*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥*
"श्रीमद्भागवतमहापुराण"
स्कन्ध 10 || अध्याय 77 ||
*शाल्व-उद्धार*
श्रीशुकदेव जी कहते हैं- अब प्रद्युम्न जी ने हाथ-मुँह धोकर, कवच पहन धनुष धारण किया और सारथी से कहा कि ‘मुझे वीर द्युमान के पास फिर से ले चलो’। उस समय द्युमान यादव सेना को तहस-नहस कर रहा था। प्रद्युम्न जी ने उसके पास पहुँचकर उसे ऐसा करने से रोक दिया और मुसकराकर आठ बाण मारे। चार बाणों से उनके चार घोड़े और एक-एक बाण से सारथी, धनुष, ध्वजा और उसका सिर काट डाला। इधर गद, सात्यकि, साम्ब आदि यदुवंशी वीर भी शाल्व की सेना का संहार करने लगे। सौभ विमान पर चढ़े हुए सैनिकों की गरदनें कट जातीं और वे समुद्र में गिर पड़ते।
इस प्रकार यदुवंशी और शाल्व के सैनिक एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे। बड़ा ही घमासान और भयंकर युद्ध हुआ और वह लगातार सत्ताईस दिनों तक चलता रहा। उन दिनों भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर के बुलाने से इन्द्रप्रस्थ गये हुए थे। राजसूय यज्ञ हो चुका था और शिशुपाल की भी मृत्यु हो गयी थी। वहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि बड़े भयंकर अपशकुन हो रहे हैं। तब उन्होंने कुरु वंश के बड़े-बूढ़ों, ऋषि-मुनियों, कुन्ती और पाण्डवों से अनुमति लेकर द्वारका के लिये प्रस्थान किया। वे मन-ही-मन कहने लगे कि ‘मैं पूज्य भाई बलराम जी के साथ यहाँ चला आया। अब शिशुपाल के पक्षपाती क्षत्रिय अवश्य ही द्वारका पर आक्रमण कर रहे होंगे’।
भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका पहुँचकर देखा कि सचमुच यादवों पर बड़ी विपत्ति आयी है। तब उन्होंने बलराम जी को नगर की रक्षा के लिये नियुक्त कर दिया और सौभपति शाल्व को देखकर अपने सारथि दारुक से कहा- ‘दारुक! तुम शीघ्र-से-शीघ्र मेरा रथ शाल्व के पास ले चलो। देखो, यह शाल्व बड़ा मायावी है, तो भी तुम तनिक भी भय न करना’। भगवान की ऐसी आज्ञा पाकर दारुक रथ पर चढ़ गया और उसे शाल्व की ओर ले चला। भगवान के रथ की ध्वजा गरुड़चिह्नों से चिह्नित थी। उसे देखकर यदुवंशियों तथा शाल्व की सेना के लोगों ने युद्धभूमि में प्रवेश करते ही भगवान को पहचान लिया।
परीक्षित! तब तक शाल्व की सारी सेना प्रायः नष्ट हो चुकी थी। भगवान श्रीकृष्ण को देखते ही उसने उनके सारथी पर एक बहुत बड़ी शक्ति चलायी। वह शक्ति बड़ा भयंकर शब्द करती हुई आकाश में बड़े वेग से चल रही थी और बहुत बड़े लूक के समान जान पड़ती थी। उसके प्रकाश से दिशाएँ चमक उठी थीं। उसे सारथी की ओर आते देख भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाणों से उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। इसके बाद उन्होंने शाल्व को सोलह बाण मारे और उसके विमान को भी, जो आकाश में घूम रहा था, असंख्य बाणों से चलनी कर दिया- ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अपनी किरणों से आकाश को भर देता है। शाल्व ने भगवान श्रीकृष्ण की बायीं भुजा में जिसमें शारंग धनुष शोभायमान था, बाण मारा, इससे शारंग धनुष भगवान के हाथ से छूटकर गिर पड़ा। यह एक अद्भुत घटना घट गयी। जो लोग आकाश या पृथ्वी से यह युद्ध देख रहे थे, वे बड़े जोर से ‘हाय-हाय’ पुकार उठे। अब शाल्व ने गरजकर भगवान श्रीकृष्ण से यों कहा- ‘मूढ़! तूने हम लोगों के देखते-देखते हमारे भाई और सखा शिशुपाल की पत्नी को हर लिया तथा भरी सभा में, जबकि हमारा मित्र शिशुपाल असावधान था, तूने उसे मार डाला।
मैं जानता हूँ कि तू अपने को अजेय मानता है। यदि मेरे सामने ठहर गया तो मैं आज तुझे अपने तीखे बाणों से वहाँ पहुँचा दूँगा, जहाँ से फिर कोई लौटकर नहीं आता’।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- ‘रे मन्द! तू वृथा ही बहक रहा है। तुझे पता नहीं कि तेरे सिर पर मौत सवार है। शूरवीर व्यर्थ की बकवाद नहीं करते, वे अपनी वीरता ही दिखलाया करते हैं’। इस प्रकार कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने क्रोधित हो अपनी अत्यन्त वेगवती और भयंकर गदा से शाल्व के जत्रुस्थान (हँसली) पर प्रहार किया। इससे वह खून उगलता हुआ काँपने लगा। इधर जब गदा भगवान के पास लौट आयी, तब शाल्व अन्तर्धान हो गया।
इसके बाद दो घड़ी बीतते-बीतते एक मनुष्य ने भगवान के पास पहुँचकर उनको सिर झुकाकर प्रणाम किया और वह रोता हुआ बोला- ‘मुझे आपकी माता देवकी जी ने भेजा है। उन्होंने कहा है कि अपने पिता के प्रति अत्यन्त प्रेम रखने वाले महाबाहु श्रीकृष्ण! शाल्व तुम्हारे पिता को उसी प्रकार बाँधकर ले गया है, जैसे कोई कसाई पशु को बाँधकर ले जाये’। यह अप्रिय समाचार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य-से बन गये। उनके मुँह पर कुछ उदासी छा गयी। वे साधारण पुरुष के समान अत्यन्त करुणा और स्नेह से कहने लगे- ‘अहो! मेरे भाई बलराम जी को तो देवता अथवा असुर कोई नहीं जीत सकता। वे सदा-सर्वदा सावधान रहते हैं। शाल्व का बल-पौरुष तो अत्यन्त अल्प है। फिर भी इसने उन्हें कैसे जीत लिया और कैसे मेरे पिताजी को बाँधकर ले गया? सचमुच, प्रारब्ध बहुत बलवान है’।
भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार कह ही रहे थे कि शाल्व वसुदेव जी के समान एक मायारचित मनुष्य लेकर वहाँ आ पहुँचा और श्रीकृष्ण से कहने लगा- ‘मूर्ख! देख, यही तुझे पैदा करने वाला तेरा बाप है, जिसके लिये तू जी रहा है। तेरे देखते-देखते मैं इसका काम तमाम करता हूँ। कुछ बल-पौरुष हो, तो इसे बचा’। मायावी शाल्व ने इस प्रकार भगवान को फटकार कर मायारचित वसुदेव का सिर तलवार से काट लिया और उसे लेकर अपने आकाशस्थ विमान पर जा बैठा।
परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण स्वयंसिद्ध ज्ञानस्वरूप और महानुभाव हैं। वे यह घटना देखकर दो घड़ी के लिये अपने स्वजन वसुदेव जी के प्रति अत्यन्त प्रेम होने के कारण साधारण पुरुषों के समान शोक में डूब गये। परन्तु फिर वे जान गये कि यह तो शाल्व की फैलायी हुई आसुरी माया ही है, जो उसे मय दानव ने बतलायी थी। भगवान श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि में सचेत होकर देखा- न वहाँ दूत है और न पिता का वह शरीर; जैसे स्वप्न में एक दृश्य दीखकर लुप्त हो गया हो! उधर देखा तो शाल्व विमान पर चढ़कर आकाश में विचर रहा है। तब वे उसका वध करने के लिये उद्यत हो गये।
प्रिय परीक्षित! इस प्रकार की बात पूर्वापर का विचार न करने वाले कोई-कोई ऋषि कहते हैं। अवश्य ही वे इस बात को भूल जाते हैं कि श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में ऐसा कहना उन्हीं के वचनों के विपरीत है।
कहाँ अज्ञानियों में रहने वाले शोक, मोह, स्नेह और भय; तथा कहाँ वे परिपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण- जिनका ज्ञान, विज्ञान और ऐश्वर्य अखण्डित है, एकरस है (भला उनमें वैसे भावों की सम्भावना ही कहाँ है?) बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा करके आत्मविद्या का भलीभाँति सम्पादन करते हैं और उसके द्वारा शरीर आदि में आत्मबुद्धि रूप अनादि अज्ञान को मिटा डालते हैं तथा आत्मसम्बन्धी अनन्त ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं। उन संतों के परमगतिस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण में भला, मोह कैसे हो सकता है।
अब शाल्व भगवान श्रीकृष्ण पर बड़े उत्साह और वेग से शस्त्रों की वर्षा करने लगा था। अमोघशक्ति भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपने बाणों से शाल्व को घायल कर दिया और उनके कवच, धनुष तथा सिर की मणि को छिन्न-भिन्न कर दिया। साथ ही गदा की चोट से उसके विमान को भी जर्जर कर दिया।
परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण के हाथों से चलायी हुई गदा से वह विमान चूर-चूर होकर समुद्र में गिर पड़ा। गिरने से पहले ही शाल्व हाथ में गदा लेकर धरती पर कूद पड़ा और सावधान होकर बड़े वेग से भगवान श्रीकृष्ण की ओर झपटा। शाल्व को आक्रमण करते देख उन्होंने भाले से गदा के साथ उसका हाथ काट गिराया। फिर उसे मार डालने के लिये उन्होंने प्रलयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी और अत्यन्त अद्भुत सुदर्शन चक्र धारण कर लिया। उस समय उनकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो सूर्य के साथ उदयाचल शोभायमान हो।
भगवान श्रीकृष्ण ने उस चक्र से परममायवी शाल्व का कुण्डल-किरीट सहित सिर धड़ से अलग कर दिया; ठीक वैसे ही, जैसे इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर का सिर काट डाला था। उस समय शाल्व के सैनिक अत्यन्त दुःख से ‘हाय-हाय’ चिल्ला उठे।
परीक्षित! जब पापी शाल्व मर गया और उसका विमान भी गदा के प्रहार से चूर-चूर हो गया, तब देवता लोग आकाश में दुन्दुभियाँ बजाने लगे। ठीक इसी समय दन्तवक्त्र अपने मित्र शिशुपाल आदि का बदला लेने के लिये अत्यन्त क्रोधित हो आ पहुँचा। (01-37)
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