*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 10 || अध्याय 44 ||
*चाणूर, मुष्टिक आदि पहलवानोंका तथा कंसका उद्धार*
श्री शुकदेव जी कहते हैं - परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण ने चाणूर आदि के वध का निश्चित संकल्प कर लिया। जोड़ बन दिये जाने पर श्रीकृष्ण चाणूर से और बलरामजी मुष्टिक से जा भिड़े। वे लोग एक-दूसरे को जीत लेने की इच्छा से हाथ से हाथ बाँधकर और पैरों में पैर अड़ाकर बलपूर्वक अपनी-अपनी ओर खींचने गये। वे पंजों से पंजे, घुटनों से घुटने, माथे से माथा और छाती से छाती भिड़ाकर एक-दूसरे पर चोट करने लगे। इस प्रकार दाँव-पेंच करते-करते अपने-अपने जोड़ीदार को पकड़कर इधर-उधर घुमाते, दूर ढकेल देते, ज़ोर से जकड़ लेते, लिपट जाते, उठाकर पटक देते, छूटकर निकल भागते और कभी छोड़कर पीछे हट जाते थे। इस प्रकार एक-दूसरे को रोकते, प्रहार करते और अपने जोड़ीदार को पछाड़ देने की चेष्टा करते। कभी कोई नीचे गिर जाता, तो दूसरा उसे घुटनों और पैरों में दबाकर उठा लेता। हाथों से पकड़कर ऊपर ले जाता। गले में लिपट जाने पर ढकेल देता और आवश्यकता होने पर हाथ-पाँव इकट्ठे करके गाँठ बाँध देता।
परीक्षित! इस दंगल को देखने के लिये नगर की बहुत-सी महिलाएँ भी आयी हुई थीं। उन्होंने जब देखा कि बड़े-बड़े पहलवानों के साथ ये छोटे-छोटे बलहीन बालक लड़ाये जा रहे हैं, तब वे अलग-अलग टोलियाँ बनाकर करुणावश आपस में बात-चीत करने लगीं - ‘यहाँ राजा कंस के सभासद बड़ा अन्याय और अधर्म कर रहे हैं। कितने खेद की बात है कि राजा के सामने ही ये बली पहलवानों और निर्बल बालकों के युद्ध का अनुमोदन करते हैं। बहिन! देखो, इन पहलवानों का एक-एक अंग व्रज के समान कठोर है। ये देखने में बड़े भारी पर्वत-से मालूम होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण और बलराम अभी जवान भी नहीं हुए हैं। इसकी किशोरावस्था है। इनका एक-एक अंग अत्यन्त सुकुमार है। कहाँ ये और कहाँ वे?
जितने लोग यहाँ इकट्ठे हुए हैं, देख रहे हैं, उन्हें अवश्य धर्मोल्लंघन का पाप लगेगा। सखी! अब हमें भी यहाँ से चल देना चाहिये। जहाँ अधर्म की प्रधानता हो, वहाँ कभी न रहें; यही शास्त्र का नियम है। देखो, शास्त्र कहता है कि बुद्धिमान पुरुष को सभासदों के दोषों को जानते हुए सभा में जाना ठीक नहीं है। क्योंकि वहाँ जाकर उन अवगुणों को कहना, चुप रह जाना अथवा मैं नहीं जानता ऐसा कह देना - ये तीनों ही बातें मनुष्य को दोषभागी बनाती हैं। देखो, देखो, श्रीकृष्ण शत्रु के चारों ओर पैंतरा बदल रहे हैं। उनके मुख पर पसीने की बूँदें ठीक वैसे ही शोभा दे रही हैं, जैसे कमल-कोशल पर जल की बूँदें। सखियों! क्या तुम नहीं देख रही हो कि बलराम जी का मुख मुष्टिक के प्रति क्रोध के कारण कुछ-कुछ लाल लोचनों से युक्त हो रहा है! फिर भी हास्य का अनिरुद्ध आवेग कितना सुन्दर लग रहा है।
सखी! सच पूछो तो व्रजभूमि ही परम पवित्र और धन्य है। क्योंकि वहाँ ये पुरुषोत्तम मनुष्य के वेश में छिपकर रहते हैं। स्वयं भगवान शंकर और लक्ष्मी जी जिनके चरणों की पूजा करती हैं, वे ही प्रभु वहाँ रंग-बिरंगे जंगली पुष्पों की माला धारण कर लेते हैं तथा बलरामजी के साथ बाँसुरी बजाते, गौएँ चराते और तरह-तरह खेल खेलते हुए आनन्द से विचरते हैं।
सखी! पता नहीं, गोपियों ने कौन-सी तपस्या की थी, जो नेत्रों के दोनों से नित्य-निरन्तर इनकी रूप-माधुरी का पान करती रहती हैं। इनका रूप क्या है, लावण्य का सार! संसार में या उससे परे किसी का भी रूप इनके रूप के समान नहीं है, फिर बढ़कर होने की तो बात ही क्या है! सो भी किसी के सँवारने-सजाने से नहीं, गहने-कपड़े से भी नहीं, बल्कि स्वयंसिद्ध है। इस रूप को देखते-देखते तृप्ति भी नहीं होती। क्योंकि यह प्रतिक्षण नया होता जाता है, नित्य नूतन है। समग्र यश, सौन्दर्य और ऐश्वर्य इसी के आश्रित हैं। सखियों! परन्तु इसका दर्शन तो औरों के लिये बड़ा ही दुर्लभ है। वह तो गोपियों के ही भाग्य में बदा है।
सखी! व्रज की गोपियाँ धन्य हैं। निरन्तर श्रीकृष्ण में ही चित्त लगा रहने के कारण प्रेमभरे हृदय से, आँसुओं के कारण गद्गद कण्ठ से वे इन्हीं की लीलाओं का गान करती रहती हैं। वे दूध दुहते, दही मथते, धान कूटते, घर लीपते, बालकों को झुला झुलाते, रोते हुए बालकों को चुप कराते, उन्हें नहलाते-धुलाते, घरों को झाड़ते-बुहारते - कहाँ तक कहें, सारे काम-काज करते समय श्रीकृष्ण के गुणों के गान में ही मस्त रहती हैं।
ये श्रीकृष्ण जब प्रातःकाल गौओं को चराने के लिये व्रज से वन में जाते हैं और सायंकाल उन्हें लेकर व्रज में लौटते हैं, तब बड़े मधुर स्वर से बाँसुरी बजाते हैं। उसकी टेर सुनकर गोपियाँ घर का सारा कामकाज छोड़कर झटपट रास्ते में दौड़ आती हैं और श्रीकृष्ण का मन्द-मन्द मुस्कान एवं दयाभरी चितवन से युक्त मुखकमल निहार-निहारकर निहाल होती हैं। सचमुच गोपियाँ ही परम पुण्यवती हैं।'
भरतवंश शिरोमणे! जिस समय पुरवासिनी स्त्रियाँ इस प्रकार बातें कर रही थीं, उसी समय योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने मन-ही-मन शत्रु को मार डालने का निश्चय किया। स्त्रियों की ये भयपूर्ण बातें माता-पिता देवकी-वसुदेव भी सुन रहे थे।[1] वे पुत्र स्नेहवश शोक से विह्वल हो गये। उनके हृदय में बड़ी जलन, बड़ी पीड़ा होने लगी। क्योंकि वे अपने पुत्रों के बल-वीर्य को नहीं जानते थे।
भगवान श्रीकृष्ण और उनसे भिड़ने वाला चाणूर दोनों ही भिन्न-भिन्न प्रकार के दाँव-पेंच का प्रयोग करते हुए परस्पर जिस प्रकार लड़ रहे थे, वैसे ही बलरामजी और मुष्टिक भी भिड़े हुए थे। भगवान के अंग-प्रत्यंक वज्र से भी कठोर हो रहे थे। उनकी रगड़ से चाणूर की रग-रग ढीली पड़ गयी। बार-बार उसे ऐसा मालूम हो रहा था मानो उसके उसके शरीर के सारे बन्धन टूट रहे हैं। उसे बड़ी ग्लानि, बड़ी व्यथा हुई। अब वह अत्यन्त क्रोधित होकर बाज की तरह झपटा और दोनों हाथों के घूँसे बाँधकर उसने भगवान श्रीकृष्ण की छाती पर प्रहार किया। परन्तु उसके प्रहार से भगवान तनिक भी विचलित न हुए, जैसे फूलों के गजरे की मार से गजराज। उन्होंने चाणूर की दोनों भुजाएँ पकड़ लीं और उसे अंतरिक्ष में बड़े वेग से कई बार घुमाकर धरती पर दे मारा।
परीक्षित! चाणूर के प्राण तो घुमाने के समय ही निकल गये थे। उसकी वेष-भूषा अस्त-व्यस्त हो गयी, केश और मालाएँ बिखर गयीं, वह इन्द्रध्वज के समान गिर पड़ा।
क्रमशः अगला पोस्ट :- “स्कन्ध 10; अध्याय 44 ;श्रलोक 24 से 51 तक”
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"गीताप्रेस ; गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक *'श्रीमद्भागवतमहापुराण'* पु० कोड..(1535) से"
[14/08/2020, 22:03] At the age of 6,: *॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 10; अध्याय 44,श्रलोक..(24-51)
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*चाणूर, मुष्टिक आदि पहलवानोंका तथा कंसका उद्धार*
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इसी प्रकार मुष्टिक ने भी पहले बलराम जी को एक घूँसा मारा। इस पर बली बलराम जी ने उसे बड़े ज़ोर से एक तमाचा जड़ दिया। तमाचा लगने से वह काँप उठा और आँधी से उखड़े हुए वृक्ष के समान अत्यन्त व्यथित और अन्त में प्राणहीन होकर खून उगलता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। हे राजन! इसके बाद योद्धाओं में श्रेष्ठ भगवान बलराम जी ने अपने सामने आते ही कूट नामक पहलवान को खेल-खेल में ही बायें हाथ के घूँसे से उपेक्षापूर्वक मार डाला।
उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने पैर की ठोकर से शल का सिर धड़ से अलग कर दिया और तोशल को तिनके की तरह चीर कर दो टुकड़े कर दिया। इस प्रकार दोनों धराशायी हो गये। जब चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल - ये पाँचों पहलवान मर चुके, तब जो बच रहे थे, वे अपने प्राण बचाने के लिये स्वयं वहाँ भाग खड़े हुए। उनके भाग जाने पर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी अपने समवयस्क ग्वाल-बालों को खींच-खींचकर उनके साथ भिड़ने और नाच-नाचकर भेरीध्वनि के साथ अपने नूपुरों की झनकार को मिलाकर मल्लक्रीडा -कुश्ती के खेल करने लगे।
भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की इस अद्भुत लीला को देखकर सभी दर्शकों को बड़ा आनन्द हुआ। श्रेष्ठ ब्राह्मण और साधु पुरुष ‘धन्य है, धन्य है, - इस प्रकार कहकर प्रशंसा करने लगे। परन्तु कंस को इससे बड़ा दुःख हुआ। वह और भी चिढ़ गया। जब उसके प्रधान पहलवान मार डाले गये और बचे हुए सब-के-सब भाग गये, तब भोजराज कंस ने अपने बाजे-गाजे बंद करा दिये और अपने सेवकों को यह आज्ञा दी - ‘अरे, वसुदेव के इन दुश्चरित्र लड़कों को नगर से बाहर निकाल दो। गोपों का सारा धन छीन लो और दुर्बुद्धि नन्द को कैद कर लो।
वसुदेव भी बड़ा कुबुद्धि और दुष्ट है। उसे शीघ्र मार डालो और उग्रसेन मेरा पिता होने पर भी अपने अनुयायियों के साथ शत्रुओं से मिला हुआ है। इसलिये उसे भी जीता मत छोडो।' कंस इस प्रकार बढ़-बढ़कर बकवाद कर रहा था कि अविनाशी श्रीकृष्ण कुपित होकर फुर्ती से वेगपूर्वक उछलकर लीला से ही उसके ऊँचे मंच पर जा चढ़े। जब मनस्वी कंस ने देखा कि मेरे मृत्युरूप भगवान श्रीकृष्ण सामने आ गये, तब वह सहसा अपने सिंहासन से उठ खड़ा हुआ और हाथ में ढाल तथा तलवार उठा ली।
हाथ में तलवार लेकर वह चोट करने का अवसर ढूँढता हुआ पैंतरा बदलने लगा। आकाश में उड़ते हुए बाज के समान वह कभी दायीं ओर जाता तो कभी बायीं ओर। परन्तु भगवान का प्रचण्ड तेज अत्यन्त दुस्सह है। जैसे गरुड़ साँप को पकड़ लेते हैं, वैसे ही भगवान ने बलपूर्वक उसे पकड़ लिया। इसी समय कंस का मुकुट गिर गया और भगवान ने उसके केश पकड़कर उसे भी उस ऊँचे मंच से रंगभूमि में गिरा दिया। फिर परम स्वतन्त्र और सारे विश्व के आश्रय भगवान श्रीकृष्ण उसके ऊपर स्वयं कूद पड़े। उनके कूदते ही कंस की मृत्यु हो गयी। सबके देखते-देखते भगवान श्रीकृष्ण कंस की लाश को धरती पर उसी प्रकार घसीटने लगे, जैसे सिंह हाथी को घसीटे। नरेन्द्र! उस समय सबके मुँह से ‘हाय! हाय!’ की बड़ी ऊँची आवाज सुनायी पड़ी।
कंस नित्य-निरन्तर बड़ी घबड़ाहट के साथ श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करता रहता था। वह खाते-पीते, सोते-चलते, बोलते और सांस लेते - सब समय अपने सामने चक्र हाथ में लिये भगवान श्रीकृष्ण को ही देखता रहता था। इस नित्य चिन्तन के फलस्वरूप - वह चाहे द्वेषभाव से ही क्यों न किया गया हो - उसे भगवान के उसी रूप की प्राप्ति हुई, सारूप्य मुक्ति हुई, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े तपस्वी योगियों के लिये भी कठिन है।
कंस के कंक और न्यग्रोध आदि आठ छोटे भाई थे। वे अपने बड़े भाई का बदला लेने के लिये क्रोध से आगबबूले होकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की ओर दौड़े। जब भगवान बलराम जी ने देखा कि वे बड़े वेग से युद्ध के लिये तैयार होकर दौड़े आ रहे हैं, तब उन्होंने परिघ उठाकर उन्हें वैसे ही मार डाला, जैसे सिंह पशुओं को मार डालता है। उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं। भगवान के विभूतिस्वरूप ब्रह्मा, शंकर आदि देवता बड़े आनन्द से पुष्पों की वर्षा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे। अप्सराएँ नाचने लगीं।
महाराज! कंस और उसके भाइयों की स्त्रियाँ अपने आत्मीय स्वजनों की मृत्यु से अत्यन्त दुःखित हुईं। वे अपने सिर पीटती हुई आँखों में आँसू भरे वहाँ आयीं। वीरशैय्या पर सोये हुए अपने पतियों से लिपटकर वे शोकग्रस्त हो गयीं और बार-बार आँसू बहाती हुई ऊँचे स्वर से विलाप करने लगीं। ‘हा नाथ! हे प्यारे! हे धर्मज्ञ! हे करुणामय! हे अनाथवत्सल! आपकी मृत्यु से हम सबकी मृत्यु हो गयी। आज हमारे घर उजड़ गये। हमारी सन्तान अनाथ हो गयी। पुरुषश्रेष्ठ! इस पुरी के आप ही स्वामी थे। आपके विरह से इसके उत्सव समाप्त हो गये और मंगलचिह्न उतर गये। यह हमारी ही भाँति विधवा होकर शोभाहीन हो गयी।
स्वामी! आपने निरपराध प्राणियों के साथ घोर द्रोह किया था, अन्याय किया था; इसी से आपकी यह गति हुई। सच है, जो जगत के जीवों से द्रोह करता है, उनका अहित करता है, ऐसा कौन पुरुष शान्ति पा सकता है? ये भगवान श्रीकृष्ण जगत के समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय के आधार हैं। यही रक्षक भी हैं। जो इसका बुरा चाहता है, इनका तिरस्कार करता है; वह कभी सुखी नहीं हो सकता।
श्री शुकदेव जी कहते हैं - परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण ही सारे संसार के जीवनदाता हैं। उन्होंने रानियों को ढाढ़स बँधाया, सान्त्वना दी; फिर लोक-रीति के अनुसार मरने वालों का जैसा क्रिया-कर्म होता है, वह सब कराया।
तदनन्तर भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी ने जेल में जाकर अपने माता-पिता को बन्धन से छुड़ाया और सिर से स्पर्श करके उनके चरणों की वन्दना की। किंतु अपने पुत्रों के प्रणाम करने पर भी देवकी और वसुदेव ने उन्हें जगदीश्वर समझकर अपने हृदय से नहीं लगाया। उन्हें शंका हो गयी कि हम जगदीश्वर को पुत्र कैसे समझें।
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