*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 10 || अध्याय 76 ||
*शाल्व के साथ यादवों का युद्ध*
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अब मनुष्य की-सी लीला करने वाले भगवान श्रीकृष्ण का एक और भी अद्भुत चरित्र सुनो। इसमें यह बतलाया जायेगा कि सौभ नामक विमान का अधिपति शाल्व किस प्रकार भगवान के हाथ से मारा गया। शाल्व शिशुपाल का सखा था और रुक्मिणी के विवाह के अवसर पर बारात में शिशुपाल की ओर से आया हुआ था। उस समय यदुवंशियों ने युद्ध में जरासन्ध आदि के साथ-साथ शाल्व को भी जीत लिया था। उस दिन सब राजाओं के सामने शाल्व ने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं पृथ्वी से यदुवंशियों को मिटाकर छोडूँगा, सब लोग मेरा बल-पौरुष देखना’।
परीक्षित! मूढ़ शाल्व ने इस प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधिदेव भगवान पशुपति की आराधना प्रारम्भ की। वह उन दिनों दिन में केवल एक बार मुट्टी भर राख फाँक लिया करता था। यों तो पार्वतीपति भगवान शंकर आशुतोष हैं, औढरदानी हैं, फिर भी वे शाल्व का घोर संकल्प जानकार एक वर्ष के बाद प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने शरणागत शाल्व से वर माँगने के लिये कहा। उस समय शाल्व ने यह वर माँगा कि ‘मुझे आप ऐसा विमान दीजिये जो देवता, असुर, गन्धर्व, नाग और राक्षसों से तोड़ा न जा सके; जहाँ इच्छा हो, वहीं चला जाये और यदुवंशियों के लिये अत्यन्त भयंकर हो’। भगवान शंकर ने कह दिया ‘तथास्तु!’ इसके बाद उनकी आज्ञा से विपक्षियों के नगर जीतने वाले मय दानव ने लोहे का सौभ नामक विमान बनाया आर शाल्व को दे दिया। वह विमान क्या था एक नगर ही था। वह इतना अन्धकारमय था कि उसे देखना या पकड़ना अत्यन्त कठिन था। चलाने वाला उसे जहाँ ले जाना चाहता, वहीं वह उसके इच्छा करते ही चला जाता था। शाल्व ने वह विमान प्राप्त करके द्वारका पर चढ़ाई कर दी, क्योंकि वह वृष्णिवंशी यादवों द्वारा किये हुए वैर को स्मरण रखता था।
परीक्षित! शाल्व ने अपनी बहुत बड़ी सेना से द्वारका को चारों ओर से घेर लिया और फिर उसके फल-फूल से लदे उपवन और उद्यानों को उजाड़ने और नगर द्वारों, फाटकों, राजमहलों, अटारियों, दीवारों और नागरिकों के मनोविनोद के स्थानों को नष्ट-भ्रष्ट करने लगा। उस श्रेष्ठ विमान से शस्त्रों की झड़ी लग गयी। बड़ी-बड़ी चट्टानें, वृक्ष, वज्र, सर्प और ओले बरसने लगे। बड़े जोर का बवंडर उठ खड़ा हुआ। चारों ओर धूल-ही-धूल छा गयी। परीक्षित! प्राचीन काल में जैसे त्रिपुरासुर ने सारी पृथ्वी को पीड़ित कर रखा था, वैसे ही शाल्व के विमान ने द्वारकापुरी को अत्यन्त पीड़ित कर दिया। वहाँ के नर-नारियों को कहीं एक क्षण के लिये भी शान्ति न मिलती थी।
परमयशस्वी वीर भगवान प्रद्युम्न ने देखा- हमारी प्रजा को बड़ा कष्ट हो रहा है, तब उन्होंने रथ पर सवार होकर सबको ढाढ़स बँधाया और कहा कि ‘डरो मत’। उनके पीछे-पीछे सात्यकि, चारुदेष्ण, सांब, भाइयों के साथ अक्रूर, कृतवर्मा, भानुविन्द, गद, शुक, सारण आदि बहुत-से वीर बड़े-बड़े धनुष धारण करके निकले। वे सब-के-सब महारथी थे। सब ने कवच पहन रखे थे और सबकी रक्षा के लिये बहुत-से रथ, हाथी, घोड़े तथा पैदल सेना साथ-साथ चल रही थी।
इसके बाद प्राचीन काल में जैसे देवताओं के साथ असुरों का घमासान युद्ध हुआ था, वैसे ही शाल्व के सैनिकों और यदुवंशियों का युद्ध होने लगा। उसे देखकर लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। प्रद्युम्न जी ने अपने दिव्य अस्त्रों से क्षण भर में ही सौभपति शाल्व की सारी माया काट डाली; ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अपनी प्रखर किरणों से रात्रि का अन्धकार मिटा देते हैं। प्रद्युम्न जी के बाणों में सोने के पंख एवं लोहे के फल लगे हुए थे। उनकी गाँठें जान नहीं पड़तीं थीं। उन्होंने ऐसे ही पचीस बाणों से शाल्व के सेनापति को घायल कर दिया। परममनस्वी प्रद्युम्न जी ने सेनापति के साथ ही शाल्व को भी सौ बाण मारे, फिर प्रत्येक सैनिक को एक-एक और सारथि को दस-दस तथा वाहनों को तीन-तीन बाणों से घायल किया। महामना प्रद्युम्न जी के इस अद्भुत और महान कर्म को देखकर अपने एवं पराये-सभी सैनिक उनकी प्रशंसा करने लगे।
परीक्षित! मय दानव का बनाया हुआ शाल्व का वह विमान अत्यन्त मायामय था। वह इतना विचित्र था कि कभी अनेक रूपों में दीखता तो कभी एक रूप में, कभी दीखता तो कभी न भी दीखता। यदुवंशियों को इस बात का पता ही न चलता कि वह इस समय कहाँ है। वह कभी पृथ्वी पर आ जाता तो कभी आकाश में उड़ने लगता। कभी पहाड़ की चोटी पर चढ़ जाता तो कभी जल में तैरने लगता। वह अलात चक्र के समान-मानो कोई दुमुँही लुकारियों की बनेठी भाँज रहा हो-घूमता रहता था, एक क्षण के लिए भी कहीं ठहरता न था। शाल्व अपने विमान और सैनिकों के साथ जहाँ-जहाँ दिखायी पड़ता, वहीं-वहीं यदुवंशी सेनापति बाणों की झड़ी लगा देते थे। उनके बाण सूर्य और अग्नि के समान जलते हुए तथा विषैले साँप की तरह असह्य होते थे। उनसे शाल्व का नागराकर विमान और सेना अत्यन्त पीड़ित हो गयी, यहाँ तक कि यदुवंशियों के बाणों से शाल्व स्वयं मूर्च्छित हो गया।
परीक्षित! शाल्व के सेनापतियों ने भी यदुवंशियों पर खूब शस्त्रों की वर्षा कर रखी थी, इससे वे अत्यन्त पीड़ित थे; परन्तु उन्होंने अपना-अपना मोर्चा छोड़ा नहीं। वे सोचते थे कि मरेंगे तो परलोक बनेगा और जीतेंगे तो विजय की प्राप्ति होगी। परीक्षित! शाल्व के मन्त्री का नाम द्युमान, जिसे पहले प्रद्युम्न जी ने पचीस बाण मारे थे, वह बहुत बली था। उसने झपटकर प्रद्युम्न जी पर अपनी फौलादी गदा से बड़े जोर से प्रहार किया और ‘मार लिया, मार लिया’ कहकर गरजने लगा।
परीक्षित! गदा की चोट से शत्रुदमन प्रद्युम्न जी का वक्षःस्थल फट-सा गया। दारुक का पुत्र उनका रथ हाँक रहा था। वह सारथि धर्म के अनुसार उन्हें रणभूमि से हटा ले गया। दो घड़ी में प्रद्युम्न जी की मूर्च्छा टूटी। तब उन्होंने सारथि से कहा- ‘सारथे! तूने यह बहुत बुरा किया। हाय, हाय! तू मुझे रणभूमि से हटा लाया? सूत! हमने ऐसा कभी नहीं सुना कि हमारे वंश का कोई भी वीर रणभूमि छोड़कर अलग हट गया हो! यह कलंक का टीका तो मेरे ही सिर लगा। सचमुच सूत! तू कायर है, नपुंसक है।
बतला तो सही, अब मैं अपने ताऊ बलराम जी और पिता श्रीकृष्ण के सामने जाकर क्या कहूँगा? अब तो सब लोग यही कहेंगे न, कि मैं युद्ध से भग गया? उनके पूछने पर मैं अपने अनुरूप क्या उत्तर दे सकूँगा। मेरी भाभियाँ हँसती हुई मुझसे साफ-साफ पूछेंगी कि ‘कहो, वीर! तुम नपुंसक कैसे हो गये? दूसरों ने युद्ध में तुम्हें नीचा कैसे दिखा दिया? सूत! अवश्य ही तुमने मुझे रणभूमि से भगाकर अक्षम्य अपराध किया है’।
सारथी ने कहा- आयुष्मन! मैंने जो कुछ किया है, सारथी धर्म समझकर ही किया है। मेरे समर्थ स्वामी! युद्ध का ऐसा धर्म है कि संकट पड़ने पर सारथी रथी की रक्षा कर ले और रथी सारथी की। इस धर्म को समझते हुए ही मैंने आपको रणभूमि से हटाया है। शत्रु ने आप पर गदा का प्रहार किया था, जिससे आप मुर्च्छित हो गये थे, बड़े संकट में थे; इसी से मुझे ऐसा करना पड़ा। (01-33)
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