सा भी बताने की क्षमता रखता है। सीजियम घड़ी सैकेंड के एक लाखवें हिस्से का सही ज्ञान करती है।
Caesium watch can measure up to hundred thousandth part of a second accurately.
जब भी पंडित जी कोई संकल्प कराते हैं तो निम्नलिखित संस्कृत वाक्य प्रारम्भ से ही बोला जा रहा है। इसमें यदि कुछ परिवर्तन होता है तो वह बस देश, प्रदेश, संवत्सरे, मासे और तिथि का ही परिवर्तन होता रहता है। यह संस्कृत वाक्य यह दर्शाता है कि इस वक्त कितना समय बीत चुका है।
ॐ अस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्राहृणां द्वितीये परार्धे श्वेत वाराह कल्पे वैवस्वतमन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे कलिसंवते या युगाब्दे जम्बु द्वीपे, ब्रह्मावर्त देशे, भारत खंडे, मालवदेशे, अमुकसंवत्सरे, अयने, ऋतौ, मासे, पक्षे, तिथे, समये यथा जातके।
VIKRAMI SAMWAT (विक्रमी सम्वत्) :: No parallel can be drawn, when one comes to analyse the prevailing calendars all over the world. The HINDU CALENDAR is the ULTIMATE. It can be proved that all other calendars are either copies of it or are inspired by it. it is the only scientific calendar.
PRESENT DATE WITH REFERENCE TO, THIS DAY OF BRAHMA JI :: Time in itself is a manifestation of God. Creation-Evolution begins when Brahma Ji’s day-KALP begins. God is beyond the limits-periphery of time. Time like all other measuring tools is relative. There is nothing like absolute. The past, the present and the future may coexist in him-the Almighty, simultaneously.
Present Kali Yug began at midnight on a change of 17 at 18 February in the year 3102 BC in the proleptic Julian calendar. Since the beginning of the Kalp-Brahma’s Day, until the year 2014 AD passed: [{6 complete Manvantar (6 x 710)} + {7 Manvantar twilight before a Manvantar each (7 x 4)} + {27 complete Maha Yug of the current 7th Manvantar (27 x 10)} + {(3 Elapsed Yug the current 28th Maha Yug :: (4 + 3 + 2) x 4,32,000 years + 5,116 solar years} in the current Kal Yug.
The epoch (beginning of the first day of the zeroth year) of the current HINDU ERA-KAL YUG (कलयुग) calendar (both solar and luni-solar) is February 18, 3102 BC in the proleptic Julian calendar or January 23, 3102 BC in the proleptic Gregorian calendar. Both the solar and luni-solar calendars started on this date. After that, each year is labelled by the number of years elapsed since the epoch.
Unique feature of the Hindu calendar is to count the years elapsed from the beginning of the Kalp-Brahma’s. Other systems use the current ordinal number of the year as the year label. But just as a person’s true age is measured by the number of years that have elapsed starting from the date of the person’s birth, the Hindu calendar measures the number of years elapsed. As of May 18, 2014, 5,115 years had elapsed in the Hindu calendar, so this is the 5,115th Hindu calendar year since the onset of Kali Yug. Note that the luni (Lunar)-solar calendar year will usually start earlier than the solar calendar year.
CYCLIC TIME THE KAL CHAKR (कालचक्र) :: The process of creation is cyclical and never ending; it begins to end and ends to begin. The Cycle of Time is called Kal Chakr-wheel (पहिया), in order to create divisions and movements of life and sustain the worlds in periodic time frames. God also uses time to create the illusions of life and death. It is time, which is accountable for old age, death and dying of his creations. When we overcome time, we become immortal. Death is not the end of the line, but a gateway to the next cycle, to birth. This is also true of the universe itself and akin to the cyclic patterns in the rhythms of nature. The mighty son of Bhagwan Sury Dharm Raj-Yam Raj is called Kal, while Bhagwan Shiv himself is called Maha Kal.
There are two commonly used calendars, in India. The first is the Shak which starts from 78 AD when the Shali Vahan Southern ruler defeated the Shak king of Malwa and the second one is called the Vikrami calendar (विक्रमी सम्वत्) which begun in 57 BC. These calendars have merely being aligned with the Brahmi calendar-beginning of the Kalp-Brahma’s day. It was the transition between the Nakshatr Aswani (अश्वनी, आश्विन) to Revti (रेवती) in 57 BC which corresponds to the transition between signs; Aries to Pisces. Chaetr in the Lunar month corresponds to the central full moon, occurring at or near the Chitra Nakshatr. Similarly, when Poornima (full Moon)occurs in or near Vaeshakh Nakshatr, the lunar month is titled Vaeshakh (Mas-Mah).Similarly, for the Nakshatr, Jyeshtha-Jeth, Purva Shadha-Asadh, Shravan-Sawan-Shrawan, Bhadrpad-Bhadon, Ashwin (Asouj), Kritika-Kartik, Mragshira, Pushya-Poush (पौष), Magh and (Poorva/Uttra), Phalguni -Phalgun (फाल्गुन).
ZODIAC SIGN & GOVERNING PLANET :: (1). ARIES MESH मेष MARS, (2). TAURUS-VRASHABH-वृषभ VENUS, (3). GEMINI-MITHUN-मिथुन-MERCURY, (4). CANCER-KARK-कर्क-MOON, (5). LEO-SINGH-सिंह-SUN, (6). VIRGO-KANYA-कन्या-MERCURY, (7). LIBRA-TULA-तुला-VENUS, (8). SCORPIO-VRASHACHIK-वृश्चिक-MARS, (9). SAGITTARIUS-DHANU-धनु-JUPITER, (10). CAPRICORN-MAKAR-मकर-SATURN, (11). AQUARIUS-KUMBH-कुम्भ-SATURN, (12). PISCES-MEEN-मीन-JUPITER.
NAKSHATR (नक्षत्र, constellations) :: The Zodiac according to Indian Astrology comprises of 360 degrees. There are 27 Nakshatr or Constellations in it. The angular measurement of each constellation is 13 degrees and 20 minutes. Each Nakshtr is further subdivide divided into 4 pad or charan (section, segments,sectors). This is an applicable to astrological analysis for accurate predictions.Their names are :: (1). Ashwani, (2). Bharni, (3). Kritika, (4). Rohini, (5). Mragshira, (6). Adra, (7). Purnvasu, (8). Pushya, (9). Ashlesha, (10). Magh Poorva, (11). Uttra Phalguni, (12). Hast, (13). Chitra, (14). Swati, (15). Phalguni, (16). Vishakha, (17). Anuradha, (18). Jyeshtha, (19). Mool, (20). Poorva Shadha, (21). Uttra Shadha, (22). Sharavan, (23). Dhanishta, (24). Satbhijit, (25). Poorva Bhadrpad, (26). Uttra Bhadrapad & (27). Rewati.
The lunar months are split into two Paksh (पक्ष fortnights) as the period of 15 days.
The waxing Paksh is called Sukl Paksh (शुक्ल पक्ष), bright half and the waning Paksh the Krashn, Paksh (कृष्ण पक्ष) the dark half.
The beginning of the month may be considered to be either from Amavashya (अमावश्या) or (पूर्णिमा) Purnima.
Amavashyant (अमावश्यान्त) :: The month begins with new moon and ends at new moon.
Purnimant (पूर्णिमांत) :: The month begins with full moon and ends at full moon. This is the system followed in northern India. This is termed as Shuklant (शुक्लान्त मास) Mas as well. Varah Mihir (वराह मिहिर) the renounced Mathematician followed and recommended this system.
NAMES OF MONTHS :: (1). Chaetr (चैत्र) Mid of March to Mid of April, (2). Vaeshakh (वैशाख) Mid of April to Mid of May, (3). Jeth (जेठ) Mid of May to Mid of June, (4). Asadh (असाढ़) Mid of June to Mid of July, (5). Sawan (सावन) Mid of July to Mid of August, (6). Bhadon (Bhadhray भादोँ) Mid of August to Mid of September, (7). Asooj Ashwin (क्वार)Mid of September to Mid of October, (8). Kartik (कार्तिक) Mid of October to Mid of November, (9). Maghar (Aghan, अगहन) Mid of November to Mid of December, (10). Poos पूस Mid of December Mid of January, (11). Magh (महा, माघ) Mid of January Mid of February, (12). Phalgun (फाल्गुन ) Mid of February to Mid of March.
PRAHR :: A day constitutes of 8 Prahr (प्रहर) and every Prahr consists of 3 hours. The day starts from 4 o’clock unlike 12 PM-mid night of other calendars.
KALI YUG (कल युग PRESENT EPOCH-ERA) :: As of May 18, 2014, 5,115 years of Kali Yug had elapsed. At present two calendars are followed simultaneously :: (1). VIKRAMI SAMWAT begun in 3012 BC. (विक्रमी सम्वत् ERA, FINANCIAL YEAR) & (2). SHAK SAM VAT-ERA (शक सम्वत् INDIAN NATIONAL CALENDAR) begun in 78 AD.
DAYS OF THE WEEK :: Sunday :- (Ravi Var रविवार, day of Sun), Monday :- (Som Var सोमवार, day of Moon), Tuesday :- (Mangal Var मंगल वार, day of Mars), Wednesday :- (Buddh Var बुद्धवार, day of Mercury), Thursday :- (Vrahspati-Guru Var, वृहस्पति-गुरु वार, day of Jupiter), Friday :- (Shukr Var शुक्र वार, day of Venus), Saturday :- (Shani Var शनि वार, day of Saturn).
NAMES OF THE LUNAR DAYS TITHIYAN (तिथियाँ) :: प्रथमा Prathma First, Dwitiya द्वितीया, Second, Tratiya तृतीया Third, Chturthi चतुर्थी Fourth, Panchmi पंचमी Fifth, Shashthi षष्ठी Sixth, Saptami सप्तमी Seventh, Ashtmi अष्टमी Eighth, Navami Naomi नवमी Ninth, Dashmi दशमी Tenth, Ekadashi एकादशी Eleventh, Dvadashi द्वादशी Twelfth, Tryodashi त्रयोदशी Thirteenth, Chaturdashi चतुर्दशी Fourteenth, Panchdashi पञ्चदशी Fifteenth, Purnima (Sukl Paksh पूर्णिमा, Full Moon); Amavashya Krashn Paksh (अमावश्या-कृष्ण पक्ष New Moon). The Lunar month begins with the new moon called Amavashya.
पंचांग :: पंचांग भारत में प्रचलित कैलेंडर-काल गणना है। आदि काल से यह विभिन्न नामों से यथावत चला आ रहा है। यद्यपि नाम अलग हैं, तथापि तिथियाँ वही हैं। भिन्न-भिन्न रूपों में यह पूरे भारत में प्रचलित है। विक्रमी और शक संवत इसके उदाहरण हैं। पंचांग (पंच + अंग यानि पांच अंग) पाँच प्रमुख घटकों से बना है, जो कि तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण हैं। इसकी गणना के आधार पर पंचांग की तीन धाराएँ हैं :- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धतियाँ हैं।
एक साल में 12 महीने होते हैं। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं। 12 मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह होता है। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति के आधार पर रखा गया है। सौर वर्ष में 12 राशियाँ, बारह सौर मास हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है, उसी दिन की संक्रांति होती है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से 11 दिन 3 घड़ी 48 पल छोटा है। इसीलिए हर 3 वर्ष में इसमे एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास*, मलमास* या अधिमास* कहते हैं। इसके अनुसार एक साल को बारह महीनों में बांटा गया है और प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं। महीने को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर दो पक्षों यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है। एक पक्ष में लगभग पंद्रह दिन या दो सप्ताह होते हैं। एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। एक दिन को तिथि कहा गया है, जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक होती है। दिन को चौबीस घंटों के साथ-साथ आठ पहरों में भी बांटा गया है। एक प्रहर कोई तीन घंटे का होता है। एक घंटे में लगभग दो घड़ी होती हैं, एक पल लगभग आधा मिनट के बराबर होता है और एक पल में चौबीस क्षण होते हैं। पहर के अनुसार देखा जाए तो चार पहर का दिन और चार पहर की रात होती है अर्थात दिन और रात मिलाकर 8 प्रहर।
शक संवत :: विक्रम संवत 6,676 ई.पू. से भी पहले प्रचलित था। महाभारत में काल गणना इसी आधार पर की जाती थी। इसके बाद कृष्ण कैलेंडर और फिर कलियुग संवत का प्रचलन हुआ। इसके बाद 78 ई.पू. शक संवत और 57 ई. पू. विक्रम संवत का आरंभ हुआ था। शक संवत का आरंभ कुषाण राजा कनिष्क ने अपने राज्य आरोहण को उत्सव के रूप में मनाने और उस तिथि को यादगार बनाने के लिए किया। इस संवत के पहली तिथि चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा है और इसी तिथि पर कनिष्क ने राज्य सत्ता सम्हाली थी। यह संवत पूर्णतया वैज्ञानिक और त्रुटिहीन है। यह संवत प्रत्येक वर्ष में मार्च की 22 तारीख को शुरू होता है और इस दिन सूर्य विषुवत रेखा के ऊपर होता है और इसी कारण दिन और रात बराबर के समय के होते हैं। शक संवत के दिन 365 होते हैं और लीप ईयर होने पर शक संवत 23 मार्च को शुरू होता है और उसमें 366 दिन होते हैं।
विक्रम संवत :: विक्रम संवत की शुरुआत महाराज वीर विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में की थी। विक्रमादित्य ने अपनी सम्पूर्ण प्रजा का ऋण खुद चुकाकर, इस संवत की शुरुआत करी थी। विक्रम संवत में समय की पूरी गणना सूर्य और चाँद के आधार पर की गयी है अर्थात दिन, सप्ताह, मास और वर्ष की गणना पूरी तरह से वैज्ञानिक है। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी, इसलिए हिन्दु इस तिथि को नववर्ष का आरंभ मानते हैं। इस तिथि से नवरात्रे भी शुरू होते हैं।
शक संवत और विक्रम संवत में अन्तर :: इनके महीनों के नाम एक ही हैं और दोनों संवतों में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी हैं परन्तु विक्रम संवत में नया महीना पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष से होता है, जबकि शक संवत में नया महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होता है। इसी कारण इन संवतों के शुरू होने वाली तारीखों में भी अंतर आ जाता है। शक संवत में चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, उस महीने की पहली तारीख है, जबकि विक्रम संवत में यह सोलहवीं तारीख है।
चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का प्रथम माह है। सामान्यत: 1 चैत्र 22 मार्च को होता है और लीप वर्ष में 21 मार्च को।
चैत्र 30 (दिन) 22 मार्च, वैशाख 31 (दिन) 21 अप्रैल, ज्येष्ठ 31 (दिन) 22 मई, आषाढ़ 31 (दिन) 22 जून, श्रावण31 (दिन) 23 जुलाई, भ्राद्रपद 31 (दिन) 23 अगस्त, अश्विन 30 (दिन) 23 सितम्बर, कार्तिक30 (दिन) 23 अक्टूबर, अग्रहायण (मार्गशीर्ष) 30 (दिन) 22 नवम्बर, पूस 30 (दिन) 22 दिसम्बर, माघ 30 (दिन) 21 जनवरी और फाल्गुन 30 (दिन) 20 फरवरी।
अधिवर्ष में, चैत्र में 31 दिन होते हैं और इसकी शुरुआत 21 मार्च को होती है। वर्ष की पहली छमाही के सभी महीने 31 दिन के होते है, जिसका कारण इस समय कांतिवृत्त में सूरज की धीमी गति है।
भारतीय राष्ट्रीय पंचांग या ‘भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर’ का आधिकारिक उपयोग 1 चैत्र, 1879 शक् संवत या 22 मार्च 1957 में शुरू किया था।
NAMES OF MONTHS महीनों के नाम :: चंद्रमा की कला की घट-बढ़ वाले दो पक्षों (कृष्ण और शुक्ल) का जो एक मास होता है, वही चंद्रमास कहलाता है। यह दो प्रकार का शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अमावस्या को पूर्ण होने वाला अमांत मास मुख्य चंद्रमास है। कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमात पूरा होने वाला गौण चंद्रमास है। यह तिथि की घट-बढ़ के अनुसार 29, 30 व 28 एवं 27 दिनों का भी होता है।
पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। यह सौर-वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा है; इसीलिए चंद्र-वर्ष में हर 3 वर्ष में, एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे मलमास* या अधिमास* कहते हैं।
इन बारह मासों के नाम आकाशमण्डल के नक्षत्रों में से 12 नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं। जिस मास जो नक्षत्र आकाश में प्रायः रात्रि के आरम्भ से अन्त तक दिखाई देता है या कह सकते हैं कि जिस मास की पूर्णमासी को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के नाम पर उस मास का नाम रखा गया है।
(1). चित्रा नक्षत्र के नाम पर चैत्र मास (मार्च-अप्रैल), Mid of March to Mid of April, (2). विशाखा नक्षत्र के नाम पर वैशाख मास (अप्रैल-मई), Mid of April to Mid of May, (3). ज्येष्ठा नक्षत्र के नाम पर जेठ-ज्येष्ठ मास (मई-जून), Mid of May to Mid of June, (4). आषाढ़ा नक्षत्र के नाम पर आषाढ़ मास (जून-जुलाई), Mid of June to Mid of July, (5). श्रवण नक्षत्र के नाम पर सावन-श्रावण मास (जुलाई-अगस्त), Mid of July to Mid of August, (6). भाद्रपद (भाद्रा) नक्षत्र के नाम पर भाद्रपद-भादोँ मास (अगस्त-सितम्बर), Mid of August to Mid of September, (7). अश्विनी के नाम पर क्वार-आश्विन-असूज मास (सितम्बर-अक्टूबर), Mid of September to Mid of October, (8). कृत्तिका के नाम पर कार्तिक मास (अक्टूबर-नवम्बर), (9). मृगशीर्ष के नाम पर मार्गशीर्ष-अगहन (नवम्बर-दिसम्बर), Mid of November to Mid of December, (10). पुष्य के नाम पर पौष-पूस (दिसम्बर-जनवरी), Mid of December Mid of January, (11). मघा के नाम पर माघ-महा (जनवरी-फरवरी), Mid of January Mid of February तथा (12). फाल्गुनी नक्षत्र के नाम पर फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च), Mid of February to Mid of March का नामकरण हुआ है।
NAMES OF THE LUNAR DATES (तिथियाँ) :: एक दिन को तिथि कहा गया है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं, जो दो पक्षों में बँटी हैं। शुक्ल पक्ष में एक से चौदह और फिर पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा सहित कुल मिलाकर पंद्रह तिथियाँ हैं। इसी प्रकार कृष्ण पक्ष में एक से चौदह और फिर अमावस्या आती है। अमावस्या सहित तिथियाँ हैं।
(1). पूर्णिमा (पूर्णमासी), प्रतिपदा (पड़वा), प्रथमा, (2). द्वितीया, (दूज), (3). तृतीया (तीज), (4). चतुर्थी (चौथ), (5). पंचमी,(6). षष्ठी (छठ), (7). सप्तमी (सातम), (8). अष्टमी (आठम), (9). नवमी (नौमी), (10). दशमी, (दसम), (11). एकादशी (ग्यारस), (12). द्वादशी (बारस), (13). त्रयोदशी (तेरस), (14). चतुर्दशी (चौदस), (15). पञ्चदशी; शुक्लपक्ष में पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष में अमावस्या (अमावस) कहलाती है।
पक्ष :: प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं। तीस दिनों को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर दो पक्षों यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है। एक पक्ष में लगभग पंद्रह दिन या दो सप्ताह होते हैं। एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं।
PRAHR प्रहर :: एक दिन में तीन-तीन घंटों के आठ प्रहर होते हैं। दिन की शुरुआत प्रातः 4 बजे से होती है, जबकि अँग्रेजी चलन में दिन की शुरुआत रात के 12 बजे से होती है।
A day constitutes of 8 Prahr and every Prahr consists of 3 hours. The day starts from 4 o’clock unlike 12 PM-mid night of other calendars.
KALI YUG (कलि युग PRESENT EPOCH-ERA) :: As of May 18, 2014, 5,115 years of Kali Yug had elapsed. At present two calendars are followed simultaneously :: (1). VIKRAMI SAMWAT begun in 3012 BC. (विक्रमी सम्वत् ERA, FINANCIAL YEAR) & (2). SHAK SAM VAT-ERA (शक सम्वत् INDIAN NATIONAL CALENDAR) begun in 78 AD.कलियुग की शुरुआत भगवान् श्री कृष्ण ने गुरु संदीपन के आश्रम में भगवान् श्री परशराम जी के द्वारा धनुष-वान और शंख सौंपे जाने पर शंख ध्वनि करके की।
DAYS OF THE WEEK वार :: एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। Sunday (रविवार, इतवार), Monday (सोमवार), Tuesday (मंगल वार), Wednesday (बुद्धवार), Thursday (वृहस्पति-गुरु वार), Friday (शुक्र वार), Saturday (शनि वार)।
योग :: योग 27 प्रकार के होते हैं। सूर्य-चंद्र की विशेष दूरियों की स्थितियों को योग कहते हैं। दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं:- विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति।
27 योगों में से कुल 9 योगों को अशुभ माना जाता है तथा सभी प्रकार के शुभ कामों में इनसे बचने की सलाह दी गई है। ये अशुभ योग हैं :- विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति।
करण :: एक तिथि में दो करण होते हैं :- एक पूर्वार्ध में तथा एक उत्तरार्ध में। कुल 11 करण होते हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (14) के उत्तरार्ध में शकुनि, अमावस्या के पूर्वार्ध में चतुष्पाद, अमावस्या के उत्तरार्ध में नाग और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में किस्तुघ्न करण होता है। विष्टि करण को भद्रा कहते हैं। भद्रा में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।
सौरमास :: इसका आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौर मास कहलाता है। यह मास प्राय: तीस, इकतीस दिन का होता है। कभी-कभी अट्ठाईस और उन्तीस दिन का भी होता है। मूलत: सौरमास (सौर-वर्ष) 365 दिन का होता है।
12 राशियों मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन को बारह सौर मास माना जाता है। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है, उसी दिन की संक्रांति होती है। इस राशि प्रवेश से ही सौरमास का नया महीना शुरू माना गया है।
सौर-वर्ष के दो भाग-अयन हैं :- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का। जब सूर्य उत्तरायण होता है, तब यह काल तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है। अश्विन, कार्तिक मास में तीर्थ का महत्व है। उत्तरायण के समय पौष-माघ मास चलता है।
सूर्य धनु संक्रमण से मकर संक्रमण तक मकर राशी में रहता हे, जिससे इसे धनुर्मास कहते है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है और सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है। जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है, तब सूर्य दक्षिणायन होता है। दक्षिणायन व्रतों का और उपवास का समय होता है, जबकि चंद्र मास के अनुसार अषाढ़ या श्रावण मास चल रहा होता है। व्रत से रोग और शोक मिटते हैं। दक्षिणायन में विवाह और उपनयन आदि संस्कार वर्जित है, जबकि अग्रहायण मास में ये सब किया जा सकता है, अगर सूर्य वृश्चिक राशि में हो। उत्तरायण सौर मासों में मीन मास में विवाह वर्जित है।
नक्षत्र मास :: आकाश में तारामंडल के विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले आकार को नक्षत्र कहते हैं। ज्योतिषियों द्वारा एक अन्य अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है। चंद्रमा सत्ताईस नक्षत्रों में भ्रमण करता है। साधारणतः यह चंद्रमा के पथ से जुडे हैं। ऋग्वेद में एक स्थान पर सूर्य को भी नक्षत्र कहा गया है। अन्य नक्षत्रों में सप्तर्षि और अगस्त्य हैं। नक्षत्र से ज्योतिषीय गणना करना वेदांग ज्योतिष का अंग है। नक्षत्र आकाश मंडल के मील के पत्थरों की तरह हैं, जिससे आकाश की व्यापकता का पता चलता है। वैसे नक्षत्र तो 88 हैं, किंतु चंद्र पथ पर 27 ही माने गए हैं।मूलत: ज्योतिष में इन्हीं को नक्षत्र कहा गया है।
चंद्रमा अश्विनी से लेकर रेवती तक के नक्षत्र में विचरण करता है, वह काल नक्षत्रमास कहलाता है। यह लगभग 27 दिनों का होता है। इसीलिए 27 दिनों का एक नक्षत्र मास कहलाता है।
नक्षत्रों के गृह स्वामी ::
केतु :- अश्विन, मघा, मूल।
शुक्र :- भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़।
रवि :- कार्तिक, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़।
चंद्र :- रोहिणी, हस्त, श्रवण।
मंगल :- मॄगशिरा, चित्रा, श्रविष्ठा।
राहु :- आद्रा, स्वाति, शतभिषा।
वृहस्पति :- पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वभाद्रपदा।
शनि :- पुष्य, अनुराधा, उत्तरभाद्रपदा।
बुध :- अश्लेशा, ज्येष्ठा, रेवती।

कल्प :: भगवान् ब्रह्मा जी के एक दिन।
(1). नील वराह कल्प :: पाद्मकल्प के अंत के बाद महाप्रलय हुई। सूर्य के भीषण ताप के चलते धरती के सभी वन-जंगल आदि सूख गए। समुद्र का जल भी जल गया। ज्वालामुखी फूट पड़े। सघन ताप के कारण सूखा हुआ जल वाष्प बनकर आकाश में मेघों के रूप में स्थिर होता गया।
अंत में न रुकने वाली जलप्रलय का सिलसिला शुरू हुआ। चक्रवात उठने लगे और देखते ही देखते समस्त धरती जल में डूब गई। यह देख भगवान् ब्रह्मा जी को चिंता होने लगी, तब उन्होंने जल में निवास करने वाले भगवान् श्री हरी विष्णु का स्मरण किया और फिर भगवान् विष्णु ने नील वराह रूप में प्रकट होकर इस धरती के कुछ हिस्से को जल से मुक्त किया। नील वराह देव ने अपनी पत्नी नयनादेवी के साथ अपनी संपूर्ण वराही सेना को प्रकट किया और धरती को जल से बचाने के लिए तीक्ष्ण दरातों, पाद प्रहारों, फावड़ों और कुदालियों और गैतियों द्वारा धरती को समतल किया।इसके लिए उन्होंने पर्वतों का छेदन तथा गर्तों के पूरण हेतु मृत्तिका के टीलों को जल में डालकर भूमि को बड़े श्रम के साथ समतल करने का प्रयास किया। यह एक प्रकार का यज्ञ ही था, इसलिए भगवान् नील वराह को भगवान् यज्ञ वराह भी कहा गया। नील वराह के इस कार्य को आकाश के सभी देवदूत देख रहे थे। प्रलयकाल का जल उतर जाने के बाद भगवान् के प्रयत्नों से अनेक सुगंधित वन और पुष्कर-पुष्करिणी सरोवर निर्मित हुए, वृक्ष, लताएं उग आईं और धरती पर फिर से हरियाली छा गई। संभवत: इसी काल में मधु और कैटभ का वध किया गया था।
(2). आदि वराह कल्प :- नील वराह कल्प के बाद आदि वराह कल्प शुरू हुआ। इस कल्प में भगवान् विष्णु ने आदि वराह नाम से अवतार लिया। यह वह काल था जबकि दिति और कश्यप के दो भयानक असुर पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का आतंक था। दोनों को ही ब्रह्माजी से वरदान मिला हुआ था।
हिरण्याक्ष का वध :- ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान् वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान् ने जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया।
आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ।
हिरण्यकश्यप का वध :- इस काल में भगवान् वराह ने नृसिंह का अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया था। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान् विष्णु का परम भक्त था, जो हिरण्यकश्यप को पसंद नहीं था तो उसने प्रहलाद को मारने के लिए कई उपाय किए। लेकिन भगवान् विष्णु ने अपने भक्त को बचाने के लिए अंत में नृसिंह का अवतार लिया।
हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी से अमरता का वर मिला था। उसने ब्रह्मा जी से वर मांगा था कि मुझे कोई मनुष्य, दानव, असुर, किन्नर, पशु, पक्षी और जलचर जंतु नहीं मार सके और न में दिन में मरूं, न रात में, न पाताल में, न धरती पर और न आकाश में। भगवान् ब्रह्मा ने कहा :- तथास्थु।
(3). श्वेत वराह कल्प :- वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। वैवस्वत मनु के 10 पुत्र और इला नाम की कन्या थी। वैवस्वत मनु को ही पृथ्वी का प्रथम राजा कहा जाता है। इला का विवाह बुध के साथ हुआ जिससे उसे पुरूरवा नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। यही पुरूरवा प्रख्यात ऐल या चंद्र वंश का संस्थापक था।
वैवस्वत मनु के काल के प्रमुख ऋषि :- वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि।
वैवस्वत मनु की शासन व्यवस्था में देवों में 5 तरह के विभाजन थे :- देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व।
प्रमुख प्रजातियाँ :: देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, भल्ल, वसु, अप्सराएं, रुद्र, मरुदगण, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है।
पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति :: प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीनकाल में 7 द्वीपों में बांटा गया था : जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है।
जम्बू द्वीप के 9 खंड थे :- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय।
देवताओं के गुरु बृहस्पति और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य थे।
तब ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि ये ऋषियों की 7 श्रेणियां होती थीं।
यह वैवस्वत मनु का काल था जबकि वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि ऋषिगण हुआ करते थे।
वराह काल में नील वराह अवतार से लेकर आदि वराह, श्वेत वराह, नृसिंह अवतार, वामन अवतार और कच्छप अवतार हुए । इस काल में सनकादि, इंद्रादि, नर-नारायण हुए, वासुकि-तक्षक, हाहा-हूहू, मेनका-रम्भा, मरुदगण, हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप हुए, दिति-अदिति पुत्र, रथकृत-ओज, हेति-प्रहेति हुए, मधु-कैटभ हुए, भस्मासुर, त्रिपुरासुर हुए, ब्रह्मा के 10 पुत्रों का कुल चला, राजा बाली हुए।
बाली के बाद कच्छप अवतार हुआ और अंत में स्वायंभुव मनु हुए। स्वायंभुव मनु के बाद स्वरोचिष, औत्तमी, तामस मनु, रैवत और चाक्षुष मनु हुए और अंत में जल प्रलय के बाद नए युग की शुरुआत हुई। जल प्रलय के दौरान सातवें मनु वैवस्वत मनु हुए।
इन्द्र-बलि (समुद्र मंथन) :- वामन अवतार के बाद कच्छप अवतार हुआ जिसे कूर्म अवतार भी कहा गया। कूर्म अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्र मंथन के समय मंदार पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदार पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एवं असुरों ने समुद्र मंथन करके 14 रत्नों की प्राप्ति की। इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था। इसके बाद जल प्रलय की घटना घटी।
वैवस्वत मनु सातवें मनु हुए और उनके समय में ही भगवान् श्री हरी विष्णु का मत्स्यावतार हुआ।
ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, शिव आदि पदों पर अलग-अलग कल्पों में अलग देवता विराजमान होते हैं।
मत्स्य पुराण में 30 कल्पों की चर्चा है :- श्वेत, नीललोहित, वामदेव, रथनतारा, रौरव, देवा, वृत, कंद्रप, साध्य, ईशान, तमाह, सारस्वत, उडान, गरूढ़, कुर्म, नरसिंह, समान, आग्नेय, सोम, मानव, तत्पुमन, वैकुंठ, लक्ष्मी, अघोर, वराह, वैराज, गौरी, महेश्वर, पितृ।
महत कल्प :- इस काल के बाद प्रलय हुई थी तो सभी कुछ नष्ट हो गया। इस कल्प में विचित्र-विचित्र और महत् (अंधकार से उत्पन्न) वाले प्राणी और मनुष्य होते थे। जो अंधकार में भी देखने में सक्षम थे।
हिरण्य गर्भ कल्प :- इस काल में धरती का रंग पीला था इसीलिए इसे हिरण्य कहते हैं। हिरण्य के 2 अर्थ होते हैं- एक जल और दूसरा स्वर्ण। हालांकि धतूरे को भी हिरण्य कहा जाता है। माना जाता है कि तब स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे। इस काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ, हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, देवता, हिरप्यानी रैडी (अरंडी), वृक्ष वनस्पति एवं हिरण ही सर्वोपयोगी पशु थे। सभी एकरंगी पशु और पक्षी थे।
ब्रह्मकल्प :- इस कल्प में मनुष्य जाति सिर्फ ब्रह्म (ईश्वर) की ही उपासक थी। क्रम विकास के तहत प्राणियों में विचित्रताओं और सुंदरताओं का जन्म हो चुका था। जम्बूद्वीप में इस काल में ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, रामपुर, रामगंगा केंद्र आदि नाम से स्थल हुआ करते थे। यहां की प्रजाएं परब्रह्म और ब्रह्मवाद की ही उपासना करती थी। इस काल का ऐतिहासिक विवरण हमें ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।
पद्मकल्प :- पुराणों के अनुसार इस कल्प में 16 समुद्र थे। यह कल्प नागवंशियों का था। धरती पर जल की अधिकता थी और नाग प्रजातियों की संख्या भी अधिक थी। कोल, कमठ, बानर (बंजारे) व किरात जातियां थीं और कमल पत्र पुष्पों का बहुविध प्रयोग होता था। सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की नारियां पद्मिनी प्रजाएं थीं। तब के श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति आज के श्रीलंका जैसी नहीं थी। इस कल्प का विवरण हमें पद्म पुराण में विस्तार से मिल सकता है।
वराहकल्प :- वर्तमान में वराह कल्प चल रहा है। इस कल्प में भगवान् विष्णु ने वराह रूप में 3 अवतार लिए :- पहला नील वराह, दूसरा आदि वराह और तीसरा श्वेत वराह। इसी कल्प में विष्णु के 24 अवतार हुए और इसी कल्प में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की थी। वर्तमान में हम इसी कल्प के इतिहास की बात कर रहे हैं। वराह पुराण में इसका विवरण मिलता है।
अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है।
Time Calculation- (समय ज्ञान) काल ज्ञान Kaal Gyanam | काल गणना | काल रहस्य

काल ज्ञान Kaal Gyanam | काल गणना | काल रहस्य
The Vedic Calculation of time (Kala)
वैदिक चक्र (Vedic Kaal Chakra)
युग-महायुग-मन्वंतर-कल्प-परार्ध (04 Yuga Satyuga, Treta yug, Dwapar yug, Kaliyuga, Manvantar, Kalpa, Parardha
चौदह मन्वंतर 14 Manvantar
14 मन्वन्तर के सप्तऋषि:-
Saptarishi for each manvantar
देवताओं का १ दिन (दिव्य दिन) = १ सौर वर्ष
| कला | राशी |
| ०-३० | मेष |
| ३०-६० | वृष |
| ६०-९० | मिथुन |
| ९०-१२० | कर्क |
| १२०-१५० | सिंह |
| १५०-१८० | कन्या |
| १८०-२१० | तुला |
| २१०-२४० | वृश्चिक |
| २४०-२७० | धनु |
| २७०-३०० | मकर |
| ३००-३३० | कुम्भ |
| ३३०-३६० | मीन |
पृथ्वी के कुल ३६० अंश के परिपथ को नक्षत्रों के लिए २७ भागों में बांटा गया है ( जैसे राशियों के लिए १२ भागों में बांटा गया है |) अतः प्रत्येक नक्षत्र ३६०/२७ = १३ मिनट २० सेकंड = ८०० अंश का होगा | इसके उपरान्त भी नक्षत्रों को चार चरणों में बांटा गया है | प्रत्येक चरण १३ मिनट २० सेकंड/ ४ = ३ मिनट २० सेकंड = २०० अंश का होगा | क्योंकि एक राशि ३० अंश की होती है अतः हम कह सकते हैं कि सवा दो नक्षत्र अर्थात ९ चरण अर्थात ३० अंश की एक राशि होती है |
Each time-cycle has three components, srishti, sthithi and laya.
Srishthi means creation.
Sthithi means continuation and laya means dissolution.
Each time cycle begins with creation, continues for certain duration of time and then dissolves into nothingness. After a brief respite, the cycle begins all over again. These three aspects of time are under the control of the Trinity, Brahma, Vishnu and Siva. Brahma is responsible for creation, Vishnu for existence and Siva for dissolution. We can see the same divisions in a day also. Each day is created in the early hours, continues throughout the day and then finally dissolves into darkness. We can see the same pattern in life also, as childhood, adulthood and old age.
The Hindu calculation of time comes to us from sage Ganita who is mentioned in the Manusmriti and the Mahabharata. He calculated the duration of each cycle of creation in human years. He divided the cosmic time into Kalpas, which is a day and night in the time and space of Brahma. It is considered to be equal to 8.64 billion years (Vishnu Purana). Each Kalpa consists of two Artha Kalpas of 4.32 billion years each. They are the day and night of Brahman. Each Kalpa is further divided into 1000 maha yugas. Each maha yuga is again divided into four yugas, namely krita yuga, treat yuga, dvapara yuga and kali yuga. Their duration varies. Krita yuga the first in the series has the longest duration of 1.728 million years and kali yuga, which is the last and the current, has a duration of only 432000 years. The durations of other divisions are mentioned in the table at the bottom of this article.
The lifespan of Brahma is considered 100 Brahma years, which is known as Maha Kalpa or Parardha. It is equal to 311.04 trillion human years.
A day in the life of gods is equal to one year upon earth. It is divided into day and night. The day is known as uttarayana and the night as dakshinayana. They are equal to 180 days each.
In Hindu tradition there is another division of time called manvantara. A manavantara is the period during which the earth is ruled by a particular Manu, the father of man. The word ‘man’ comes from the Sanskrit word Manu. According to tradition, a new Manu manifests at the beginning of each manvantara to produce a new race of human beings. Each manvantara lasts for about 71 mahayugas or approximately 308 million years. In each manvantara along with Manu appear seven seers or rishis and one Indra. In all 14 Manus appear in each Kalpa over a period of 1000 mahayugas in succession. The current Manu is 7th in the line and is known as Vaivasvata Manu.
The life of Brahma is 120 divine years called Mahakalpa. Everyday he creates 14 Manus one by one and they create and control the world. So there are fourteen Manus in one divine day called Kalpa of Brahma.
The life of each Manu is called Manvantara and it has 71 eras of four quarters. Each quarter is has four Yugas – Krita or Satya, Treta, Dvapara and Kali. The following are the complete calculations of Vedic units of time and periods.
India has given the idea of the smallest and the largest measure of time.
Krati = 34,000th of a second
The time taken to tear apart the softest petals of a lotus is called ‘TRUTI’
100 Trutis make 1 Lub
30 Lub make 1 Nimesh
27 Nimesh make 1 Guru Akshar
10 Guru Akshar Make 1 Pran
6 pran Vighatika make 1 Ghatika or Dand
60 Ghati make 1 day and night
That means, in a day and night, there are 17,49,60,000,00 Trutis
Thus, according to Western science, there are 86,400 seconds in a day and night, whereas in Indian science, a day and night consists of 17,49,60,000,00 Trutis.
According to another system, the division of time is
1 day or 24 hours = 60 Ghatis
1 Ghati = 60 Vighati (also called Pala or Kala)
1 Vighati = 60 Lipta or (also called Vipala or Vikala)
1 Lipta = 60 Vilipta
1 Vilipta = 60 Para
1 Para = 60 Tatpara
As a lot of charts made in the olden days mention the birth time in Ghatis and Vighatis the following is the conversion to remember:
5 Ghatis = 2 hours
5 Vighati = 2 minutes
Another system of time at micro level is
60 Tatparas = 1 Paras
60 Paras = 1 Vilipta
60 Vilipta = 1 Lipta
60 Lipta = 1 Ghatika (Dand)
60 Ghatika = 1 Day & Night)
Therefore, it is clear that there are 46,65,60,000,00 Tatparas in a day and night.
6.3. The Vedic Units of Time – Macro level
SATYUG 4,32,000 YEARS X 4 = 17,28,000 YEARS
TRETA 4,32,000 YEARS X 3 = 12,96,000 YEARS
DWAPAR 4,32,000 YEARS X 2 = 8,64,000 YEARS
KALIYUG 4,32,000 YEARS X 1 = 4,32,000 YEARS
1 MAHAYUG (GRAND TOTAL OF ALL THE YUGAS) = 4,320,000 YEARS
71 MAHAYUG = 43,20,000X71 = 1 MANVANTAR
1 MANVANTAR = 30,6720,000 YEARS
14 MANVANTAR = 4,294,080,000 YEARS
(There are 14 Manvantars)
The earth remains submerged in the water for the period of 8,64,000 years i.e. half the number of Satyug, before the start of each Manvantar, it also remains submerged in the water for the same number of years, i.e. 8,64,000 years, after the completion of each Manvantar.
So in 14 Manvantars the number of years
17,28,000 x 15 = 2,59,20,000
(Number of year in Satyug)
+ 14 Manvantar = 42,9, 40,80,000
1 Kalpa = 4320,000,000 years
One day & night of Brahma = 4,320,000 Mahayug x 100 = 4,320,00,000 years
Since the one moment in the life of Brahma is considered to be of our 100years, therefore the life of Brahma in 100 years will be
4,32,00,00,000 x 360 x 100 = 1,555,200,000,000 years
The Present Age of Cosmos according to the Vedic System is as follows:
There are 14 Manvantaras altogether. The present period is passing through the seventh Manvantara called Vaivaswata Manvantara.
One Manvantara consists of 71 Mahayugs, out of which 27 Mahayugs have already passed. We are passing through the first phase of the Kali Yuga which itself is the third Yuga of the 28th Mahayuga and which has come after the passing of Satya Yuga, Treta and Dwapar Yuga.
The time period of Manvantara (exclusive period, when the earth is submerged in water, in the beginning and in the end) = 306,720,000 years
1) Multiplying these years by 6 = 30,67,20,000 x 6 (Because we are in the midst of 7th Manvantara, of the Svetvaaraah Kalpa and 6 Manvantaras have already passed) = 1,8,0,300,000 years
The time period of Pralaya consists of 17,28,000 years since 7 Pralayas have passed, after the end of 6th Kalpa and before the beginning of 7th Kalpa, so 17,28,000x 7 = 12,096,000 years
Adding we have:
1,840,300,000 + 120 96 000 + 1,852,396,000 years
Therefore, after 1,85,24,16,000 years ‘VAIVASVAT MANVANTARA’ has started.
2) 27 Mahayugs with each Mahayuga consisting of 43,20,000 years. 43,20,000 x 27 = 116,640,000 years have passed
Total = 1,96,90,56,000 years
3) Now the time period of Kali Yuga in the 28th Yuga =
Time period of Satya Yuga = 17,28,000
Time period of Treta = 12,96,000
Time period of Dwapar = 8,64,000
TOTAL = 38,88,000
Since all the above three Yugas have already passed, it means that after 38,88,000 years, Kali Yuga came into existence.
4) Kali Yuga started on Bhadrapada, Krishnapaksha -13th day, in Vyatipaat yoga at midnight, in the Aashlesha Nakshatra and the age of the Kali Yuga has been fixed as 5101 years as till date that is Vikram Samvat 2057 = Shaka 1922 = 2000 AD.
Sum of all the three Yugs = the Sum of 27 Mahayugas and Manvantar + the time period of Kali Yuga till date.
Kalpa consist of 4,32,00,00,000 years and out of these 1,97,29,49,101 years have passed. Therefore, the earth’s existence, according to the calculations devised by our ancient sages, comes up to 1,97,29,49,101 years till date. It is interesting to note that according to scientific calculations, the age of the cosmos is estimated between 15 and 20 billion years.
The current yuga or epoch is known as Kaliyuga. It is the last in the cycle of the current mahayuga or great epoch. Its calculated duration is 432000 years. We are not sure presently whether we are at the beginning, in the middle or near the end of Kaliyuga. If we accept the theory that Kaliyuga began with the passing away of Lord Krishna some 6000 or 7000 years ago, then probably we are in the early phase of Kaliyuga and have a long way to go.
सूर्यसिद्धान्त काल-भेद निरूपिणं Secrets of Time in Surya Siddhant
सूर्यसिद्धान्त काल-भेद निरूपिणं
Secrets of Time in Surya Siddhant
सूर्यसिद्धान्त Surya Siddhant
पंचसिद्धांतिका Pancha Siddhantika
वराहमिहिर Varahamihir
कृतियाँ
550 ई. के लगभग इन्होंने तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें बृहज्जातक, बृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका, लिखीं। इन पुस्तकों में त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए हुए हैं, जो वराहमिहिर के त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।
पंचसिद्धांतिका में वराहमिहिर से पूर्व प्रचलित पाँच सिद्धांतों का वर्णन है। ये सिद्धांत हैं : पोलिशसिद्धांत, रोमकसिद्धांत, वसिष्ठसिद्धांत, सूर्यसिद्धांत तथा पितामहसिद्धांत। वराहमिहिर ने इन पूर्वप्रचलित सिद्धांतों की महत्वपूर्ण बातें लिखकर अपनी ओर से ‘बीज’ नामक संस्कार का भी निर्देश किया है, जिससे इन सिद्धांतों द्वारा परिगणित ग्रह दृश्य हो सकें। इन्होंने फलित ज्योतिष के लघुजातक, बृहज्जातक तथा बृहत्संहिता नामक तीन ग्रंथ भी लिखे हैं। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिलित हैं।
अपनी पुस्तक के बारे में वराहमिहिर कहते है:
ज्योतिष विद्या एक अथाह सागर है और हर कोई इसे आसानी से पार नहीं कर सकता। मेरी पुस्तक एक सुरक्षित नाव है, जो इसे पढ़ेगा वह उसे पार ले जायेगी।
यह कोरी शेखी नहीं थी। इस पुस्तक को अब भी ग्रन्थरत्न समझा जाता है।
कृतियों की सूची
• पंचसिद्धान्तिका,
• बृहज्जातकम्,
• लघुजातक,
• बृहत्संहिता
• टिकनिकयात्रा
• बृहद्यात्रा या महायात्रा
• योगयात्रा या स्वल्पयात्रा
• वृहत् विवाहपटल
• लघु विवाहपटल
• कुतूहलमंजरी
• दैवज्ञवल्लभ
• लग्नवाराहि
वैज्ञानिक विचार तथा योगदान:-
वराहमिहिर वेदों के ज्ञाता थे मगर वह अलौकिक में आंखे बंद करके विश्वास नहीं करते थे। उनकी भावना और मनोवृत्ति एक वैज्ञानिक की थी। अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिक आर्यभट्ट की तरह उन्होंने भी कहा कि पृथ्वी गोल है। विज्ञान के इतिहास में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि कोई शक्ति ऐसी है जो चीजों को जमीन के साथ चिपकाये रखती है। आज इसी शक्ति को गुरुत्वाकर्षण कहते है।
वराहमिहिर ने पर्यावरण विज्ञान (इकालोजी), जल विज्ञान (हाइड्रोलोजी), भूविज्ञान (जिआलोजी) के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की। उनका कहना था कि पौधे और दीमक जमीन के नीचे के पानी को इंगित करते हैं। आज वैज्ञानिक जगत द्वारा उस पर ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने लिखा भी बहुत था। संस्कृत व्याकरण में दक्षता और छंद पर अधिकार के कारण उन्होंने स्वयं को एक अनोखी शैली में व्यक्त किया था। अपने विशद ज्ञान और सरस प्रस्तुति के कारण उन्होंने खगोल जैसे शुष्क विषयों को भी रोचक बना दिया है जिससे उन्हें बहुत ख्याति मिली। उनकी पुस्तक पंचसिद्धान्तिका (पांच सिद्धांत), बृहत्संहिता, बृहज्जात्क (ज्योतिष) ने उन्हें फलित ज्योतिष में वही स्थान दिलाया है जो राजनीति दर्शन में कौटिल्य का, व्याकरण में पाणिनि का और विधान में मनु का है।
त्रिकोणमिति
निम्ननिखित त्रिकोणमितीय सूत्र वाराहमिहिर ने प्रतिपादित किये हैं-
वाराहमिहिर ने आर्यभट्ट प्रथम द्वारा प्रतिपादित ज्या सारणी को और अधिक परिशुद्धत बनाया।
अंकगणित
वराहमिहिर ने शून्य एवं ऋणात्मक संख्याओं के बीजगणितीय गुणों को परिभाषित किया
संख्या सिद्धान्त
वराहमिहिर ‘संख्या-सिद्धान्त’ नामक एक गणित ग्रन्थ के भी रचयिता हैं जिसके बारे में बहुत कम ज्ञात है। इस ग्रन्थ के बारे में पूरी जानकारी नहीं है क्योंकि इसका एक छोटा अंश ही प्राप्त हो पाया है। प्राप्त ग्रन्थ के बारे में पुराविदों का कथन है कि इसमें उन्नत अंकगणित, त्रिकोणमिति के साथ-साथ कुछ अपेक्षाकृत सरल संकल्पनाओं का भी समावेश है।
क्रमचय-संचय
वराहमिहिर ने वर्तमान समय में पास्कल त्रिकोण (Pascal’s triangle) के नाम से प्रसिद्ध संख्याओं की खोज की। इनका उपयोग वे द्विपद गुणाकों (binomial coefficients) की गणना के लिये करते थे।
प्रकाशिकी
वराहमिहिर का प्रकाशिकी में भी योगदान है। उन्होने कहा है कि परावर्तन कणों के प्रति-प्रकीर्णन (back-scattering) से होता है। उन्होने अपवर्तन की भी व्याख्या की है
Panchang पंचांग
पंचांग ज्योतिष Panchang Astrology
पंचांग ज्योतिष Panchang Astrology
| नन्दा | भद्रा | जया | रिक्ता | पूर्णा |
| १ | २ | ३ | ४ | ५ |
| ६ | ७ | ८ | ९ | १० |
| ११ | १२ | १३ | १४ | १५, ३० |
| मंगलवार | ३ | ८ | १३ |
| बुधवार | २ | ७ | १२ |
| गुरूवार | ५ | १० | १५ |
| शुक्रवार | १ | ६ | ११ |
| शनिवार | ४ | ९ | १४ |
| वार/तिथि | रविवार | सोमवार | मंगलवार | बुधवार | गुरूवार | शुक्रवार | शनिवार |
| दग्धा | १२ | ११ | ५ | ३ | ६ | ८ | ९ |
| विष | ४ | ६ | ७ | २ | ८ | ९ | ७ |
| हुताशन | १२ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
| शुक्ल पक्ष | कृष्ण पक्ष | |
| चैत्र | ८,९ | ८,९ |
| बैसाख | १२ | १२ |
| ज्येष्ठ | १३ | १४ |
| आषाढ़ | ७ | ६ |
| श्रावण | २,३ | २,३ |
| भाद्रपद | १,२ | १,२ |
| अश्विन | १०,११ | १०,११ |
| कार्तिक | १४ | ५ |
| मार्गशीर्ष | ७,८ | ७,८ |
| पौष | ४,५ | ४,५ |
| माघ | ६ | ६ |
| फाल्गुन | ३ | ३ |
| `१. विष्कम्भ | २. प्रीति | ३. आयुष्मान | ४. सौभाग्य |
| ५. शोभन | ६. अतिगंड | ७. सुकर्मा | ८. धृति |
| ९. शूल | १०. गंड | ११. वृद्धि | १२. ध्रुव |
| १३. व्याघात | १४. हर्षण | १५. वज्र | १६. सिद्धि |
| १७. व्यतिपात | १८. वरीयन | १९. परिघ | २०. शिव |
| २१. सिद्ध | २२. साध्य | २३. शुभ | २४. शुक्ल |
| २५. ब्रह्म | २६. एन्द्र | २७. वैधृति |
| योग | स्वामी | योग | स्वामी | योग | स्वामी | योग | स्वामी |
| `१. विष्कम्भ | यम | २. प्रीति | विष्णु | ३. आयुष्मान | चंद्रमा | ४. सौभाग्य | ब्रह्मा |
| ५. शोभन | बृहस्पति | ६. अतिगंड | चंद्रमा | ७. सुकर्मा | इंद्र | ८. धृति | जल |
| ९. शूल | सर्प | १०. गंड | अग्नि | ११. वृद्धि | सूर्य | १२. ध्रुव | भूमि |
| १३. व्याघात | वायु | १४. हर्षण | भग | १५. वज्र | वरुण | १६. सिद्धि | गणेश |
| १७. व्यतिपात | रूद्र | १८. वरीयन | कुबेर | १९. परिघ | विश्वकर्मा | २०. शिव | मित्र |
| २१. सिद्ध | कार्तिकेय | २२. साध्य | सावित्री | २३. शुभ | लक्ष्मी | २४. शुक्ल | पार्वती |
| २५. ब्रह्म | अश्विनीकुमार | २६. एन्द्र | पितर | २७. वैधृति | दिति |
तिथियों का ज्ञान:- Tithi Jyotish – 2
उत्तर भरत में लग्न तालिका नीचे दिए गए चित्र के अनुसार बनाई जाती है | इसमें जो बारह खाने बने हैं उनमें चित्र की तरह केंद्र के प्रथम भाव से प्रारंभ करके घडी की सुइ की उलटी दिशा में चलते हुए बारहवें भाव तक बनाए जाते हैं | उक्त बारह भाव में प्रत्येक भाव मनुष्य के जीवन के किसी विशेष क्षेत्र को तथा किसी विशेष अंग की स्थिति बताता है | प्रत्येक भाव का विस्तृत अध्ययन अलग से किया जायेगा | उदाहरणार्थ प्रथम भाव मनुष्य के सामान्य शारीरिक गठन व सिर के सम्बन्ध में बताता है |
चित्र -१
जन्म तालिका में राशियों और ग्रहों को प्रदर्शित करना – किसी व्यक्ति के जन्म के समय पृथ्वी अपने परिपथ पर चलते हुए जिस राशि में है, वह राशि की क्रम संख्या के रूप में प्रथम भाव में लिखी जाती है तथा उसके आगे कि राशियाँ घडी की सुइयों के उलटी दिशा में क्रमश दुसरे, तीसरे…..आदि भावों में लिखी जाती है | इस राशि को ही जन्म राशि कहते हैं |
उदाहरण के लिए – यदि किसी व्यक्ति का जन्म चित्र २ के अनुसार उस समय हुआ है, जब पृथ्वी ३० डिग्री एवं ६० डिग्री के बीच अर्थात वृष राशि में थी तो लग्न तालिका के प्रथम भाव में वृष राशि की क्रम संख्या अर्थात २ लिखा जायेगा तथा उसके बाद द्वितीय, तृतीय आदि भावों में लिखा जायेगा | बारहवें भाव में राशि क्रम संख्या १ (मेष) लिखा जायेगा |
राशियों को अंकित करने के बाद अन्य ग्रहों की स्थिति जन्म के समय देख कर उसे सम्बंधित राशि वाले भाव में लिखा जायेगा | उदाहरणार्थ चित्र २ के अनुसार, जन्म के समय बृहस्पति वृष (२) राशि में व चंद्रमा मिथुन (३) राशि में है | अतः चित्र ३ में प्रथम भाव में बृहस्पति व द्वितीय भाव में चंद्रमा लिखा गया है | इसी प्रकार चित्र २ में जन्म के समय शनि व राहु सिंह (५) राशि में, शुक्र मकर (१०) राशियों में, बुध, सूर्य व केतु कुम्भ (११) राशि में तथा मंगल मीन वृष (१२) राशि में है | अतः चित्र ३ में इसी के अनुसार सम्बंधित राशि वाले भाव में इन ग्रहों के नाम लिखे गए हैं | जन्म के समय पृथ्वी किस राशि में, किस डिग्री पर थी तथा अन्य ग्रहों की क्या स्थिति है, इसको ज्ञात करने के लिए गणना का सहारा लिया जाता है जिसकी विस्तृत चर्चा आगे की जाएगी | यहाँ केवल हम कुंडली को समझ रहे हैं.. और उसका कांसेप्ट साफ़ कर रहे हैं | इसकी गणना कैसे करते हैं, वो आगे बताया जायेगा |
लग्न कुंडली व चन्द्र कुंडली – चित्र ३ में वृष राशि में जन्मे व्यक्ति की लग्न कुंडली प्रदर्शित है | यह कुंडली चित्र २ के अनुसार पृथ्वी व अन्य ग्रहों की स्थिति प्रदर्शित करते हुए बनाई गयी है | किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में ज्योतिषीय अध्ययन के लिए जन्म कुंडली के अतिरिक्त चन्द्र कुंडली भी बनाई जाती है | उत्तर भारत में बहुधा जन्म के समय पृथ्वी जिस जिस राशि में होती है उस राशि को उस व्यक्ति की ‘लग्न राशि’ या संक्षेप में केवल ‘लग्न’ कहते हैं तथा जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में होता है उसे ‘चन्द्र राशि’ या संक्षेप में केवल ‘राशि’ कह देते हैं | किसी व्यक्ति की चन्द्र कुंडली बनाने के लिए उसकी लग्न कुंडली में चंद्रमा जिस राशि में हो उस राशि को प्रथम भाव में लिख देते हैं तथा उसके आगे की राशियाँ द्वितीय आदि भाव में पूर्व में दी गयी विधि से ही लिखते हैं |
इसके बाद लग्न कुंडली में जो ग्रह जिस राशि में है उसी राशि में वह ग्रह लिख देते हैं | उदाहरणार्थ चित्र ३ में बनाई गयी लग्न कुंडली की चन्द्र कुंडली चित्र ४ के अनुसार होगी | चित्र ३ में चंद्रमा राशि संख्या ३ (मिथुन) में है अतः चित्र ४ में प्रथम भाव में ३ लिखा गया है तथा उसके बाद की राशियाँ द्वितीय, तृतीय आदि भाव में लिखी गयी हैं | जो ग्रह जिस राशि में चित्र ३ में है, वह उसी राशि में चित्र ४ में लिखा गया है | यदि किसी व्यक्ति के जन्म के समय पृथ्वी व चंद्रमा एक ही राशि में हो तो उसकी लग्न कुंडली के प्रथम भाव में चंद्रमा ही होगा | अतः उसकी लग्न कुंडली और चन्द्र कुंडली एक समान होगी |
कुंडली बनाने से पहले हमें जन्म समय निकालना आना चाहिए, पर उसके लिए पहले समय के कांसेप्ट को और अच्छे से समझना चाहिए | सीधे जन्म समय का गणित भी बताया जा सकता है, पर हमारा उद्देश्य हर चीज को बारीकी से समझना है इसलिए हम कोई जल्दी नहीं करेंगे | हमने समय को पहले भी संक्षेप में बताया हैं यहाँ घडी और सूर्य के अनुसार समय की चर्चा करेंगे |
भारत वर्ष में स्टैण्डर्ड टाइम ८० डिग्री ५ मिनट रेखांश (देशांतर) निर्धारित हुआ है | किसी विशेष स्थान का समय नहीं है बल्कि ८२ डिग्री ५ मिनट पर रेखांश पर जितने स्थान पड़ते हैं उन सब का यही स्थानक समय समझना चाहिए | इसी के अनुसार भारतवर्ष भर की घड़ियाँ मिलाई जाती है | जब ८२ डिग्री ५ मिनट रेखांश के देशो में १२ बजते हैं तो सम्पूर्ण भारत की घड़ियों में उस समय १२ बजते हैं | इसके कारण व्यवहारिक रीति से कारोबार करने में सुविधा हो गयी कि यदि एक घडी में १२ बजेंगे तो सरे भारतवर्ष में १२ बजेगा |
१.७.१९०५ में यह स्टैण्डर्ड समय की व्यवस्था नहीं थी | इसके पहले ऐसा नहीं होता था, प्रत्येक स्थानों में पृथक पृथक समय ही प्रचलित था |
जिस प्रकार भारतवर्ष का स्टैण्डर्ड समय निर्धारित हुआ है उसी प्रकार प्रत्येक देश का पृथक पृथक स्टैण्डर्ड समय निर्धारित कर दिया गया है और ग्रीनविच समय को मध्य जान कर उसके हिसाब से यह समय निर्धारित हुआ है | बर्मा का स्टैण्डर्ड समय ६.३० मिनट है अर्थात बर्मा भारतवर्ष के समय से १ घंटा बढ़ा हुआ है | दूसरी लड़ाई के समय बर्मा में लड़ाई होने के कारण बर्मा का स्टैण्डर्ड समय भारत में लागू कर दिया गया था यानि की पुराने समय में १ घंटा आगे बढ़ा दिया गया था जो तारिख १ सितम्बर १९४२ से १५ ऑक्टोबर १९४५ के २ बजे तक प्रचलित रहा |
अब के समय में घड़ियों में २ समस्या हैं | एक तो यह कि यदि एक घडी बंद होती है तो दूसरी घडी से मिलान करने पर २-४ मिनट का अंतर प्रत्येक घडी में आ ही जाता है | रेलवे या पोस्ट ऑफिस से बहुत कम घड़ियाँ मिली हुई होती हैं |
दूसरी समस्या यह कि आजकल जो घड़ियाँ बनती हैं वो किसी नियमित गति से ही चलती है अर्थात वह घडी एक दिन में जिस गति से चलेगी सदा उसी गति से वह घडी चलती रहेगी | अर्थात १२ घंटे में जिस प्रकार घंटे का काँटा एक बार पूरा घूम कर फिर १२ पर आएगा और उसके लिए जितना समय लगेगा सदा उतना ही समय प्रतिदिन उस घडी में उसी प्रकार घंटे का कांटा एक बार पूरा घूम जाने में लगेगा | ऐसा नहीं होता कि कभी १२ घंटा लगा हो और कभी ११.५० घंटे में एक बार काँटा पूरा घूम गया हो | इस प्रकार घडी की चाल एक सी बनी रहती है |
अब सूर्य का विचार कीजिये जिसका समय बताने के लिए ये घड़ियाँ बनी हैं | सूर्य की प्रतिदिन की गति एक सी नहीं होती | कभी दिन भर में ५७ कला गति होती है, कभी वह गति प्रतिदिन क्रमशः बढ़ते बढ़ते ६१ कला तक हो जाती है और फिर घटने लगती है | इस प्रकार सूर्य की गति घटती बढती रहती है | जबकि घडी ऐसी नहीं बनी होती जो सूर्य की गति के अनुसार कभी घडी की गति धीमी या तेज हो जाये |
अतः किसी स्थान का सही लोकल समय वही होगा जो धुप घडी के अनुसार वहां का समय होगा | धुप घडी के समय को स्थानिक समय या लोकल टाइम कहते हैं | परन्तु घड़ियों में जो दोपहर का समय प्रकट होता है वह वहां के ठीक दोपहर का समय नहीं होता |
स्थानीय समय २ प्रकार का होता है |
क) प्रत्यक्ष स्थानीय समय (Apparent Local Time)
ख) मध्यम स्थानीय समय (Local Mean Time)
प्रत्यक्ष समय और मध्यम स्थानीय समय – इस प्रकार सूर्य के और घड़ियों के समय के अंतर की कठिनाई दूर करने के लिए ज्योतिषियों ने एक नकली सूर्य आकाश में घूमता हुआ मान लिया है | इस सूर्य को मध्यम सूर्य कहते हैं जो भूमध्य रेखा पर एक सी गति से घुमते हुए मान लिया गया है और इस मध्यम सूर्य (Mean Sun) के समय का मिलान सच्चे सूर्य के समय से उस समय होता है जब कि सच्चा सूर्य मेघ सम्पात (Vernel Equinox) में होता है और उस समय दिन रात बराबर होते हैं |
जो समय अपने असली सूर्य से प्रकट होता है उसे स्पष्ट समय या प्रत्यक्ष समय कहते हैं परन्तु जो मध्यम सूर्य के चलने के कारण जो समय प्रकट होता है वह मध्यम समय कहलाता है | अपनी घड़ियाँ इसी मध्यम समय को बतलाती हैं अर्थात घडी के समय को मध्यम समय कहेंगे | मध्यम समय और स्पष्ट समय के अंतर को बेलांतर (Equation of Time) कहते हैं | यह अंतर १६ मिनट से अधिक का नही होता |
मध्यम सूर्य का ६ बजे ठीक उगना, १२ बजे दोपहर होना और ६ बजे संध्या के समय अस्त मानते हैं | परन्तु वास्तविक सूर्य के उदय अस्त के समय में प्रतिदिन अंतर पड़ता है |
बता चुके हैं कि घडी का समय मध्यम समय है और इससे जो स्थानीय समय निकाला गया है वह भी मध्यम स्थानीय समय ही होगा | इस प्रकार निकाल गया स्थानीय समय भी शुद्ध नहीं है क्योंकि यह समय भी घडी के अनुसार निकला है जबकि सूर्य की गति एक सी नहीं रहती लेकिन घड़ियों की गति एक सी रहती है इस कारण इस मध्यम समय को सूर्य के अनुसार करना पड़ता है | इसमें ऊपर बताये गए तरीके से बेलांतर संस्कार करने से ही शुद्ध समय निकलता है | इस शुद्ध समय को लेकर इष्ट काल (आगे बतया जायेगा ) निकाल कर ही कुंडली बनायी जाती है |
देशांतर संस्कार – कोई देश ग्रीनविच से जितने रेखांश दूरी पर हो उसके घंटा मिनट बना लीजिये | यदि वह देश ग्रीनविच से पूर्व में है तो ग्रीनविच समय से जोड़ देंगे और यदि पश्चिम में हो तो घटा देंगे तो वहां का समय निकल आएगा | इस प्रकार से इष्ट देश के समय का अंतर ज्ञात हो जायेगा इसे ही देशांतर संस्कार कहते हैं |
जैसे किसी स्थान का देशांतर ग्रीनविच से १० डिग्री पूर्व है तो १ डिग्री = ४ मिनट के हिसाब से १० डिग्री = १० x ४ = ४० मिनट का नातर ग्रीनविच से पड़ेगा | इसी प्रकार भारत के ८२ डिग्री ५ मिनट को भी निकाला जा सकता है |
आज कल घड़ियाँ जो समय बताती हैं वह स्टैण्डर्ड समय है और बहुधा लोग इसे ही नोट करते हैं | इस कारण उस समय की शुद्धि की आवश्यकता होती है |
जैसे – यदि भरत का देशांतर ८२ डिग्री ५ मिनट = ५ घंटा – ३० मिनट पूर्व है | जबलपुर ८० डिग्री ० मिनट पर है तो ८०x४ = ३२० मिनट = ५ घंटा २० मिनट मतलब १० मिनट का अंतर रहेगा | अतः घडी में जब १२ बजेंगे तो जबलपुर का स्थानीय समय ११ बजाकर ५० मिनट होगा |
ऐसे ही काशी का देशांतर ग्रीनविच से ८३ डिग्री ० मिनट पूर्व है तो ८३x४ = ५ घंटा ३२ मिनट | यहाँ काशी का देशांतर ८२ डिग्री ५ मिनट से अधिक है तो २ मिनट (दोनों का अंतर) घडी के समय में जोड़ देंगे | जब स्टैण्डर्ड समय (घडी में) १२ बजेगा तो काशी में २ मिनट अधिक होगा अर्थात १२ बजाकर २ मिनट होगा |

चौदह मन्वंतर में अलग रूप में अवतार लेने वाले सप्तर्षि गण कौन हैं
ब्रह्म लोक का एक दिन हमारी सृष्टि के एक कल्प के समय के बराबर होता है और उस एक कल्प में चौदह मनु होते हैं यानी ब्रह्मा जी अपने एक दिन में चौदह मनुओं की सृष्टि करते हैं | इन चौदह मनुओं के अनुसार ही चौदह मन्वंतर होते हैं | अलग-अलग मन्वन्तरों में अलग-अलग सप्तर्षि होते हैं ।
चौदहों मनु तथा उनके पुत्र एक-एक कर समस्त पृथ्वी के राजा होकर धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करते हैं और इस सृष्टि का विस्तार करते हैं । इन मनुओं के अनुसार ही चौदह मनवन्तरों के चौदह अलग-अलग नाम पड़े हैं |
ये आदि मनु ही प्रथम मनु है, जिनके नाम से मन्वन्तर का नाम, स्वाम्भुव मन्वन्तर पड़ा । द्वितीय मनु का नाम स्वारोचिष है । इसी प्रकार क्रमशः औत्तम, तामस्, रैवत तथा चाक्षुष, ये छः मनु हए । वर्तमान में सातवां ‘वैवस्वत’ मन्वन्तर चल रहा है । सूर्यसावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रूद्रसावर्णि, देवसावर्णि तथा इन्द्रसावर्णि ये सात मन्वन्तर इसके बाद चलेंगे ।
यहाँ ध्यान देने की बात यह है प्रत्येक कल्प में इन मन्वन्तरों के नाम भी बदल जाते हैं | मन्वन्तरों का दिया गया उपरोक्त क्रम वर्तमान कल्प का है । सप्तर्षियों का प्रादुर्भाव श्री ब्रहमाजी के मानस संकल्प से हुआ है अर्थात ये उनके मानस पुत्र हैं ।
कल्प के प्रारम्भ में सृष्टि के विस्तार एवं उनके उचित सञ्चालन के लिए ब्रहमा जी ने अपने ही समान दस ऋषियों को उत्पन्न किया । इन ऋषियों के नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष तथा नारद हैं | यही आदि ऋषि-सर्ग है ।
इन ऋषियों का प्रादुर्भाव ब्रहमा जी के मानसिक संकल्प से उनके अनेक अंगो से हुआ है, अतःयह ऋषिसृष्टि, मानस सृष्टि या आंगिक सृष्टि अथवा सांकल्पिक सृष्टि भी कहलाती है । इनमें नारद जी ब्रहमा जी की गोद से, दक्ष अंगूठे से, वशिष्ठ प्राण से, भृगु त्वचा से, क्रतु हाँथों से, पुलह नाभि से, पुलस्त्य कानों से, अंगिरा मुख से, अत्रि नेत्रों से और मरीचि मन से उत्पन्न हुए हैं | सृष्टि के विस्तार तथा उसके रक्षण में इन ऋषियों का महत्वपूर्ण योगदान है | नीचे दी गयी सारणी में प्रत्येक मन्वंतर और उनके सप्तर्षियों के नाम दिए गए हैं |
प्रत्येक मन्वन्तर में नामभेद से यह ही ऋषि सप्तर्षि होकर महाप्रलय में चराचर के सूक्ष्मतम स्वरूप और वनस्पतियों तथा औषधियों को बीजरूप में धारणकर वि़द्यमान रहते है, प्रलय काल में भी ये बने रहते हैं और पुनः नयी सृष्टि में उसका विस्तार करते हैं |
प्रकारान्तर से हम अनुमान लगा सकते हैं कि ब्रह्माण्ड के अंत-काल में जब उसका संकुचन प्रारम्भ हो जाएगा तो ब्रह्माण्ड के प्रत्येक तत्व अपने मौलिक और सूक्ष्मतम रूप में सप्तर्षि तारामंडल में विद्यमान रहेगा |
यद्यपि आज के वैज्ञानिक अन्तरिक्ष में स्थापित अपनी शक्तिशाली एवं अत्याधुनिक दूरबीनों से सौरमंडल के बाहर एक वृहद संसार को देख सकते हैं लेकिन ये संसार कितना आभासी और कितना वास्तविक है इसका अनुमान लगाना कठिन है क्योंकि सौरमंडल के गुरुत्व को भेद कर आती विद्युतचुम्बकीय किरणें सही और सटीक जानकारी देंगी इसकी सम्भावना कम है |
सप्तर्षि तारामंडल अपने सौर-मंडल से अत्यधिक दूर है | आज की वैज्ञानिक उपलब्धियों से वहां पहुँचने में जितना समय लग जाएगा वह अप्रासंगिक होगा लेकिन वहां पहुँचने पर ही वास्तविकता का अंदाज़ा लग पायेगा |
ये सप्तर्षिगण एक रूप से नक्षत्रलोक में सप्तर्षि तारामंडल में स्थित रहते हैं और दूसरे मूर्त रूप मे तीनों लोकों में (अर्थात स्थूल और सूक्ष्म दोनों जगत में) विभिन्न सृष्टियों के कालचक्र के अनुसार वहां ईश्वर की सकारात्मक शक्तियों की स्थापना एवं संवर्धन करते हैं |
इस प्रकार से सप्तर्षिगण जीवों पर महान कृपा करते हैं | अगर ये स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि के सत्वांश और चैतन्यांश को धारण कर प्रलय काल में सुरक्षित न रखते तो पुनः नवीन सृष्टि की रचना कठिन होती । प्रत्येक चतुर्युग (सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि) बीतने पर वेद-विप्लव होता है । इसीलिये सप्तर्षिगण भूतल पर अवतीर्ण होकर वेदों (ईश्वर की सकारात्मक शक्तियों का) का उद्धार करते हैं ।
अधिकारी जिज्ञासु को प्रत्यक्ष या परोक्ष, जैसा वह अधिकारी हो, तत्वज्ञान की ओर उन्मुख करके मुक्तिपथ में लगाते है । ये सभी ऋषि कल्पान्तचिरंजीवी, त्रिकालदर्षी, मुक्तात्मा और दिव्य देहधारी होते हैं । ये स्थितप्रज्ञ तथा अतीन्द्रिय दृष्टा है । गृहस्थ होते हुए भी ये मुनिवृत्ति से रहते हैं ।
ये सत्य, धर्म, ज्ञान, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, सदाचार एवं अपरिग्रह के मूर्तिमान स्वरूप और ब्रहम तेज से सम्पन्न होते है । यज्ञों द्वारा देवताओं का आप्यायन और नित्य ईश्वर की शक्तियों का अनुसन्धान ही इनकी मुख्य चर्या रहती है ।
इन ऋषियों की महिमा अपार है, ये सभी तपोधन हैं । ऋषियों ने वेदमन्त्रों का दर्शन किया है, इसीलिए ‘ऋषियों मंत्रदृष्टारः’ कहा गया है यानी ऋषि वेदमन्त्रों के दृष्टा हैं । याद रखने वाली बात ये है कि वेद और उनके मन्त्र अपौरुषेय हैं यानी इन्हें ईश्वर ने बनाया है और ये स्वयं ईश्वर स्वरुप ही हैं | ऋषि वेदमन्त्रों के दृष्टा और स्मर्ता हैं | इसलिए इनकी महिमा अपार है |
इस प्रकार से प्रातःकाल जगने के बाद ऋषियों के स्मरण की विशेष महिमा है । वेदों में तो सप्तर्षियों की महिमा का बार-बार वर्णन हुआ है । वहां सात संख्या की व्याख्या ऋषियों के एक विशेष वर्ग के लिए तो हुई ही है, ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि तथा राजर्षि, इन सात रूपों में भी ऋषियों का विभाजन भी हुआ है ।
जेसे 49 मरूद् देवताओं का सात-सात का वर्ग है, उसी प्रकार से ऋषियों में भी सात ऋषियों के वर्ग है, जो सप्तर्षि कहलाते है । सात संख्या का विशेष महत्व है । इस ब्रहमाण्ड में सात लोक ऊपर और सात लोक नीचे है, सात ही सागर हैं, वेद के गायत्री, उश्णिक् आदि सात छन्द ही मुख्य है, भगवान सूर्य सात रश्मियाँ ही मुख्य हैं ।
सप्तर्षि गण सूक्ष्म रूप से इस देह में भी विद्यमान रहकर देव रूप होकर इसका संचालन करते हैं । ये सात ऋषि प्राण, त्वचा, चक्षु, श्रवण, रसना , घ्राण तथा मन रूप से देह में स्थित है ओर सुषिुप्काल में देह में व्याप्त रहते हुए भी हृदयाकाश स्थित विज्ञात्मक ब्रहम में प्रविष्ट हो जाते हैं |
कष्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वमित्र, गौतम, जमदग्नि तथा वसिष्ठ- ये वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं । महर्षि वसिष्ठ जी के साथ उनकी धर्मप्राण देवी अरून्धती भी साथ में ही सप्तर्षि मण्डल में स्थित रहती हैं । महाभागा अरून्धती के पातिव्रत्य की अपार महिमा है, इसी बल पर ये सदा वशिष्ठ जी के साथ रहती है । सप्तर्षियों के साथ देवी अरून्धती जी का भी पूजन होता है । अखण्ड सौभाग्य तथा श्रेष्ठ दाम्पत्य जीवन के लिए इनकी अराधना होती है ।
आकाश में सप्तर्षि मण्डल कहां स्थित है, इस विषय में श्रीभद्भागवत में बताया गया है कि नवग्रहों समेत सौर-मंडल के समस्त लोको से ऊपर ग्यारह लाख योजन की दूरी पर कश्यप आदि सप्तर्षि दिखायी देते हैं ।
ये समस्त लोकों के लिए मंगल कार्य करते हुए भगवान विष्णु के परम पद यानी ध्रुवलोक की प्रदक्षिणा किया करते हैं, जैसा की दिया भी है-
‘तत उत्तरस्मादृष य एकादष लक्ष योजनान्तर उपलन् यन्ते य एक लोकानां षमनुभाव यन्तो भगवतो विष्णोर्यत्परमं पदं प्रदक्षिणं प्रक्रमन्ति ।।’
आकाश में सप्तर्षिमण्डल के उत्तर में ध्रुवलोक स्थित है । इस प्रकार सप्तर्षिमण्डल में स्थित रहकर ये सप्तर्षिगण जीवों के शुभाशुभ कर्मों के साक्षी बनते हैं ओर भगवान की अवतार लीला में सहयोगी बनते हैं ।
भगवान् श्री राम आदि की लीला में महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम तथा अत्रि आदि ऋषि सहयोगी रहे हैं | भगवान् के लीला संवरण के बाद भी ये उनके द्वारा प्रतिपादित धर्म की मर्यादा को सुरक्षित रखने के लिए कल्प पर्यन्त बने रहते है और पुनः अवतरित होते है ।
स्वर्ग और नर्क समेत अन्यान्य लोकों की अवधारणा दुनिया के कई धर्मों में हैं | इसी अवधारणा ने आज के समय में, परग्रही एलियंस एवं उनकी रहस्यमय दुनिया के प्रति आम-जनमानस के कौतूहल को जन्म दिया है | आम आदमी अभी भी इनसे सम्बंधित घटनाओं को आश्चर्य की तरह देखता है और उनके बारे में ज्यादे-से-ज्यादे विश्वसनीय जानकारी पाना चाहता है |
पुरातन काल में ऐसा नहीं था | प्राचीन मनुष्य दूसरे लोकों के प्राणियों के संपर्क में वैसे ही था जैसे आज हम दूसरे देशों के मनुष्यों के संपर्क में होते हैं | आज के आधुनिक इतिहासकार, विद्वान, वैज्ञानिक, पुरातत्ववेत्ता, मनुष्य की विकास यात्रा को डार्विन के चश्मे से देखते हैं और हमें बताते हैं कि प्राचीन मनुष्य आदिवासियों की ज़िन्दगी जीता था, उसके पास अपनी ज़िन्दगी को सुचारू रूप से चलाने के लिए मूलभूत सुविधाओं और पर्याप्त बुद्धि का आभाव था |
मनुष्य हमेशा अनोखी चीजों को अपनी बुद्धि के अनुसार देखता है, सुनता है और समझता है और फिर वैसे ही उनका उल्लेख करता है | ये सांसारिक नियम है, किसी द्रव को आप जिस बर्तन में रखेंगे वो उसी के आयतन एवं आकार के अनुसार रूप ग्रहण कर लेता है | भारतीय दर्शन, मानवेतर दुनिया, उनके लोक, प्राणी आदि के बारे में सटीक जानकारी देता है |
युगल के सम्बन्ध से पैदा होने वाली सृष्टि, मैथुनी सृष्टि कहलाती है | जैन धर्म-ग्रंथों में इस सृष्टि को गर्भज सृष्टि भी कहते हैं | जो प्राणी एक निश्चित अवधि तक गर्भ में रहकर अपना शारीरिक विकास करता है और पर्याप्त विकास के बाद गर्भ से बाहर आता है, उसे गर्भज प्राणी कहते हैं | इसमें मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी इत्यादि इस धरती के प्राणी आते हैं |
इस प्रकार गर्भ से पैदा होने वाले पशु-पक्षी तथा मनुष्य मैथुनी सृष्टि के अंतर्गत आते हैं | इनमे मानसिक, वाचिक और कायिक तीनो शक्तियों का विकास है | यद्यपि विकास की क्षमता में एक दुसरे से तारतम्य ज़रूर है लेकिन तीनो शक्तियों की सत्ता अवश्य विद्यमान है | इस ब्रह्माण्ड का दूसरा भाग ‘अमैथुनी’ सृष्टि का है | यह मैथुनी सृष्टि की तुलना में काफ़ी बड़ी है |
अमैथुनी सृष्टि के मुख्य प्राणी-देवयोनि के जीव, नरक योनि के जीव, एकेन्द्रिय जीव, द्विन्द्रिय, त्रिन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रिय लेकिन अमनस्क (यानी जिनमे मानसिक, वाचिक तथा कायिक शक्तियों का निरंतर विकास नहीं होता) आदि होते हैं | देवयोनि में पैदा होने वाले जीवों को माता-पिता के संयोग की आवश्यकता नहीं होती | गर्भ की या अंडे में रहने की भी आवश्यकता नहीं होती |
वे वहाँ, कुछ विशेष प्रकार के पुष्प होते हैं उनमे जन्मते हैं | ये विशेष प्रकार के फूल (वहां के समयानुसार) जब भी वहाँ खिलते हैं तो उनमे उनका जन्म होता है | जन्म लेने के दो घड़ी भीतर (लगभग अड़तालीस मिनट के अन्दर) उनके परिमित शरीर की रचना हो जाती है | देव योनि के जीवों में ना तो बचपन होता है और ना ही बुढ़ापा | वे शक्ति-सम्पन्न, ऊर्जायुक्त शरीर वाले होते हैं, जिसमे हाड़-मांस नहीं होता |
दरअसल उनके लिए विशिष्ट अणुओं का समूह शरीर के रूप में अवस्थित हो जाता है और इस उत्पत्ति में किसी के संयोग की आवश्यकता नहीं, किसी के पालन-पोषण की अपेक्षा नहीं रहती | फूलों में जन्मते हैं, सदैव युवावस्था में रहते हैं और दीर्घायुषी होते हुए भी उनमे बीमारी या शैथिल्यता नहीं आती |
नर्क-योनि के प्राणियों का उत्पत्ति-स्थान एक कुम्भी जैसा स्थान होता है, ये एक ऐसे बॉक्स की तरह होता है जिसका मुंह छोटा और पेट बड़ा होता है | ये जीव भी पैदा होने के अड़तालीस मिनट के भीतर अपने शरीर का निर्माण कर लेते हैं | नर्क-योनि के इन जीवों में भी बचपन या बुढ़ापा दोनों नहीं होता लेकिन यहाँ जन्म से लेकर मृत्य-काल तक केवल पीड़ा-ही-पीड़ा है |
सर्वथा असुविधा, भयंकर दुर्गन्ध, भीषण ठण्ड (जिनमे हड्डियाँ भी भुरभुरी हो जाएँ) या भीषण अग्नि सामान गर्मी, पारस्परिक झगड़ा एक क्षण भी चैन नहीं लेने देता | यातना शरीर मिलने की वजह से, जीव ये सब कष्ट झेलता रहता है लेकिन मृत्यु को प्राप्त नहीं होता | वहाँ उसकी मृत्यु तभी होती है जब उसके कर्म-फल क्षीण होते हैं |
इन सब के अलावा पृथ्विकाय, अपकाय, तेजस्काय, वायुकाय, तथा वनस्पतिकाय-ये पाँच प्रकार के स्थावर शरीर वाले जीव अमैथुनिक हैं | इनमे एक इन्द्रिय होने के कारण इन्हें एकेन्द्रिय जीव कहा जाता है | इनमे चेतना का न्यूनतम विकास होता है | यद्यपि वनस्पतियों में संवेदनशीलता अत्यधिक होती है, लेकिन एक इन्द्रिय होने के कारण अभिव्यक्ति की प्रक्रिया अत्यंत सीमित है |
ये जीव अनुकूल संयोग मिलते ही अपने आप स्वयं पैदा होते हैं | इनमे मानसिक और वाचिक शक्तियों का निरंतर विकास नहीं होता | पैदा होते समय जिन क्षमताओं के साथ उत्पन्न होने हैं, उन्ही के साथ नष्ट भी होते हैं | द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और अमनस्क पञ्चइन्द्रिय वाले जीव भी ऐसी योनियों में पैदा होते हैं जो अमैथुनिक है |
वास्तव में ये ब्रह्माण्ड पञ्च तत्वों से मिलकर बना है | वर्तमान में, वैज्ञानिक जिन 118 तत्वों को आवर्त सारणी में वर्गीकृत करते हैं वो सारे पृथ्वी तत्व के अंतर्गत ही आते हैं (तत्वों का भारतीय वर्गीकरण विस्तृत था) | हमारे शरीर की पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ इस ब्रह्माण्ड में फैले हुए ज्ञान को ग्रहण करने के लिए हैं और पाँच कर्मेन्द्रियाँ उन्ही के अनुसार कार्य करने के लिए |
इन ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बीच तारतम्य बिठाने और इन पर नियंत्रण रखने का काम करता है मन | कुछ लोग मन को ही चेतना समझ लेते हैं जबकि ये गलत है | मन का निर्माण हमारे कर्मों द्वारा निर्मित हुए संस्कारों से होता है | कुछ लोग आत्मा को चेतना समझते हैं जबकि ये भी ठीक नहीं है क्योंकि चेतना का विकास होता, या तो आरोह क्रम (Upwards) में होगा या अवरोह क्रम (Downward) में होगा |
आत्मा सर्वथा निरपेक्ष है | इसका कभी विकास नहीं होता क्योंकि ना तो ये कभी पैदा हुआ था और ना ही ये कभी नष्ट होगा | तो फिर चेतना है क्या? वास्तव में आत्मा जब तक ‘जीव’ की अवस्था में रहता है, एक शरीर धारण किये हुए रहता है जिसे ‘ब्रह्माण्डीय शरीर’ या ‘Cosmic Body’ कहते हैं | ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों में जीव अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग शरीर धारण करता है |
उनके अलग-अलग रंग-रूप हो सकते हैं | लेकिन ये शरीर कर्म-फल के अनुसार मिलते हैं और भोग समाप्त होते ही नष्ट हो जाते हैं | अगर कुछ नहीं नष्ट होता है तो वो है ब्रह्मांडीय शरीर | इसका निरंतर विकास होता है | दरअसल चेतना का विकास, इसी ब्रह्मांडीय शरीर (Cosmic Body) का विकास है |
लेकिन ये विकास कर्मों के फलस्वरूप ही होता है | उच्च स्तर के कर्म (जिनमे ज्ञान का समावेश होना आवश्यक है) करने से ब्रह्मांडीय शरीर निरंतर विकसित होता है | एक स्तर ऐसा आता है जहाँ पहुँचने के बाद ये ब्रह्मांडीय शरीर यानि चेतना इतनी विकसित हो जाती है कि वो स्वयं तय करती है कि उसे कहाँ जाना है और कहाँ नहीं अर्थात वहां से उसका निम्न स्तर की योनियों में गमन नहीं होता |
भारतीय पौराणिक ग्रंथों में इसी को ‘मोक्ष’ या अपने ईष्ट प्रभु के परम-धाम में निवास करना कहते हैं | उन ग्रंथों में इसके बारे में जो लिखा है, सही लिखा है | लेकिन ऐसा नहीं है कि वहां पहुँचने के बाद उस जीव के ब्रह्मांडीय शरीर (Cosmic Body) का विकास रुक जाता है | दरअसल वहां भी विकास के पाँच स्तर होते है |
प्रथम स्तर है सालोक्य का | इस स्तर पर प्रवेश करने पर, इससे निम्न स्तर की योनियों में आवागमन रुक जाता है | यहाँ सुख और दुःख नहीं है केवल आनंद है | आनंद की तुलना सुख से नहीं की जा सकती | क्योंकि सुख में स्थायित्व नहीं है और आनंद चिर-स्थायी है |
इसके बाद दूसरा स्तर है ‘सार्ष्टि’ का | इस स्तर पर प्रवेश करने पर अपने ईष्ट प्रभु के समान ही ऐश्वर्य प्राप्त होता है | ये ऐश्वर्य, इस लोक के भौतिक ऐश्वर्यों से अलग होते हैं | तीसरा स्तर है सामीप्य का | इस स्तर पर प्रवेश करने पर अपने ईष्ट प्रभु का सामीप्य प्राप्त होता है, उनके माता-पिता, सखा, पुत्र, स्त्री आदि के रूप में | जीवात्मा जिस रूप में उनका ध्यान करता है, उनसे प्रेम करता है उसी रूप में वो वहां प्राप्त हो जाते हैं |
इसके आगे का द्वार सारुप्य मुक्ति की तरफ ले जाता है | इसमें वो अपने ईष्ट प्रभु का ही रूप धारण कर लेता है और उनके कुछ चिन्हों को छोड़कर बाकी समस्त चिन्हों जैसे शंख, चक्र, आदि को धारण कर लेता है | इसके आगे विकास का अंतिम स्तर होता है ‘सायुज्य’ का | यहाँ पहुँच कर वो अपने इष्ट प्रभु के साथ एकत्व को प्राप्त होता है यानि उनसे अभिन्न हो जाता है |
यहाँ महत्वपूर्ण बात ये है कि, ऐसा नहीं है कि चेतना के विकास के ये पाँच स्तर वही जा कर पूर्ण होते हैं, बल्कि ये मनुष्य जीवन जीते हुए भी पूरे किये जा सकते है | वास्तव में ब्रह्मांडीय शरीर या चेतना का विकास केवल और केवल उच्च स्तर के कर्म (जिनमे ज्ञान का समावेश होना आवश्यक है) द्वारा ही हो सकता है |
चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि ही एकमात्र कर्म योनि है बाकी सारी भोग योनियाँ हैं | इसलिए मनुष्य जन्म लेकर ही जीवात्मा की चेतना इतनी विकसित हो सकती है कि वो आवागमन के बंधन से मुक्त हो जाय, किसी और योनि में जन्म लेकर ऐसा संभव नहीं |
देवता या विकसित चेतनात्मक स्तर वाले प्राणी इस बात को समझते हैं कि कर्म-फल भोग समाप्त होने पर हमें वापस उन्ही योनियों में लौटना है और सुख-दुःख झेलना है | चूंकि उनकी समझ विकसित होती है इसलिए उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेने की महत्ता पता होती है |
इन्ही सब वजहों से देवता आदि उच्च चेतनात्मक स्तर वाले प्राणी (जिन्हें आज की दुनिया परग्रही एलियंस के रूप में जानती हैं) धरती के ज्ञानी और क्षमतावान मनुष्यों के संपर्क में रहते हैं | लेकिन कलियुगी प्रभाव की वजह से आज हम अपने आप को भुला बैठे है, अपने प्राचीन ग्रंथों में लिपिबद्ध हुए ज्ञान को भुला बैठे हैं |
हम उन्हें केवल धार्मिक नज़रों से देखते हैं | घर के मंदिर में अगर शिव-पुराण है, श्रीमद्भागवत गीता है तो हम लोग उसे माथे से लगाते हैं उसे भक्ति-भाव से पढ़ते है लेकिन समय की आज महती आवश्यकता है कि हम उसे तार्किक भाव से पढ़ें, वैज्ञानिक भाव से पढ़ें, स्वयं से प्रश्न करें, स्वयं उसका उत्तर ढूंढें |
जब हम स्वयं अपनी विरासत को नहीं पहचानेंगे, उसे नहीं संभालेंगे, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या दे कर जायेंगे | याद रखिये ‘धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः | तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नौ धर्मो हतोऽवधीत्’ अर्थात हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा धर्म के नाश होने पर हम स्वयं विनष्ट हो जायेंगे
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आद्यशक्ति भगवती जगदम्बा ‘विद्या’ और ‘अविद्या’ – दोनों ही रूपों में विद्यमान हैं। अविद्यारूप में वे प्राणियों के मोह का कारण हैं तो विद्यारूप में मुक्ति की। भगवती जगदम्बा विद्या या महाविद्या के रूप में प्रतिष्ठित है और भगवान सदाशिव विद्यापति के रूप में।
दस महाविद्याओं का संबंध मूलरूप से देवी सती, शिवा और पार्वती से है। ये ही अन्यत्र नवदुर्गा, चामुंडा तथा विष्णुप्रिया आदि नामों से पूजित और अर्चित होती हैं। दस महाविद्याओं का अवतरण क्यों हुआ और कैसे हुआ, इस सम्बंध में महाभागवत (देवीभागवत पुराण) में एक रोचक कथा प्राप्त होती है, जो संक्षेप में इस प्रकार है –
पूर्वकाल की बात है प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ-महोत्सव का आयोजन किया, जिसमें सभी देवता, ऋषिगण निमन्त्रित थे, किंतु भगवान शिव से द्वेष हो जाने के कारण दक्ष ने न तो उन्हें आमन्त्रित किया और न ही अपनी पुत्री सती को ही बुलाया। देवर्षि नारद जी ने देवी सती को बताया कि तुम्हारी सभी बहनें यज्ञ में आमन्त्रित हैं, अतः तुम्हे भी वहां जाना चाहिए। पहले तो सती ने मन में कुछ देर विचार किया, किंतु फिर वहां जाने का निश्चय किया। जब सती ने भगवान शिव से उस यज्ञ में जाने की अनुमति माँगी तो भगवान शिव ने वहां जाना अनुचित बताकर उन्हें जाने से रोका, पर सती अपने निश्चय पर अटल रहीं। वे बोलीं – मैं प्रजापति के यज्ञ में अवश्य जाऊंगी और वहां या तो अपने प्राणेश्वर देवाधिदेव के लिए यज्ञभाग प्राप्त करूंगी या यज्ञ को ही नष्ट कर दूंगी।
‘प्राप्स्यामि यज्ञभागं वा नाशयिष्यामि वा मखम्॥’
– महाभागवत पुराण ८/४२
ऐसा कहते हुए सती के नेत्र लाल हो गए। उनके अधर फड़कने लगे, वर्ण कृष्ण हो गया। क्रोधाग्नि से उदीप्त शरीर महाभयानक एवं उग्र दिखने लगा। उस समय महामाया का विग्रह प्रचण्ड तेज से तमतमा रहा था। शरीर वृद्धावस्था को सम्प्राप्त सा हो गया। उनकी केशराशि बिखरी हुई थी, चार भुजाओं से सुशोभित वे महादेवी पराक्रम की वर्षा करती सी प्रतीत हो रही थीं। कालाग्नि के समान महाभयानक रूप में देवी मुण्डमाला पहने हुई थीं और उनकी भयानक जिह्वा बाहर निकली हुई थी, सिर पर अर्धचंद्र सुशोभित था और उनका सम्पूर्ण विग्रह विकराल लग रहा था। वे बार-बार भीषण हुंकार कर रही थीं। इस प्रकार अपने तेज़ से दैदीप्यमान एवं भयानक रूप धारण कर महादेवी सती घोर गर्जना के साथ अट्टहास करती हुई भगवान शिव के समक्ष खड़ी हो गईं। देवी का यह भीषण स्वरूप साक्षात महादेव के लिए भी असह्य हो गया, वे भी भयभीत हो गए। इस प्रकार अपने स्वामी को भयक्रान्त देख कर दयावती भगवती सती ने उन्हें रोकने की इच्छा से क्षणभर में अपने ही शरीर से अपनी अंगभूत दस देवियों को प्रकट कर दिया, जो दसों दिशाओं में उनके समक्ष स्थित हो गईं। भगवान शिव जिस-जिस दिशा में जाते थे, भगवती का एक-एक विग्रह उनका मार्ग अवरुद्ध कर देता था।
देवी की ये स्वरूपा शक्तियां ही दस महाविद्याएँ हैं, इनके नाम हैं:
१. काली
२. तारा
३. षोडशी
४. भुवनेश्वरी
५. छिन्नमस्तिका
६. त्रिपुरसुंदरी
७. धूमावती
८. बगलामुखी
९. मातंगी तथा
१०. कमला
जब भगवान शिव ने इन महाविद्याओं का परिचय पूछा तो देवी बोलीं –
येयं ते पुरतः कृष्णा सा काली भीमलोचना ।
श्यामवर्णा च या देवी स्वयमूर्ध्वं व्यवस्थिति ॥
सेयं तारा महाविद्या महाकालस्वरूपिणी ।
सव्येतरेयं या देवी विशीर्षातिभयप्रदा ॥
इयं देवी छिन्नमस्ता महाविद्या महामते ।
वामे तवेयं या देवी सा शम्भो भुवनेश्वरी ॥
पृष्ठतस्तव या.देवी बगला शत्रुसूदिनी ।
वह्निकोणे तवेयं या विधवारूपधारिणी ॥
सेयं धूमावती देवी महाविद्या महेश्वरी ।
नैर्ऋत्यां तव या देवी सेयं त्रिपुरसुन्दरी ॥
वायौ या ते महाविद्या सेयं मतङ्गकन्यका ।
ऐशान्यां षोडशी देवी महाविद्या महेश्वरी ॥
अहं तु भैरवी भीमा शम्भो मा त्वं भयं कुरु ।
एताः सर्वाः प्रकृष्टास्तु मूर्तयो बहुमूर्तिषु ॥
भक्त्या संभजतां नित्यं चतुर्वर्गफलप्रदाः ।
सर्वाभीष्टप्रदायिन्यः साधकानां महेश्वर ॥ – महाभागवत पुराण ८/६५-७२
कृष्णवर्णा तथा भयानक नेत्रोंवाली ये जो देवी आपके सामने स्थित हैं, वे भगवती ‘काली’ हैं और जो ये श्यामवर्ण वाली देवी आपके उर्ध्वभग में विराजमान हैं, वे साक्षात महाकालस्वरूपिणी महाविद्या ‘तारा’ हैं। महामते! आपके दाहिनी ओर ये जो भयदायिनी तथा मस्तकविहीन देवी विराजमान हैं, वे महाविद्यास्वरूपिणी भगवती ‘छिन्नमस्ता’ हैं। शम्भो! आपके बाईं ओर ये जो देवी हैं, वे भगवती ‘भुवनेश्वरी’ हैं। जो देवी आपके पीछे स्थित हैं, वे शत्रुनाशिनी भगवती ‘बगला’ हैं। विधवा का रूप धारण की हुई ये जो देवी आपके अग्निकोण में विराजमान हैं, वे महाविद्यास्वरूपिणी महेश्वरी ‘धूमावती’ हैं और आपके नैर्ऋत्यकोण में ये जो देवी हैं, वे भगवती ‘त्रिपुरसुंदरी’ हैं। आपके वायव्यकोण में जो देवी हैं, वे मातंगकन्या महाविद्या ‘मातंगी’ हैं और आपके ईशानकोण में जो देवी स्थित हैं, वे महाविद्यास्वरूपिणी महेश्वरी ‘षोडसी’ हैं। मैं तो भयंकर रूपवाली ‘भैरवी’ हूँ। शम्भो! आप भय मत कीजिये। ये सभी रूप भगवती के अन्य समस्त रूपों से उत्कृष्ट हों। महेश्वर! ये देवियां नित्य भक्तिपूर्वक उपासना करने वाले साधक पुरुषों को चारों प्रकार के पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) तथा समस्त वांछित फल प्रदान करती हैं।












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